Friday, July 29, 2011

बोया बीज बबूल का तो आम कहाँ से होए ?

संयम रख रे अब मनुज तू आपा काहे खोए
बोया बीज बबूल का तो आम कहाँ  से होए ?

प्रदुषण की मार को लेकर दिन रात क्यों तू रोता है
गन्दगी फ़ैलाने  वालों में तू सबसे पहले होता है

सरकारी कामों को लेकर दिन में आवाज़  बुलंद करे
रात में तू ही गिट्टी , रेती को चोरी  से घर में बंद करे

पैसे के लालच में घटिया लोगो को संसद में भेज दिया
अब क्यों कहता है नेताओं ने दिन रात का चैन लिया

रिश्वत का पैसा मिले तो बेबस को पूरी तरह से छील लिया
फिर क्यों कहता है भ्रष्टाचारियों ने भारत को पूरा  लील लिया

पाप की घघरी खुद ने भरी अब ईश्वर के आगे रोए
बोया बीज बबूल का तो आम कहाँ  से होए ?

भूल गया जब पिताजी को घर के बाहर की राह दिखाई थी
अब क्यों दुखी है जब बेटे ने वृद्धाश्रम की बुकिंग कराई है .

बच्चो को बुरे संस्कार देकर तूने ही उन्हें बिगाड़ा है
तू समय का नहीं मनुज,अपने  ही कर्मो का मारा है .

बेटी जेसी बहु को तूने दिन रात सताया  है
बेटी पर बीती है तो अब मन क्यों पछताया है .

तूने पाप किये है इतने की गंगा भी ना धोए
बोया बीज बबूल का तो आम कहाँ  से होए ?

10 comments:

shalini kaushik said...

kya khoob kaha kanu ji bahut sarthak bhavon se bhari prastuti.

amrendra "amar" said...

BAHUT HI KHUBSURAT RACHNA ,
SUNDER BHAVO SE SAJAY HAI AAPNE
SARTHAK RACHNA KE LIYE BADHAI

रेखा said...

खुबसूरत रचना ....

kanu..... said...

dhanyawad shalini ji ,amrendra ji rekha ji

S.N SHUKLA said...

सुन्दर रचना, सन्देश देती हुयी, आभार

Saru Singhal said...

Lovely work, I have read very few poems telling mankind what are we in reality and we are responsible for whatever is happening. Very good work...

Bhushan said...

हमारे ही कर्मों को गिनवाती रचना बढ़िया बन पड़ी है. ब्लॉग पर विज़िट करने और सकारात्मक टिप्पणी देने के लिए आपका धन्यवाद.

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

सटीक ...सार्थक सन्देश भी है इन पंक्तियों में..... बधाई

प्रवीण पाण्डेय said...

बेहतरीन छन्दबद्ध पंक्तियाँ।

Anonymous said...

We should be painstaking and fussy in all the intelligence we give. We should be extraordinarily careful in giving guidance that we would not about of following ourselves. Most of all, we ought to refrain from giving advisor which we dont tag along when it damages those who woo assume us at our word.