Friday, July 15, 2011

खोए हुए रंग

(अभी तक बस कविताओं और छोटे मोटे लेखों  कि दुनियां में ही खोई रही पहली बार एक कहानी लिखने कि कोशिश कि है आप सभी के सुझाव आमंत्रित है ,कृपया प्रतिक्रिया अवश्य दें ताकि सुधार किया जा सके )
वो हमेशा से खिड़की के उसी कोने पर बैठती आ रही थी,रोज शाम को एक नियत समय पर वहा बैठ जाती थी और कागज पर जाने क्या उकेरा करती थी,मैंने कई बार कोशिश की पर देख नहीं पाया की आखिर वो क्या करती थी,मुझे तमन्ना थी ये जानने की आखिर वो क्या करती है वहा बैठकर ?कुछ लिखती है?चित्र बनाती है?पढाई करती है या और कुछ ? पर कभी  देख नहीं पाया की आखिर वो क्या करती थी.मेरा उससे बस मुस्कराहट का रिश्ता था वो अपनी खिड़की में बेठी कभी नजर उठाती तो मुझे मुस्कुराता देख बदले में एक मुस्कराहट दे देती इससे ज्यादा  मै उसके विषय में कुछ  नहीं जानता था और कभी कोशिश भी नहीं की जानने की...बस इसी मुस्कराहट  कि डोर थी हमारे बीच ....

एक दिन शाम को दफ्तर से वापस आया तो देखा उस फ्लैट के बाहर कनाते (टेन्ट)  तानी हुई है .अपनी व्यस्त दिनचर्या में बस एक नजर डाली और निकल गया घर पर चाय कि प्याली के साथ सुधा ने बताया  कि वो सामने वाली लड़की कि शादी है ३ दिन बाद इसीलिए ये सब हो रहा है .कल ये लोग होटल चले जाएँगे वही से शादी है . पत्नी बोलती रही देखो ना आजकल  शहरों में शादियाँ भी केसी होती है होटल में सब व्यवस्था कर दी वही से बेटी विदा कर देंगे ना मेहमानों का आना जाना ना धूम धडाका सब जेसे औपचारिकता रह गई है...
सुधा मेरी पत्नी है और मैं प्रभाकर यहाँ मुंबई में एक बहुराष्ट्रीय  कंपनी में सेल्स मेनेजेर हूँ .२ साल पहले राजस्थान  के अपने शहर जयपुर से ब्याहकर अपने साथ लाया सुधा को तब सो वो दोस्त ,हमराही, संगिनी सब कुछ है.हाँ तो सुधा ने ही मुझे बताया था उस दिन कि उस लड़की का नाम प्रेरणा था और हर शाम अपनी खिड़की में बैठी वो चित्र बनाया करती थी .मेरे ऑफिस जाने के बाद कभी कभी घर भी आया करती थी ,सुधा थोड़े से भर्राए स्वर में बोली ये थी तो यहाँ अनजान शहर में कम से कम एक मुस्कराहटों का ही रिश्ता था, प्रेरणा को कही से पता चल गया था कि हम  राजस्थान के रहने वाले है तो सुधा के पास राजस्थानी रंग बिरंगी लहंगे मंगवाने आ गई थी.

सुधा आगे बोलती चली जा रही थी "उसे रंग बिरंगा लहंगा चाहिए थे अपने शादी के संगीत कार्यक्रम के लिए तो मेरे पास आ गई थी पता करने कि राजस्थान से ऐसा लहंगा केसे मंगवाए या मुंबई में असा लहंगा पसंद करने में मैं उसकी मदद कर सकती हु क्या " रंग बड़े पसंद है इस लड़की को मैंने ही मदद कि है उसकी लहंगा ज्वेलरी सब पसंद करवाने में "सुधा बड़े गर्व से बोली...
उसकी बातों को बीच में ही टोकते हुए मैंने कहा श्रीमतीजी बस भी करिए आज कुछ खाने को  नहीं देंगी क्या?और सुधा अपने सर पर चपत लगाते हुए बोली अरे हाँ भूख  लगी होगी ना तुम्हे ? बातों में मैं भूल ही गई थी अभी लाती हूँ  ....

सुधा ने उसका लहंगा पसंद करवाया था इसलिए हम लोगो को भी शादी का निमंत्रण आया और सुधा के जिद करने पर हम दोनों रिसेपशन में गए और गिफ्ट देकर खाना खाकर आ गए बाकि हम ना परिवार को ठीक ढंग से जानते थे ना रिश्तेदारों को ,तो ज्यादा निकटता वाला व्यवहार ना तो उनकी तरफ से किया गया ना ही अपेक्षित था.
इसी तरह दिन निकल गए में भी अपने काम में मशरूफ हो गया और धीरे धीरे उस खिड़की को देखने कि आदत भी चली गई ...बीच बीच में सुधा बताती रहती थी कि आज प्रेरणा अपनी माँ के घर घर आई थी तो उसे खिड़की के पास खड़े देखा था पर ना मैंने ज्यादा जानने कि उत्सुकता दिखाई ना सुधा ने ज्यादा बताने की....

 एक दिन ऑफिस से आया तो देखा वो उसी खिड़की पर बैठी है उदास ना जाने आकाश में क्या निहार रही थी आँखें मिली तो उसने मुझे ऐसी  ख़ाली नज़रों से देखा जेसे सब कुछ ख़तम हो गया हो...उसकी वो नजर जानलेवा थी ना जाने क्या था उस नजर में,दुःख मातम,दर्द या और खालीपन में समझ नहीं पाया पर उस नजर ने मुझे अन्दर तक झिंझोड़ दिया.
एक बार को मन हुआ सुधा को बुलाकर पूछु की ये ऐसे क्यों बैठी है पर हिम्मत ना हुई कही सुधा गलत ना समझे मुझे इतने में ही सुधा खुद ही आ गई जाने कहा गुम थी वो हाथ में चाय के प्याले लिए खडी थी पर किसी उधेड़बुन में थी. मैंने उसे हिलाकर पुचा क्या हुआ सुधा इतनी उदास क्यों हो?
उसे तो जेसे कोई सुनने  वाला ही चाहिए था आँखों में आंसू आ गए भर्राए गले से वो बोली प्रभाकर आपको पता है वो हमारे सामने वाली लड़की  थी ना प्रेरणा याद है ना आपको ?मैंने कहा हाँ याद है उसकी शादी में गए थे हम .हां वही. पिछले महीने  उसके पति का एक रोड एक्सीडेंट में देहांत हो गया मुझे तो आज ही सुबह पता चला जबपड़ोस  वाली आंटी ने बताया और फिर प्रेरणा को खिड़की में बेठे देखा .
इस खबर ने मुझे भोचक्का कर दिया शायद  इसलिए नहीं की मौत की खबर थी शायद इसलिए की मुझे अब उसकी आँखों का सूनापन समझ आया ,दिल भर आया नई नवेली दुल्हन ही तो थी वो ठीक से एक साल भी नहीं हुआ था  उसकी शादी को और दुनिया उजड गई उसकी.
सुधा ने बात आगे बढाई रंगों से कितना प्यार था इस लड़की को कितने चाव से रंग बिरंगे लहंगे साड़ियाँ , शाल  ना जाने क्या क्या ख़रीदा था शादी के लिए .दिन भर चित्र बनती थी सारी दुनिया को रंगीन कर देना चाहती थी ये ,और आज प्रकृति का क्रूर मजाक देखो इसके सारे रंग चले गए .इसके माता पिता इसे यहाँ ले आए है ताकि कुछ समय बाद इसकी दूसरी शादी करवाई जा सके आखिर उम्र ही क्या है अभी इसकी ,पूरी जिंदगी एसे निकलना बहुत मुश्किल है प्रभाकर पर ये लड़की मानती ही नहीं कहती है आलोक (प्रेरणा का पति) की  यादों के साथ ही बचा हुआ जीवन गुजार देगी.

मैंने  कहा वो तो आज नहीं कल मान ही जाएगी आजकल विधवा पुनर्विवाह बड़ी बात नहीं है ,इसके बाद सुधा ने जो कहा वो सुनकर में फिर  भोचक्का हो गया "प्रभाकर तुम नहीं समझोगे एक औरत के लिए अपने पति को भूलना आसान नहीं ,आदमी की जिंदगी में पत्नी उसके जीवन का हिस्सा होती है उसकी अर्धांगिनी होती है पर पत्नी का तो पूरा जीवन ही पति और परिवार में सिमट जाता है पति जब ऑफिस से घर आता है तो आराम के मूड में होता है पर पत्नी चाहे ऑफिस में रहे या घर में उसे बस पति और परिवार याद रहता है .पत्नी के जाने पर पति को आघात लगता है पर समाज उससे उसके रंग नहीं छीनता पर पति के जाते ही सबसे पहले पत्नी के जीवन के रंग नोचकर उससे अलग कर दी जाते है ,उसका सिंदूर उसकी हरी चूड़ियाँ ,रंगीन कपडे सब उससे छीन लिए जाते है.
पत्नी के जाने पर पति   बस साथी खोता है पत्नी तो अपना जीवन अपने रंग सब खो देती है "शौक से हलके रंग पहनना ,हल्का मेकअप  करना अलग बात है पर जब जबरजस्ती ये रंग छीन लिए जाए तो तकलीफ दुगुनी हो जाती है" खेर जाने दो शायद तुम नहीं समझ पाओगे ....

उसकी बातें सुनते ही मै जेसे फ्लेश  बेक मै चला गया मेरे पिताजी का देहांत भी तभी हो गया था जब मै पांचवी कक्षा  में था. माँ ने  नौकरी करके  हम दो भाइयों को पाला ,पढाया लिखाया  अपने पैरों पर खड़ा किया,पुनर्विवाह की उनने सोची नहीं क्यूंकि उनके हिसाब हम बच्चे ही उनके जीने की आशा थे अब,उन पर किसी ने ज्यादा  जोर भी नहीं डाला पुनर्विवाह के लिए क्यूंकि स्कूल जाते बच्चे थे उनके पास .में बचपन से आज तक यही सोचता रहा की माँ ने हमारे लिए त्याग किया बिना साथी के पूरी जिंदगी गुजारने का निर्णय लिया ,अपना पति खोकर भी हमें माँ बाप दोनों का प्यार दिया पर इस बात पर मेरी कभी नजर ही नहीं गई की माँ ने सिर्फ अपना पति,साथी हमसफ़र नहीं खोया बल्कि अपनी जिंदगी के सारे शोख रंग भी खो दिए ,अपनी हरी चूड़ियाँ लाल सिन्दूर ही नहीं खोया बल्कि वो सारे रंग  भी खो दिए जिनसे उनकी जिंदगी गुलजार थी...अपनी खिलखिलाहट वाली हसी खो दी क्यूंकि समाज क्या कहेगा लोग क्या कहेंगे...मै इसी उधेड़बुन में था की जेसे सुधा कि आवाज़ से मेरी तन्द्रा भंग हुई क्या हुआ प्रभाकर कहाँ खो गए ?

मै उससे बस इतना ही कह पाया सुधा तुम जाना एक बार उससे मिलने उससे समझाना कि अपनी जिंदगी के रंगों को ना खोने दे ...
और हाँ तैयार हो जाओ बाज़ार चलते है माँ के लिए कुछ रंगीन साड़ियाँ लेंगे. "पर माजी तो रंगीन कपडे नहीं पहनती" सुधा ने विस्मय से कहा औरे मैंने जवाब दिया हम जिद करेंगे तो जरूर पहनेंगी. "और समाज का क्या"?सुधा बोली.समाज का कुछ नहीं ,समाज हमसे है हम समाज  से नहीं .समाज को कोई हक नहीं किसी के जीवन के रंग छीन लेने का.मैंने दृढ़ निश्चय के साथ जवाब दिया .सुधा मुस्कुरा दी जेसे मेरे इस निर्णय में वो मेरे साथ हो.
और में मन ही मन बस यही सोचता रहा "मैं तुम्हे तुम्हारा साथी नहीं लौटा सकता माँ पर, मैं तुम्हारी जिंदगी के रंग जरूर लौटाउंगा "

10 comments:

induravisinghj said...

दिल को छू गई आपकी कलम...
कनुप्रिया जी लिखती जाइए....
शुभकामनाओं सहित...

kanupriya said...

induravisinghj :aapke comment ke lie dhanyawad.socha shuruat to karu ek baar to likhkar dekhu ye kahani k c hoti hai....ummid hai aapke sujhav milte rahenge....

Anonymous said...

aapki lekhni ko padha kaafi shakoon mila... shabdon ke saath bhawnaaon ka anootha sangam hai... Bhagwan kare ki aap likhte rahe aur aapki lekhni ka wazood badhta jaaye...

WordsPower GreatestBond

शालिनी कौशिक said...

बहुत खूब लिखा है कनु जी और ये वास्तविकता है .आज विधवा विवाह होते हैं और चलते भी हैं किन्तु पत्नी के लिए पहले पति की यादों को मिटाना मैं समझती हूँ कि मुमकिन नहीं .दिल को छू गयी आपकी कहानी.

महेश बारमाटे "माही" said...

चूंकि मैं भी कहानी के क्षेत्र में थोडा नया ही हूँ इसीलिए अभी आपको किसी भी तरह के सुझाव दे नहीं सकता...
बस इतना कह सकता हूँ कि आपकी कहानी बहुत अच्छी है, और शायद मेरी ही तरह आपको थोडा और प्रयास करना होगा...
इस पहली व अच्छी प्रस्तुति के लिए आभार !

Saru Singhal said...

Touching!

दिगम्बर नासवा said...

दिल में उतर गयी आपकी कहानी ...

kanu..... said...

bas ek choti si koshish ki hai digambar ji.....aapko pasand aai dhanyawad

loks said...

Awesome..sach bhi hai samaaj insaan ke akelepan ko mitaane ke liye banaya gaya hai na ki insaan ko akela rakhne ke liye....

Anonymous said...

Very useful reading. Very helpful, I look forward to reading more of your posts.