Wednesday, December 12, 2012

शर्तों वाला प्यार (Love with conditions)

दिसंबर की वो ठंडक सारे  शहर को जमाए दे रही थी पर वो आधी रात तक अपने होस्टल की छत पर खड़ी कंपकपाते होंठो ठिठुरते हाथो में फोन लिए उससे बात करती , एक स्वेटर  पहने या शाल ओढे वो कहती सुनती रहती और सोचती प्रेम की ऊष्मा सच में गजब की होती हैतरफ  एक तरफ जहा पेड़ पोधे भी ठण्ड के मारे ऐसे सिकुड़ जाते जेसे सर्दियों का ये मौसम सबमे कुमुदिनी के गुण  बाँट रहा हो ,वहीँ दूसरी तरफ वो कुमुदिनी की तरह खिल उठती .....

कभी कभी प्यार सिर्फ इसलिए नहीं होता की दिल को कोई अच्छा लगे या  देखकर, सुनकर कोई आपको भा जाए ,कभी कभी प्यार इसलिए भी होता है क्यूंकि आपको उसकी जरुरत होती है ,आसपास का सन्नाटा आपको निगल ने ले ये दर आपको खाए जाता है . कभी कभी प्यार इसलिए भी नहीं होता की आप पर प्यार का जादू चढ़ा होता है ,वो इसलिए होता है अगर वो न हो तो ज़िन्दगी गजब की बेमानी सी लगने लगे ...

उन दोनों का प्यार भी कुछ ऐसे  ही जन्मा था ...जैसे धरती हर बार अम्बर से प्यार करने पर सोचती होगी की अम्बर से मिलन संभव नहीं ,क्षितिज  मिथ्या है , पर प्रेम तो प्रेम है हर बार सब जानते समझते वो अम्बर से दिल लगा बैठती  होगी ये सोचकर की ये आसरा तो है की कोई है उसे प्रेम करता है कोई है जिसे वो प्रेम करती है कोई है   आते ही उसके  होंठ मुस्कुरा देते है। कोई जिससे वो मन की सारी बातें कह देती है उसकी सारी  बातें सुन लेती है जिसे दिल की गहराई से प्यार किया जाए फिर चाहे  वो मिले न मिले . हालाँकि बदलते ज़माने में इस तरह का प्रेम कम ही होता है पर लड़की को  भी हुआ और लड़के को भी  ऐसे  ही प्रेम ने गिरफ्त में लिया ....(शायद ) 
प्यार ने उनकी ज़िन्दगी में बड़े आराम  से दस्तक दी , दोनों  अपने अपने घर से दूर नए शहरों में ज़िन्दगी के साथ आँख मिचोली खेलने आए थे ,कभी जिंदगी उन्हें हराती कभी वो जिंदगी को मात देते कुछ सीख भी  लेते और कुछ  भी देते ज़िन्दगी को , इस सारी उथल पुथल में दोनों के पास बस एक चीज की कमी थी किसी ऐसे इंसान की जिसे वो  हार जीत की नए तजुर्बे की बातें सुना सके जिसके साथ हस सके रो सके .....
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निशा अपने शहर लखनऊ से दूर पहली बार जॉब के लिए दिल्ली आई थी  वैसे ये शहर उसके लिए नया नहीं था वो पहले भी प्रोफेशनल ट्रेनिंग के लिए 3 महीने  इस शहर से रूबरू हुई थी पर तब उसके साथ उसकी खास दोस्त वैशाली थी ...दोनों बचपन की सहेलियां थी साथ साथ पढाई की थी साथ ही ट्रेनिंग करने दिल्ली आई और तब दोनों को एक दुसरे का खूब सहारा था । वैसे देखा  जाए तो दोनों का  स्वभाव काफी अलग  था , वैशाली जहाँ खुले विचारों वाली थी वो खुले माहोल में पली बढ़ी भी थी ,फेशनेबल कपडे ,चमक दमक ,घूमना फिरना , डिस्को ,पार्टियों पर खर्चा करना उसकी ज़िन्दगी का हिस्सा था वही निशा तेज तर्रार तो थी पर स्वभाव से  थी पैसे खर्च करने और उड़ाने के बीच का अंतर बनाए रखती थी , थी पर उन्ही लोगो से ज्यादा बातें करती जो उसके मन को अच्छे लगते , कुल मिलाकर वो आधुनिक थी पर अपनी बनाई कुछ सीमाओं में बंधी  रहना पसंद करती थी ....पर दोनों  में एक बात कामन थी दोनों एक दुसरे का ख्याल रखती थी गहरा अपनापन था दोनों के बीच ...सालों से चली आ रही दोस्ती को वो ज़िन्दगी भर की दोस्ती मानती थी .....
पर इस बार जब निशा दिल्ली आई तो उधेड़बुन में थी सारे दोस्त ज़िन्दगी के साथ चहलकदमी करने अलग अलग शहरों में चले गए और उसे इस शहर ने वापस बुला लिया ...किस्मत का खेल था की उसका कोई भी दोस्त दिल्ली नहीं आया जॉब के लिए और वो  अचानक से अकेली सी हो गई  वैसे होस्टल वही था जहा वो पहले भी रह चुकी थी पर दोस्तों परिवार सबका एक साथ छूट जाना उसके लिए एक सदमे  की तरह था । हर  दोस्तों से बात होती, घर बात होती पर सब कुछ जेसे  हाल चाल पूछने  पर सिमट गया  था अचानक आया खालीपन उसे तकलीफ  दे रहा था ...

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ऐसे ही दिन तो निकल रहे थे पर अच्छे निकल रहे थे ये  अजीब है शायद . एक दिन वो बालकनी में खड़ी थी तभी उसके मोबाईल पर एक कॉल आया सामने वाला किसी अर्पिता को पूछ रहा था उसने रांग नंबर कहकर बात ख़त्म कर दी . थोड़ी देर बाद   फिर कॉल आया और एक लड़के ने  आवाज़ में कहा " मैं अंशुल बोल  रहा हु अर्पिता मेरी दोस्त है शायद उसने नुम्बर बदल लिया है और सर्विस प्रोवाईडर ने नुम्बर आपको  अलोट कर दिया है आप मेरी कुछ हेल्प कर सके तो ....
निशा ने बीच में ही बात काटते हुए कहा  " देखिए ये सब तो में नहीं जानती पर ये नंबर अब मेरा है  हां कभी अर्पिता का  आया तो में नंबर लेकर रख लुंगी ताकि और लोगो को परेशानी न हो " और ये कहकर उसने कॉल कट कर दिया । 

थोड़ी देर में उसने फ़ोन देखा तो  उसी नंबर से मैसेज आया था - "सॉरी में आपको परेशान  नहीं करना चाहता था " थोड़ी देर के लिए तो निशा को लगा कोई दोस्त होगा जो मजाक कर रहा है क्यूंकि उसके दोस्त कई बार ऐसे  मजाक करते रहते थे ,नए नए नंबर से फ़ोन करना या नए नंबर से मैसेज करना और पूछना कैसी है क्या कर रही है और एसे ही तंग करना ..उसके लगभग सभी दोस्त कई कई बार असे मजाक कर चुके थे .निशा ने मैसेज किया " इट्स ओके " और सोचा कोई दोस्त होगा तो ठीक है नहीं तो भी  सॉरी बोल रहा है जवाब देना तो बनता है .
वैसे भी अनजाने लोगो से बात करना उनके मेसेजेस का जवाब देना उसके लिए बड़ी बात नहीं थी ,"कम्युनिकेशन मेनेजर"थी वो मल्टीनेशनल कंपनी में और दिन भर ऐसे  मेसेज का जवाब देना उसके प्रोफेशनल एथिक्स का हिस्सा था और इस आदत ने अब निजी जिंदगी में भी जगह  बना ली थी ...उसने इंतज़ार किया पर किसी दोस्त का फोन नहीं आया तब उसे सच में लगा की किसी अंशुल ने उससे माफ़ी मांगी  है .
इस बात पर ज्यादा  न देते हुए वो काम में लग गई और जल्दी ही इस बात को भूल  भी गई और फिर से काम और अकेलेपन ने उसे घेर  लिया कभी कभी वो अकेले में सोचती काश ! उसे भी किसी से प्यार हो जाता  पर ये बात जैसे उसके दिमाग आती वैसे ही थोड़ी देर में चली भी जाती क्यूंकि जैसे प्रेम की इच्छा वो रखती थी वैसा प्रेम होना बड़ा कठिन  है . आधुनिक दुनिया में होने के बाद भी वो प्यार का   रूप पसंद करती थी अपने आस पास की लड़कियों की तरह वो  ऐसा लड़का नहीं चाहती थी  जो उसे घुमाए फिराए शोपिंग कराए या फिल्म दिखाए वो तो सच्चा प्यार चाहती थी ज़िन्दगी में . वैसे प्रेम को लेकर उसकी धारणाएं अलग सी थी उसे लगता की जरुरी नहीं प्रेम एक ही बार हो ,वो मानती की  तब तक बार बार होता है जब तक आपके हिस्से का प्यार आपको मिल न जाए ,पर दूसरी तरफ वो ये भी मानती थी की  सच्चा प्यार नहीं मिलता . उसे लगता था प्रेम का मतलब सिर्फ पाना नहीं कभी कभी खोना  भी प्रेम है वही दूसरी तरह वो मानती की प्यार को ऐसे ही नहीं  जाने देना चाहिए पूरी कोशिश करनी ही चाहिए ....ऐसी जाने  विरोधाभासी  परिभाषाएं उसने प्रेम के लिए गढ़ रखी थी ...
कभी वो मानती  उसे प्यार हो ही नहीं सकता और कभी इंतज़ार करती प्यार के आ जाने का ...ऐसा लगता मानो उसे प्रेमी से ज्यादा प्रेम का इंतज़ार था और उससे भी ज्यादा  का इंतज़ार कर रही थी ,महसूस करना चाहती थी प्यार के हर पहलु को ....अजीब सी थी वो गुलाब के फूलों से ज्यादा काँटों की चुभन  महसूस करना चाहती थी शायद ........

अगली किश्त जल्दी ही ..........(जिसमे अंशुल से मिलेंगे ,और जानेगे कैसे होगा ये शर्तों वाला प्यार  और क्या होगी वो शर्त )

आपका एक कमेन्ट मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा और भूल सुधार का अवसर भी

Wednesday, December 5, 2012

बदलते बच्चे बिखरता बचपन

मुझे चाँद खिलौना ला दो माँ ,मुझे तारों तक पहुंचा दो माँ
पापा प्यारी गुडिया ला दो, छोटा बेलन चकला ला दो
एक प्यारी सी चुनरी ला दो,मैं पहन उसे नाचूंगी माँ
मुझे चाँद खिलौना ला दो माँ ......


हमारा बचपन कुछ इसी तरह का था और शायद आज से २० से २५ साल पहले लगभग सभी बच्चो का बचपन कुछ एसा ही मासूमियत भरा था.बच्चे बिलकुल ओंस की बूंदों जेसे हुआ करते थे निश्चल , भोले और मासूम.पर अब बचपन वेसा नहीं बचा आजकल के बच्चे बाली उम्र में ही जाने कब जवान लोगो की तरह व्यवहार करने लगते है पता भी नहीं चलता .जिन विषयों पर हम और हमारी और हमसे पहले की पीढ़ी वाले लोग जवानी के दौर में भी बातें करने तक से शरमाते रहे वो सब आजकल के बच्चे मासूम उम्र में ही करने लगे है .उनका बचपन खो रहा है अहसास ख़तम हो रहे है और वो उम्र से पहले वयस्कों की तरह व्यवहार लगे है....
कई बार जब तक माता पिता को इस बात का अहसास होता है की उनका बच्चा अपनी उम्र से पहले बड़ा हो रहा है उसके पहले ही वो दहलीज लाँघ जाता है.३० वर्षीया विनीता के साथ कुछ एसा ही हुआ वो अपनी ४ साल की बेटी रितिका के साथ एक खिलोनो की दूकान पर गई वहा एक गुडिया को देखकर बेटी मचल गई की मम्मी मुझे यही गुडिया चाहिए विनीता ने जब उसे मना किया और कहा नहीं ये अच्छी गुडिया नहीं है तो बच्ची ने तपाक से जवाब दिया "मम्मा देखो ना कितनी हॉट है इसकी ड्रेस इसका मेकअप सब कितना सेक्सी है प्लीज़ ले दो ना ".अपनी चार साल की बेटी के मुह से एसे शब्द सुनकर उसे अजीब लगा .पर ये नई बात नहीं है आजकल बच्चे अपनी बोलचाल में एसे शब्दों का प्रयोग करते है.इतना ही नहीं सेक्स की आधी अधूरी जानकारी लेकर एक्सपेरिमेंट करने से भी नहीं कतराते.
देल्ही के एक स्कूल में २ बच्चों ने आपतिजनक स्थति में अपना एक ऍम ऍम एस बनाया और उसे अपने दोस्तों को भेज दिया.इंदौर की कुछ लड़कियां स्कूल में शराब पीती पकड़ी गई .एक किशोर छोटी बच्ची के साथ बलात्कार का दोषी पाया गया.मुंबई में एक १६ वर्षीय लड़की ने फुटपाथ पर चलते हुए ४ लोगो को अपनी कार से टक्कर मार दी. ये सारे उदाहरन है जहाँ बच्चो को जरुरत से ज्यादा छूट दी गई उन्होंने इसका गलत इस्तेमाल किया या सही जानकारी नहीं दी गई और वो रस्ते से भटक गए. आए दिन एसी कई घटनाएं देखने सुनने मिलती है जहा बच्चे अपनी मासूमियत का दायरा लांघते और उम्र से पहले बड़े होते दिखाई देते है.
आजकल की छोटी छोटी सी बच्चियां ४,५ साल की ही उम्र में हॉट दिखना चाहती है ,सेक्सी कपडे पहनना चाहती हैं शीला और मुन्नी की तरह उत्तेजक डांस करना चाहती हैं. .किशोर वय की लड़कियां एसे कपडे पहनती है जो उन्हें सेक्सी दिखने में मदद करें.इसमें हम थोडा सा हाथ बाजारवाद का भी मान सकते है. चाइल्ड सायकोलोजी की टीचर वंदना उपाध्याय कहती है "बच्चियां ये सब कर रही हैं क्यूंकि उन्हें अपने आस पास यही सब होता दिखाई दे रहा है .बाजार उन्हें सिखा रहा है की उनकी कला,पर्सनालिटी ,अच्छे गुणों का कोई मोल नहीं है वो अगर सुन्दर और सेक्सी दिखेंगी तो ये सब बातें कोई मायने नहीं रखती .और यही गलत सोच उन्हें बिगड़ने में बड़ी भूमिका अदा कर रही है .
कुछ दिनों पहले अखबारों में खबर पढ़ी होगी आपने जिसमे ३,४ दस वर्षीय स्कूली बच्चे अपनी क्लास में असामान्य अवस्था में पाए गए और जब उनसे इसके बारे में पूछताछ की गई तो तो उन्होंने कहा हम रेप गेम खेल रहे थे.क्या आप सोच भी सकते है की रेप गेम भी कुछ हो सकता है पर ये सच है की बच्चे ये सब कर रहे हैं.बच्चे कितनी तेजी से अपनी उम्र के पहले ही बड़े हो रहे है इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की व्यस्क फिल्म देखते हुए कई बच्चो को देखा जा सकता है जो अपनी उम्र के लिए नकली आई- डी प्रूफ दिखाकर फिल्म देखते है. मुंबई के १ सिनेमा हॉल पर टिकिट की बुकिंग करने वाले महेश बताते है " कई बार बच्चो ए सर्टिफिकेट वाली फिल्मों को देखने बच्चे आते है हमे उनकी उम्र पर शक भी होता है पर वो आई डी प्रूफ दिखाते है और हमे टिकिट देना पड़ता है".

आपको याद होगा कुछ समय पहले एक प्रसिद्द टी वी कार्यक्रम में जज तब हैरान रह गए थे जब उन्होंने एक छोटी सी बच्ची को कमर हिलाकर लगभग अश्लील भाव भंगिमा में डांस करते देखा था .उनके मुह खुले के खुले और आँखे फटी की फटी रह गई थी , एक मासूम बच्ची को इस तरह का डांस करते देखकर. भड़कीला मेकअप ,अश्लील भंगिमा के साथ लोगो को आकर्षित करना ये आजकल छोटे छोटे मासूम बच्चो को करते देखा जा सकता है.जब उस बच्ची से इस बारे में जज ने सवाल किया तो वो उतनी ही मासूमियत से बोली ये मुझे मम्मा ने सिखाया.आजकल छोटी बच्चियां मल्लिका शेरवत और राखी सावंत की तरह दिखना चाहती है.और ५ से ६ साल के छोटे छोटे बच्चे मुन्नी और शीला से शादी करना चाहते है.इन सारे दिखावों में हमारे बच्चो का बचपन कही खो गया है.जब उनकी खेलने की उम्र होती है उस समय वो सेक्सी दिखने की इच्छा रखने लगते है , और जब उन्हें अपने लिए क्यूट शब्द सुनकर खुश होना चाहिए वो हॉट और डेशिंग शब्द सुनना चाहते है.

कुछ समय पहले मुंबई के कर्जत में एक रेव पार्टी हुई थी आपको जानकार आश्चर्य होगा की वहा से पकडे गए लोगो में किशोरवय के बच्चे भी थे. जिनमे लड़के और लड़कियां सभी शामिल थे .ये सभी शराब पीते ,और दृग्स लेते हुए मिले .इस तरह की पार्टियों में कई बार वीडिओ और ऍम ऍम एस बनाये जाते है और बाजार में बेचे जाते है.बच्चे कच्ची उम्र में जब एक बार इस सब में उलझ जाते है तो बाहर आना बहुत मुश्किल होता है.पर कम उम्र में बच्चे इस सब के दुष्परिणाम नहीं समझ पाते और बचपन के साथ कई बार अपने जीवन को भी अँधेरे में धकेल देते है.

एक सर्वे के अनुसार इन्टरनेट से पोर्न साईट देखने वाले और पोर्न वीडिओ डाउनलोड करने वालों में बड़ी संख्या किशोरों और बच्चो की होती है. ये बच्चे और किशोर इन्टरनेट के माध्यम से अधकचरा ज्ञान लेते है और अपने दोस्तों के साथ एक्सपेरिमेंट करते है.बच्चे अपनी उम्र से ज्यादा जानकारी रखते है उत्तेजक म्युझिक वीडिओ देखते है और अपनी उम्र से ज्यादा वयस्कों की तरह व्यवहार करने लगते हैं. " हमारे बच्चो के दिमाग पहले ही इन्टरनेट पर और दोस्तों से मिलने वाली अधूरी जानकारी से भरा हुआ है साथ ही साथ एक और बड़ी समस्या है की भारत के घरों में अभी भी बच्चो से सेक्स और योन शिक्षा पर बात नहीं की जाती है जिसके कारन बच्चे अपने आस पास के बच्चा,टीवी,सिनेमा और इन्टरनेट से गलत जानकारी इकट्ठी कर लेते है और धीरे धीरे ये सोचने लगते है की सेक्स करना और उत्तेजक कपडे पहनना या आसामान्य सेक्स हरकतें करना नोर्मल है. "ये कहना है सेक्सोलोजीस्ट अरुणेश कुमार का.

इन्टरनेट पर आजकल एसे कई वीडिओ और फोटो उपलब्ध हैं जो बच्चो को अधकचरी जानकारी देते है.फसबूक ,यू -ट्यूब और ऑरकुट जेसी साइट्स पर भी आपको इस तरह के वीडिओ देखने मिल जाएगे .और इनमे से कई वीडिओ बिना किसी एज वेरीफीकेशन के देखे जा सकते है.इस सब मायाजाल में उलझकर बच्चे अपनी मासूमियत को खोते जा रहे हैं. लेखिका मोहिनी पुराणिक कहती हैं की "बच्चे इन साइट्स पर अपनी उम्र ज्यादा बताकर अपने अकाउंट खोल लेते है और फिर यहाँ अपलोड किए जाने वाले वीडिओ और फोटोग्राफ्स देखते है ये बहुत जरूरी हो गया है की परेंट्स बच्चो की गतिविधयों पर नजर रखे और उन्हें बिगड़ने से और उम्र से पहले बड़ा होने से रोके.."

महानगरीय संस्कृति ने भी इस सब को बढ़ावा दिया है बच्चे बाहर जाकर मस्ती ना करे इसलिए माता पिता उनके हाथ में रिमोट थमा देते हैं एक कंप्यूटर ला देते है और इन्टरनेट कनेक्शन करवा देते है ताकि वो घर पर रहकर ही खुश रह सके. कई माता पिता ऑफिस जाते है और अपना ज्यादा समय बच्चो को नहीं दे पाते और इसकी पूर्ती वो बच्चो को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं देकर करना चाहते हैं.एसे में बच्चे घर में अकेले रहकर टी वी ,इन्टरनेट का सही उपयोग करने की जगह गलत इस्तेमाल करने लगते है.कई बार उनकी संगती भी बिगड़ जाती है जिसके कारण वो गलत बातें सीख जाते हैं और कई बार तो जिद करके अपनी गलत मांगे भी पूरी करवाने लगते है.उन्हें एक अलग कमरा दे दिया जाता है जिसमे प्रैवेच्य के नाम पर अकेले में बैठकर वो अपनी मनमर्जी करते है.

ये सच है की बच्चो को जोर जबरजस्ती से नहीं रोका जाना चाहिए पर आप ये कहकर भी अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते की "उसे जो करना है वो करेगा ही हमारी बात तो मानता या मानती ही नहीं".माता पिता के लिए ये जरूरी है की वो बच्चो को सही संस्कार दें और उन्हें अच्छे बुरे की पहचान बचपन से ही करवाए. उनके साथ दोस्तों की तरह व्यवहार करें और उनकी बातें सुने उन्हें थोडा समय दे.
इस बात में कोई दोमत नहीं की वो आगे जाकर सेक्स करेंगे पर इसका मतलब ये नहीं की बचपन से ही उन्हें ये सब करने की छूट दे दी जाए और जब उनके हाथों में खिलोने होने चाहिए तब उनके हाथों में कंडोम और गर्भनिरोधक थमा दिए जाए.

आज के समय में बच्चे बड़े और रंगीन सपने देखते है ब्लैक एंड व्हाइट का जमाना नहीं बचा इसलिए उनपर जबरजस्ती करके या अति अनुशासन में रखकर कोई फायदा नहीं.पर उनकी गलत बातों के लिए सही ढंग से मना करना और उन्हें समझाना परेंट्स की ही जिम्मेदारी है.बच्चो को अपना दोस्त बनाइये उनके रंगीन सपनो को में सुन्दर रंग भरिये , उन्हें बचपन से ही रिश्तों की अहमियत समझाइए,उन्हें बताइए की हर चीज की एक उम्र है और सेक्स की भी एक उम्र है, उन्हें अपनापन दीजिए सिर्फ पैसे नहीं , ताकि उनकी मासूमियत बनी रहे और वो भी अपने बचपन में सच्चा बचपन महसूस कर सके.......

बच्चो के इस तरह के व्यवहार और उम्र से पहले बड़े होने के पीछे कई कारण हो सकते है आइये इनमे से कुछ कारणों पर एक नजर डालते है.

१ . बच्चो की जिज्ञासु प्रवत्ति :
बच्चे छोटी उम्र में हर बात के लिए जिज्ञासा रखते है ,क्यों और किस तरह ये दो सवाल उनके दिमाग में हमेशा घुमते रहते है.हर नई चीज को खुद करके देखना चाहते है. ये ऐसी उम्र होती है जब वो हर बात खुद करके देखना चाहते है और यही" मैं करके तो देखू" वाली प्रवत्ति उन्हें दृग्स,शराब और कम उम्र में सेक्स की तरफ धकेल देती है .आपके लिए ये चाहे उसकी बुराइयाँ हो सकती है पर उसके लिए ये एक साइंस के प्रयोग की तरह होता है . वो बस ये देखना चाहते है की परिणाम क्या होगा.

२. खुलकर बात न होना:
भारत में आज भी सेक्स जेसे विषय पर बच्चो से खुल कर बात नहीं की जाती.बच्चा अगर सवाल करता है तो उसे डांटकर चुप करा दिया जाता है .उसकी बालसुलभ जिज्ञासा को गन्दी बात कहकर दबा दिया जाता है .कई बार जब बच्चे अपने दोस्तों की दृग्स और शराब की आदत या असे ही किसी विसह्य पर बात करना चाहते है उन्हें गुस्सा दिखाया जाता है या सबके बीच में उनसे नाराजगी दिखाई जाती है .इस सबके कारण धीरे धीरे बच्चे हर बात छुपाने लगते है कभी डांट और मार के डर से और कभी सबके बीच में बेइज्जती किए जाने के डर से. और एक बार अगर गलत आदत के पंजे में आ गए तो फिर उसमे धसते ही चले जाते है.

३. पीयर प्रेशर :
आजकल बच्चे अपने आस पास के बच्चो और दोस्तों से जल्दी प्रभावित हो जाते है. कई बार उनके दोस्त उन्हें किसी काम को करने के लिए उकसाते हैं और न किए जाने पर चिढाते या परेशां करते है, ये भी एक बहुत बड़ा कारण है बच्चो के बिगड़ने का. जेसे कुछ बच्चे आपके बच्चे को क्लास बंक करने, सिगरते पीने या दृग्स लेने के लिए उकसाते हैं एसा न किया जाने पर उन्हें छोटा बच्चा कहकर चिढाते है और बच्चे उनकी बातों में आकर क्लास बंक करने लगते है या सिगरेटे या ड्रग्स लेने लगते है.उनके दोस्त कम उम्र में सेक्स करते है और एसा न करने पर उनका मजाल उड़ाते है इसलिए कई बच्चे कम उम्र में सेक्स करने लगते हैं. कई बार बच्चे दुसरे बच्चो की तरह दिखना चाहते है लड़कियां मेकअप करना चाहती है क्यूंकि उनकी फ्रेंड्स कर रही है ,लड़के डेशिंग दिखना चाहते है क्यूंकि उनके फ्रेंड्स वही सब कर रहे है . ये सब एक सीमा तक तो ठीक है पर जब बच्चे सीमा लाँघ जाए तो मुसीबत खड़ी हो जाती है. उनका पूरा ध्यान इन सब बातों में लग जाता है और वो पढाई लिखाई से दूर हो जाते हैं.

बच्चो में किए गए एक सर्वे में जब उनसे पुछा गया की वो शराब या ड्रग्स क्यों लेते है तो तीन कारण सामने आए
क्यूंकि उन्हें लगता है की अल्कोहल लेने से वो कूल दिखाई देंगे
वो देखना चाहते थे की इसे लेने से क्या होगा
उनके दोस्त लेते है इसलिए वो भी लेना चाहते हैं

४. माता पिता का अजीब व्यवहार:
८ वर्षीया परी की यही समस्या है उसकी माँ कभी कहती है "तुम बड़ी हो गई है तुम्हे अपने छोटे भाई का ध्यान रखना चाहिए , पर जब वो माँ या पापा से बात करती है उसे डांट पड़ती है की "तुम बच्ची हो चुप रहो".जब वो माँ से पूछती है की कभी उसे बड़ा और कभी छोटा क्यों कहा जाता है तब उसे कोई ठीक ठाक जवाब नहीं मिल पाता .ये कमोबेश हर बच्चे की समस्या रहती है वो पूरे बचपन यही सोचता है की वो बड़ा है या छोटा है ? पर उसे अपने सवालों के जवाब सही ढंग से नहीं मिल पाते. इसी सब से तंग आकर वो खुद को बड़ा साबित करना चाहता है , ,ये जताना चाहता है की वो बच्चा नहीं है समझदार है और खुद को साबित करने के चक्कर में वो गलत हरकतें करने लगता है या शराब और ड्रग्स लेने लगता है .

५. स्वतंत्रता की चाहत : I want my own room ,I want privacy ,Please don't interfere in my matter ". ये एसे जुमले हैं जो न्यू जनरेशन के बच्चो के मुह से कई बार सुनने को मिल जाएँगे.प्राईवेसी ने एक तरफ बच्चो को थोडा आत्मनिर्भर बनाया है वही दूसरी तरफ उन्हें बिगाड़ने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है .१४ वर्षीया राहुल दिन भर अपने कमरे में रहता है अन्दर खेलता है वही उसके दोस्त आते जाते है,जब एक दिन उसकी मम्मी रिया रूम में अचानक आ गई तो बोला "मम्मा प्लीज नॉक करके आया करो".रिया उसी दिन से घबरा गई की आखिर ये अकेले में असा क्या करता है ?जब छानबीन की तो तो उसके रूम से सिगरेट के टुकड़े ,और अश्लील अंग्रेजी मग्जींस मिली .स्वतंत्रता की चाह अच्छी बात है पर जब बच्चा बार बार इस तरह की बात करे ,आपसे कटा कटा रहने लगे तो समझ लीजिए कुछ गड़बड़ है. कई बार बच्चे जरुरत से ज्यादा छूट और प्राईवेसी का नाजायज फायदा उठाते है और जब तक आपको इसकी खबर लगती है वो गलत राहों पर चल पड़ते है.

६. बच्चो को समय न दे पाना : कुछ लोगो का मानना है की कामकाजी माता पिता बच्चो को समय नहीं दे पाते इसलिए बच्चे बिगड़ जाते है ,पर बात ये नहीं है बात ये है की माता पिता बच्चो को क्वालिटी टाइम नहीं दे पाते इसलिए बच्चे बिगड़ जाते है.कई बार माता पिता बच्चो के मन की बात नहीं समझ पाते बस उनकी जरूरते पूरी करके ,उनके हाथ में पैसे थमाकर ये समझ लेते है की वो बच्चे को पूरा प्यार दे रहे है उसकी हर जरूरत पूरी कर रहे हैं.और यही बात धीरे धीरे बच्चो को उनसे दूर कर देती है.बच्चे अपने दोस्तों में ही खो जाते है. एक मल्टीनेशनल में काम करने वाली सरला बताती हैं की "शुरू शुरू में जब मैं अपनी बेटी को घर पर छोड़कर जाती थी तो बड़ा दुःख होता था इसलिए छुट्टी के दिन अपना पूरा टाइम उसे देना चाहती हु पर अब धीरे धीरे लगने लगा की उसने जेसे मेरे बिना जीना सीख लिया अब में अगर उसके ज्यादा करीब जाने की कोशिश करती हु तो उसे पसंद नहीं आता वो अपनी दुनिया में मस्त है,वो मुझसे बातें छुपाने लगी है ,अब लगता है थोडा क्वालिटी टाइम दिया जाता तो ये नोबत नहीं आती ".बच्चो को अच्छा टाइम ,और पूरा ध्यान न दे पाना भी बच्चो को बिगाड़ सकता है.

७. शक्की माता पिता : 15 वर्षीया रोहित अपने मम्मी पापा के शक्की स्वाभाव से परेशान है जेसे ही मीडिया में बच्चो के बिगड़ने की कोई न्यूज़ आती है उसके कही आने जाने ,दोस्तों सब पर शक किया जाने लगता है वो कहता है " मम्मी पापा एसे बीहेव करते हैं जेसे मैं चोर हु मेरे कपडे चेक करते है हर बात पर शक करते हैं मैं परेशान हो गया हु ,वो मुझे समझना ही नहीं चाहते न ही ये समझना चाहते है की सब बच्चे एक जेसे नहीं होते अब तो असा लगता है जब तो किया ही जा रहा है तो बिगाड़ ही जाऊ".ये कई परिवारों का सच है किसी की बेटी भागी की अपनी बेटी पर पहरे बिठा देंगे,किसी का बेटा शराब पीता पकड़ा गया अपने बेटे को शक की निगाह से देखेंगे.बच्चो पर निगाह रखना अच्छी बात है पर बात बात पर शक करना ,उन्हें ताने देना उन्हें अकेलेपन का अहसास करता है और बिगड़ने में देर नहीं लगती.


परेंट्स क्या करें?
  1. बच्चो को रिश्तों की अहमियत समझाइए: बचपन से ही बच्चो   में अच्छे संस्कार डालिए.उन्हें रिश्तों का महत्व,शादी का महत्व हार बात समझाइए.और ये बात आप भी उनके सामने  फोलो करी अपने और अपने पार्टनर के रिश्ते को उनके सामने आदर्श दिष्ट बनाइये तभी उन्हें लगेगा की रिश्ते कितने महत्वपूर्ण है और वो कम उम्र में सेक्स जेसी हरकतों से दूर रहेंगे.
  2. अलग कमरा दीजिए अलग जिंदगी नहीं : अगर आपने अपने बच्चे को अलग कमरा दिया है तो शुरुआत से ही उसके कमरे में आते जाते रहिये वह बैठकर उससे बातें करिए ,पूरी कोशिश करिए की उस कमरे में उसकी जिंदगी सिमटकर न रह जाए.घर के सारे लोग कम से कम एक बार का खाना एकसाथ बैठकर खाइए इससे बच्चो में परिवार के लिए अपनापन पनपता है.घर के सारे लोग साथ बैठकर टीवी देखिए उसे अच्छे कार्यक्रम देखने के लिए प्रेरित करिए. धीरे धीरे वो आप लोगो  से अपनेपन की डोर से जुड़ जाएगा और ये डोर उसे आपसे अलग नहीं होने देगी.इन्टरनेट की सुविधा देने में कोई गलत बात नहीं पर ध्यान रखी की वो इन्टरनेट से कुछ गलत बातें तो नहीं सीख रहा.
  3. अच्छी बुक्स पढने की आदत डालिए: बच्चो में अच्छी बुक्स पढने की आदत डालिए क्यूंकि अच्छे बुक्स पढने पर उन्हें सही और गलत का अंतर समझ आएगा और वो गलत आदतों और चमक दमक से दूर रहेंगे.. अच्छा रोल मोडल चुनने में उनकी मदद करिए जरूरी नहीं की ये रोल मॉडल कोई बहुत सफल या पैसे वाला आदमी हो जरूरी ये है की वो अच्छा इंसान हो.उनका रोल मोडल अच्छा होगा तो वो बुरी आदतों से बचे रहेंगे... 
  4. पैसे से प्यार की पूर्ती:बच्चो की हर सही गलत मांग पूरी करना ठीक नहीं.आप उन्हें समय नहीं दे प् रहे इस हीन भावना मैं उन्हें पैसे देकर प्यार की पूर्ती मत करिए .जब भी बच्चा कोई मांग रखता है बिना सोचे समझे उसकी मांग पूरी मत करिए पहले समझिए की उसे उस चीज की कितनी जरूरत है अगर जरूत न हो तो उसे द्रढ़ता के साथ मन करिए और उसका सही कारन भी उसे बताइए . बचपने से ही उसे पैसे की अहमियत समझाइए ,उसे बताइए की पैसा मेहनत से आता है .जब आप उसे बचपन से ही उसकी गलत मांग को पूरा नहीं करेंगे तो वो खुद ही समझने लगेगा की क्या जरूरी है क्या नहीं.पर इसका मतलब ये नहीं की आप उसकी सही मांग भी पूरी न करे.
  5. बच्चो के दोस्त बनिए: बच्चा के दोस्त बनने की कोशिश करिए उन्हें हर बात शेयर करने की छूट दीजिए ,जब आपके बच्चे आपको दोस्त मानने लगेंगे तो वो अपनी हर बात हर परेशानी आपसे शेयर करेंगे . उनके सवालों के जवाब दीजिए .समय  आने पर उन्हें सेक्स  की जानकारी दीजिए.  बच्चो को समझाने के आपके अपने तरीके हो सकते है  पर उनकी जिज्ञासा को शांत करिए.हो सके तो काउंसलर की सलाह लीजिए की आप केसे अपने बच्चे से बात कर सकते है..बच्चे के दोस्तों और संगती पर नजर रखिये हमेशा ये मत कहिये की "बाहर जाकर खेलो" कोशिश करिए की उसके  दोस्त बीच बीच में आपके घर पर आए इससे आप भी उन्हें जान लेंगे और आपके बच्चे की संगती पर नजर रहेगी साथ ही साथ आप ये भी जान लेंगे की उनपर किसी तरह का गलत पीअर प्रेशर  तो नहीं.
              ६. बच्चो को  क्वालिटी टाइम दें : ये बिलकुल जरूरी नहीं है की आप पूरे समय अपने बच्चे के आस पास रहे पर अपना जितना भी समय आप उसे दे रहे है उसे क्वालिटी टाइम बनाने की कोशिश करिए ,उससे बातें करिए ,उसकी भावनाओं को उम्र के परिवर्तनों को समझने की कोशिश करिए.अगर वो कोई बात आपसे शेयर करना चाहता है तो उसकी बात सुनिए . अपने ब्बच्चे को इस बात का अहसास करवाइए की वो अकेला नहीं है आप हर समय उसके साथ है.



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Wednesday, October 31, 2012

द्वार से उकता गया है देहरी का मन

आसमान के इस कोने से लेकर उस छोर तक  वो हर रोज उसके आने की उम्मीद लगाती है ...हर सुबह उठकर उम्मीद  की डोर बांधती है दोनों छोर के बीच ....और सुखा देती है कुम्हलाए सपने ,बिसुरती यादें , अलसाए प्रेम गीत ,बस ये सोचकर की समय की सीलन कही इनकी चमक ना कम दे ...  नहीं मानती वो की धरती गोल है क्यूंकि धरती जो गोल ही होती तो वो लौटकर उसके पास जरुर आता ...जरूर ....

कुछ छोटी छोटी कविताएँ  या पंक्तिया  फेसबुक पेज से 

1 . 
एक  प्रारंभ से
एक प्रारब्ध तक...
गहन इंतज़ार से 
सुगम उपलब्ध तक ...
मोहि बन्धनों से 
निर्मोही मन तक ...
मेरी प्रार्थना से
तेरे वंदन तक...
प्रेम ही तो है 
जो हमें पिरोए हुए हैं....
2.
तुम्हारी खैर मांगना मेरा हक है जाना
खुदा से तुमको मांगना मेरा हक कैसे हो ?
मैं तुम्हे चाहता हू इस पर शक हो सकता है 
तुम्हारी चाहतों पर भला शक कैसे हो ? 

3.
मेरे साथ राहों पर चलना होगा मुहाल
अपने लिए कोई और रहगुज़र देखें 
बड़ा मुश्किल है साया हमारी पलकों का 
उनसे कह दो कही और अपना घर देखें 

4.
मंडी है व्यापार की ,भूख के सोदे का शहर है 
यहाँ सब बिकता  है बस दर्द नहीं बिकता 
 तुम रसूखदार मेरा वक़्त खरीद ही लोगे 
अहसास की कीमत लगाए ऐसा कोई नहीं दिखता 

5. 
बेकरारी करती है घायल उसे 
कर दिया है प्रेम ने पागल उसे 
भाता नहीं है अब किसी भी सत्य का दर्पण 
द्वार से उकता गया है देहरी का  मन 

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Tuesday, September 25, 2012

शेक्सपीयर का जुलियस सीज़र बनाम अन्ना और उनका पी आर

शेक्सपीयर का लिखा जुलियस सीज़र पढ़ रही थी कल रात ...पूरा नाटक नहीं कहानी रूपांतरण पढ़ा मैंने और पढने के बाद अलग अलग कई विचार मन में आए  सबसे पहले तो जिन लोगो ने इस नाटक को नहीं पढ़ा (मेरे जेसे कई लोग होंगे क्यूंकि मेने कल पहली बार ही पढ़ा ) वो जान ले की पूरी कहानी सीज़र की रोम विजय और उसके विरुद्ध षड़यंत्र रचने वाले विद्रोहियों के आस पास घूमता है ,उसके अपने खास लोग उसे खून से नहला देने  में कसर नहीं छोड़ते और उसका खास विश्वासपात्र ब्रूटस ही उसके खून से अपने हाथ रंगकर उसके मृत शरीर को सभा में ले जाता है और जनता के सामने ये सिद्ध करने की कोशिश करता है की  सीज़र अतिमहत्वाकांशी था इसलिए उसे मौत के घात उतारा गया ....

जब आप इस नाटक को पढ़ते हैं तो सीज़र की मौत का इक बहुत बड़ा कारण कैसियस  नाम का उसका वो बचपन का मित्र है जिसकी महत्वाकांशाएं काफी बढ़ जाती है और सीज़र के प्रति अपनी जलन के चलते वो उसके कई वफादारों को उसके खिलाफ भड़काता है  और विद्रोह की नीव रखता है और अंत में उसके ही वफादार मित्र ब्रूटस को लोगो के आगे खड़ा कर देता है ये समझा देने के लिए की सीज़र के साथ  जो हुआ वो सही है और उसी की गलतियों का नतीजा है ...अब चूँकि ब्रूटस की जनता के बीच अच्छी साख है और लोग उसे मानते हैं वो उसके शब्दों से प्रभावित हो जाते हैं  और सीज़र की मौत को सही मानने लगते हैं ...

ठीक उसी समय उसका इक सच्चा वफादार "ऐल्बिनस" 
सीज़र की लाश को हाथ में उठाए वहा आता है और लोगो को बताता था की सीज़र ने उनके लिए क्या क्या अच्छा किया है किस तरह उसने अपनी वसीयत में अपने निजी धन का बड़ा हिस्सा अपनी प्रजा के नाम कर दिया है और अपने निजी मनोरंजन  स्थल  जनता के आनंद  के लिए सार्वजनिक कर दिए हैं..किस तरह वो राजमुकुट धारण करने से मना करता है ...और ये सब बताकर वो मरे हुए सीज़र को विलेन से हीरो बना देता है ...
"ऐल्बिनस"  यहाँ कुछ अलग नहीं करता पर वो वही लोगो को सब बताता है जिसमे से कई बातें वो पहले से जानते है और जो नई बातें वो बताता है वो सीज़र के लिए लोगो के मन में सहानुभूति पैदा कर देती है और जनचेतना उमड़ पड़ती है ...
और अंत वही सारे विद्रोही जनता के हाथो  मारे जाते है और ब्रूटस अपनी करनी पर पछताता हुआ स्वयं आत्महत्या कर लेता है ....

पूरे नाटक के अपने अलग  अलग सार निकाले जा सकते है, भले आदमी या बुरे आदमी से जोड़ा जा सकता है ,विद्रोह के पीछे की सोच से जोड़ा जा सकता है पर में पब्लिक रिलेशन की विद्यार्थी रही हू और इस नाटक को पढ़कर मैंने इसे पी आर से जोड़कर देखा...इक मरा हुआ (विद्रोहियों द्वारा मार दिया गया ) व्यक्ति जो नाटक की पृष्ठभूमि से भला व्यक्ति दिखता  है (वो है या नहीं ये कहना अभी मेरे लिए मुश्किल है ) अपने मरने के बाद विद्रोहियों द्वारा अति महत्वकांशी सिद्ध कर दिया जाता है जनता उसका विरोध करती है उसे बुरा समझती है पर तभी उसका वफादार उसकी अच्छाइयाँ गिनकर उसे हीरो साबित कर देता है ...सारा खेल पी आर का है अंतर बस इतना है की ये पी आर  (इमेज बिल्डिंग ) सीज़र की मौत के बाद किया गया...अच्छी और सोची समझी रणनीति ने सीज़र को लोगो के मन में अमर बना दिया ...

अब इस पूरी घटना को वर्तमान परिद्रश्य में अन्ना के आन्दोलन के साथ जोड़कर देखा जाए तो हम पाएँगे की अन्ना भले और देशभक्त व्यक्ति  है उनका आन्दोलन भी सही दिशा में जा रहा था लोग टीम अन्ना के साथ थे , देशभक्ति की बयार चल रही थी  भ्रष्टाचार के खिलाफ लाम बंदी हो रही थी सब ठीक था अचानक आन्दोलन की हवा निकल गई , टीम में फूट जेसे आसार दिखने लगे अलग अलग रस्ते दिखने लगे लोगो का विश्वास डगमगाता दिखने लगा...
यहाँ में टीम अन्ना की कमियों खामियों की बात नहीं करुँगी पर इक बड़ी गलती जो रही वो थी सही ढंग से किए गए पी आर की कमी ....
ना ढंग से इमेज  बनाई  गई जो बना ली गई उसे ठीक से संभाला नहीं गया ...अलग अलग लोग अलग अलग बयान और अलग अलग निकले गए अर्थो ने कई अर्थों का अनर्थ कर दिया ...इक महान बनता जा रहा कार्य ,आम सा रह गया इक आन्दोलन अंधड़ जेसा आया और  चला गया वो भी लोगो को कई गुटों में बांटकर .....

जबकि होना ये था की आन्दोलन के दौरान और उसके बाद भी सही ढंग से इसका पी आर किया जाता ..अलग अलग लोगो को बयान देने से रोका जाता , प्रचार प्रसार के लिए सही रणनीति बनाई  जाती , विरोधियों के बयानों का सही सही योजना के तहत जवाब दिया जाता तो इक बेहतरीन आन्दोलन एसे बुलबुले की  तरह फूटता नहीं  बल्कि लम्बे समय तक चलता और अपना उद्देश्य भी पूरा करता ....
अन्ना का आन्दोलन जब दम तोड़ता दिख रहा था उस समय भी अगर सही ढंग से इमेज बिल्डिंग की जाती ,मीडिया का सही प्रयोग किया जाता ( ना की उसके विरोध में बयानबाजी की जाती ) अपनी ढपली अपने राग की तरह आन्दोलन को बार बार ना मोड़ा जाता तो सफलता के चांस कई गुना बढ़ जाते ...

खैर  ! आगे की कहानी तो वक़्त ही बताएगा पर जिस तरह सीज़र को  "ऐल्बिनस" ने महान साबित कर दिया ठीक वैसे ही अन्ना को भी एसे आदमी की जरुरत है जो आन्दोलन को फिर से सही रुख में मोड़ दे क्यूंकि ये सच है आन्दोलन करना अलग बात है और छवि निर्माण करना अलग और उस छवि को सकारात्मक बनाए रखना अलग ....आपका एक कमेन्ट मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा और भूल सुधार का अवसर भी

Monday, September 24, 2012

है बड़ा प्यारा हमारा प्रेम

गाहे बगाहे याद आ जाता है यूँ 
दर्द का ढाला बिचारा प्रेम...
है यहाँ सारे  सिपहसालार और 
विरह का मारा हमारा  प्रेम

वो कभी जो इश्क के उस्ताद थे 
लगता उन्हें अपना आवारा प्रेम 
छोड़ दे कैसे बीच मझधार में 
नाज़ से पाला संवारा प्रेम 

हो भले  सबकी आँखों की किरकिरी 
अपनी आँख का तारा ,हमारा प्रेम 
उथला नहीं बहता भरे बाज़ार में
गहराई में हमने उतारा प्रेम 

चाँद की ख्वाहिश ना खुशियों की तलब 
दरवेश बंजारा हमारा प्रेम 
हम मिले या ना मिले बना रहे 
ये यादों का हरकारा दीवाना प्रेम ....

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Friday, September 21, 2012

उन बेवफाओं के किए क्या दिल लगाना छोड़ दे ?

जो छोड़कर जाते हैं अपने इश्क को मझधार में 
उन बेवफाओं के किए क्या दिल लगाना छोड़  दे ?
जिन रास्तों ने ज़ख्म देकर पैरों को घायल किया 
जब वो ना फितरत छोड़े अपनी तो 
हम क्यों उन रास्तों पर जाना छोड़ दे ?


हे इश्क वो दाता जिसने 
भटकती रूह सा जीवन दिया 
और वो कहते हैं की हम 
इश्क से खौफ खाना छोड़ दे 

वो कहते हैं हमसे सरेराह 
यूँ नशे में चलना बंद करो 
हमें डर हैं मोहब्बत की 
खुमारी के उतर जाने का 
गर साथ वो अपने हैं तो 
फिर हमारी नज़रों का काम क्या
कैसे  दुनियादारी की ख़ातिर 
उनका सहारा छोड़ दे ?

जाने वाले ऐसे गए 
ज्यो शाख से पत्ते गए 
वो ना आएं लौटकर तो 
आस भी लगाना छोड़ दे ?
किस घडी वो लौट आएं 
,इश्क का अहसान हो 
राह में कैसे भला 
दिया जलाना छोड़ दे ? 

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Thursday, September 20, 2012

गणेश जी मुंगडा ओ मुंगडा से जन्नत की हूर तक


पिछले साल के मुंगडा  ओ  मुंगडा   वाले गणेश इस वर्ष कोई जन्नत की वो हूर नहीं के साथ आए....अजीब लगता है ना सुनकर पर हाईटेक ज़िन्दगी के साथ लोगो ने पहले गणेश जी को हाईटेक बनाया और अब गणेश पंडालों में बजने वाले गाने आपको चौका देंगे गणेश जी भी सोचते होंगे क्या है भाई कुछ तो शर्म करो

मंगलवार रात जब में अपने किचन में खाना बना रही थी बाहर बड़ा शोर था बेन्ड बज रहे थे हल्ला गुल्ला था  और फिर आवाजें पास आती गई और बेकग्राउंड  में इक गाना गूंजा "जिसे देख मेरा दिल धड़का मेरी जान तड़पती है कोई जन्नत की वो हूर नहीं मेरे कोलेज की इक लड़की है " (फूल और कांटे ) इक बार को तो मन खुश हो गया (मुझे पसंद है ये गाना) लगा लगता है कोई बारात आ रही है फिर ध्यान आया ये तो भक्त लोग अपने प्रिय गणेश जी को पंडाल तक ला रहे हैं थोड़ी देर के लिए बड़ा अजीब लगा क्या है ये? लोग बेसिक मर्यादाएं भी क्यों भूल जाते हैं एसा लगता है जेसे बेन्ड वाले को पैसा दिया है तो पूरा ही वसूलेंगे चाहे उपलक्ष्य कोई भी हो हर तरीके के गाने बजवा लिए जाए और उन पर डांस भी कर लिया जाए पाता नहीं फिर कब नाचना मिले.

शादियों में भी बड़े बूढों की उपस्थति का ख्याल करके  फूहड़ गाने नहीं बजवाए जाते पर सार्वजनिक ईश्वरीय  कार्यक्रमों में ये सब क्यों ? क्या इश्वर का कोई लिहाज नहीं .... ये तो ठीक है पिछले साल जब गणेश जी आए थे तो गाना था "मुंगडा  ओ  मुंगडा मैं गुड की डली " सुनकर लगा था हद्द है इश्वर ने लोगो को इक दिमाग दिया है उसका प्रयोग ना करेंगे तो जंग ना लग जाएगा ? या उसे बचाकर क्या इश्वर को वापस देना है की हे इश्वर हम तो इसका प्रयोग कर नहीं पाए पूरा बचाकर ले आए अब आप ही इसका अचार डाल लीजिए ....

इतिहास कहता है पेशवाओं ने गणेशोत्सव को बढ़ावा दिया। कहते हैं कि पुणे में कस्बा गणपति नाम से प्रसिद्ध गणपति की स्थपना शिवाजी महाराज की मां जीजाबाई ने की थी। परंतु लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणोत्सव को को जो स्वरूप दिया उससे गणेश राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बन गये। तिलक के प्रयास से पहले गणेश पूजा परिवार तक ही सीमित थी। पूजा को सार्वजनिक महोत्सव का रूप देते समय उसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि आजादी की लड़ाई, छुआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने तथा आम आदमी का ज्ञानवर्धन करने का उसे जरिया बनाया और उसे एक आंदोलन का स्वरूप दिया। इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में गणेशोत्सव का जो सार्वजनिक पौधरोपण किया था वह अब विराट वट वृक्ष का रूप ले चुका है। वर्तमान में केवल महाराष्ट्र में ही 50 हजार से ज्यादा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात में काफी संख्या में गणेशोत्सव मंडल है।

पर हमने इस त्यौहार को क्या रूप दे दिया , इक अलग पंडाल या स्टेज बनाकर विभिन्न प्रतियोगिताएं  आयोजित करना (जिनमे गीत संगीत प्रतियोगिता भी शामिल हो सकती है ) इक अलग बात है उनका विरोध में नहीं कर रही क्यूंकि ये सार्वजनिक उत्सव है और एसे ही उत्सवों के दौरान बच्चो और बड़ों को प्रतिभा दिखने का मौका मिलता है और कई बार एसी प्रतिभाओं को सही दिशा मिल जाती है पर इस उत्सव में देवता भी सम्मिलित है और उनका लिहाज रखना भी बनता है ... 

एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा है की जेसे ही गणेशोत्सव  समाप्त होता है और गणेश विसर्जन होता है उसके बाद का नदियों तालाबों और समुन्दर का नज़ारा भी देखने लायक होता है प्यार से लाए हुए गणेश जी ठोकर खाते दिखाई देते हैं  हर जगह प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की मूर्तियाँ कही गणेश जी की सुंड कही कान दिखाई देते हैं सच में एसा लगता है गणेश जी अपनी किस्मत पर रोते होंगे और दुर्गत पर भी ....इसका एक बेहतर उपाय है इको फ्रेंडली मूर्तियाँ  पर लोग उन्हें अपनाते नहीं और सार्वजनिक पंडालों का स्टार तो जेसे गणेश जी मूर्ति के साइज से नापा जाता है जिसकी मूर्ति बेहतर वो पंडाल बेहतर ,वहा चंदा ज्यादा ...और गणेश जी बन गए धंधे का हिस्सा .....
काश लोग एक छोटी इको फ्रेंडली मूर्ति की स्थापना करे और जो पैसा बचे उसका कही बेहतर जगह प्रयोग करे ......तो पर्यावरण भी बेहतर हो और जरूरतमंद की मदद भी....

उम्मीद हे आज नहीं तो कल ताक पर रख दिया गया दिमाग उतारा जाएगा और उसका सही प्रयोग किया जाएगा  ताकि एसे सार्वजनिक उत्सव सिर्फ शोर शराबा ना लाएं  बल्कि कई जरुरतमंदों के लिए खुशियाँ भी ले आए.... 
ये लेख मीडिया दरबार   और भास्कर भूमि पर भी देखा जा सकता है 
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Monday, September 17, 2012

नाउ प्रेक्टीकल प्रेमीझ आर इन ट्रेंड


प्रेम के प्रतिमान बदल गए हैं और इनका बदल जाना निश्चित भी था जब रिश्तों के लिए हमारी विचारधारा बदल गई ,जिंदगी में रिश्तों के मायने बदल गए ,घर बाहर इंसानों  की भूमिकाएं बदल गई तो प्रेम का बदल जाना कोई नई बात नहीं ...लोग कहते हैं प्रेम को पढने वाले कम हो गए पर मुझे लगता है प्रेम को करने वाले कम हो गए हैं  जबकि पढने वालो की संख्या तो बढ़ रही है  क्यूंकि प्रेम करना अब उतना आसान नहीं रहा (वैसे पहले भी आसान नहीं था) शायद इसीलिए लोग प्रेम पढ़कर जीवन में प्रेम की पूर्ती कर लेते हैं अब सामाजिक दीवारें तो हैं ही साथ ही साथ प्रेक्टिकल  विचाधारा ने भी प्रेम की राह में रोड़े अटकाना प्रारंभ कर दिया है .
बदलती जीवनशेली ने प्रेम को सबसे बड़ा झटका दिया है सामान्य  तौर पर प्रेम करने की उम्र १६ से २२,२३ वर्ष की मानी जा सकती है पर आजकल ये समय लड़का और लड़की दोनों के करियर बनाने का होता है ,प्रेम के अंकुर नहीं फूटते ऐसा नहीं है पर शायद प्रेक्टिकल सोच की खाद प्रेम की खाद से ज्यादा असर करती है और वो अंकुर उतनी तेजी से नहीं बढ़ते .....

वैसे ये सच है प्रेम की कोई उम्र नहीं होती पर परिपक्वता की ,समझदारी के आने की और बचपने के जाने की एक उम्र होती है ...ये बात जिन पालकों ने समझ ली उन लोगो ने अपने बच्चो के बचपने को एक एसी राह पर पर डाल दिया जहाँ उन्हें अपना सुनहरा भविष्य दिखाई देता है प्रियतम के सपनो की जगह उजले भविष्य और कुछ कर दिखाने  के जज्बे के सपने आँखों में घर कर जाते है...एक तरीके से देखा जाए तो ये सही है क्यूंकि बचकाना प्रेम और आवेश में उठाया गया कदम कई बार भारी पड़ता है जबकि समझदारी आने के बाद किया गया प्रेम और लिए गए निर्णय बच्चो को भटकने से बचा  लेते हैं ....

ये एक तरह का संधिकाल है जब कॉलेज जाते घरों से बाहर निकलते बच्चे प्रेम में तो पड़ते हैं पर थोडा प्रेक्टिकल होकर सोचते भी हैं लड़के २७,२८ की उम्र तक पढाई और करिएर में व्यस्त रहते हैं और भारत के बहुत बड़े हिस्से में आज भी लड़कियों के लिए शादी की सही उम्र २४, वर्ष है एसी स्तिथि में कई बार लड़के ठीक ढंग से पैरों पर खड़े हो जाने तक शादी की जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहते  और लड़कियां बहुत लम्बे समय तक इंतज़ार ना कर सकने की मजबूरी के कारण कही और शादी  कर लेती हैं . अलग अलग लोगो की नज़र में इसके अलग अलग मायने हो सकते हैं ,कुछ लोग इसे बेवफाई, धोखा जेसे नाम भी देते है पर ये आज का सच हैं...आज की आधुनिक पीढ़ी का सच...और ऐसा   सच जिसमे गलत कोई नहीं दोनों अपनी अपनी जगह सही हैं 

आजकल कई एसे जोड़े  मिल जाएँगे जो चाहकर भी शादी  के बंधन में नहीं बंध  सकते यहाँ तक की समाज के विरोध की तो नोबत ही नहीं आती क्यूंकि युवा स्वयं ही परिस्थितियों को देखते हुए पीछे हट जाते हैं...या कहा जाए तो प्रक्टिकल सोच के चलते प्रेम की पीगें नहीं भर पाते....ऐसा ही कोई निर्णय हर तीसरा युवा लेता दिखाई देता है दोस्ती होती है प्यार होता है और फिर शादी ना हो पाने की अलग अलग परिस्थतियों के चलते  प्रेमी "गुड फ्रेंड "की श्रेणी में आ जाते हैं इनमे से कई तो वर्षो तक अच्छी दोस्ती निभाते भी हैं और एक दुसरे को किसी तरह का दोष देते भी नहीं दिखाई देते ...

कहने को कितना ही कहा जाए आज की पीढ़ी दिशा विहीन है पर सच तो ये हैं की जितनी समझदार और मानसिक रूप से सुद्रढ़ आज की पीढ़ी है वो लोगो की सोच से भी परे है ...जितनी संवेदनाएं, प्रेम और समझदारी आज की पीढ़ी  के इन प्रेक्टिकल प्रेमियों में हैं उतनी कम ही लोगो में देखने मिलेगी...इसमें कोई दोमत नहीं की घर के माहोल और माता पिता के संस्कारों ने उन्हें एसा बनाया है और ये माता पिता उस पीढ़ी के थे जो अपनी चाहतो को पूरा नहीं कर पाए तो उनने कुछ समझदारी भरे सपने अपने बच्चो की आँखों में दिए....और उन्हें सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता भी दी .

जब भी इस तरह का कोई मुद्दा उठता है तो मुझे लगता है  ये परिवर्तन का दौर है प्रेम विवाह आज नहीं तो कल सभी घरों में होंगे पर मुख्य मुद्दा ये है की किस तरह से इन प्रेम विवाहों को भटकाव के दौर की जगह समझदारी भरे प्रेम विवाहों में बदला जाए और  गलत ढंग और गलत रीति से परिवर्तन को अपनाने की जगह समझदारी भरे निर्णय लेने वाली पीढ़ी तैयार की जाए जो जिंदगी को जुए की तरह ना खेले...इन पंक्तियों को पढ़कर कई लोगो को शायद ये लगे की में प्रेम के विरोध में बात कर रही हू ,या प्रेम तो दिल से किया जाता है दिमाग का इसमें क्या काम ? सहमत हू इस बात से पर में ये भी मानती हू की प्रेम दिल से किया जाता है पर जिंदगी  दिल से नहीं जी जाती ...कोई प्रेम तभी सफल हो सकता है जब उसके पीछे प्रेम भरी दुआएं हो और हाँ प्रेम करने वालों को आटे दाल का सही भाव पता हो...

आज की पीढ़ी में एसे लोगो की संख्या बढ़ रही है जो प्रेम में गैर जिम्मेदाराना हरकत करने के स्थान पर समझदारी भरे प्रयास करते हैं और निर्णय भी उसी ढंग से लेते है ये संख्या कम है पर ये युवा आने वाली युवापीढ़ी के लिए आदर्श का काम करते हैं या भविष्य में कर सकते हैं....और जिस दिन प्रेम में जिम्मेदारी की ये भावना भी समाहित हो गई प्रेम का एक अलग ही आयाम दिखाई देगा....

(पूरा लेख पढने वालो को प्रेक्टिकल विचारधारा वाला लग सकता है पर ये बदलती विचारधारा बदलते युवाओं का प्रतिनिधि लेख है पर ये सच है प्रेम का अर्थ सिर्फ पाना नहीं ....) इस पोस्ट को भास्कर भूमि  एवं मीडिया दरबार  पर भी देखा जा सकता है

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Tuesday, September 4, 2012

"मैंने कहा था"


"मैंने कहा था" उसकी जिंदगी का हिस्सा है 
ज़िन्दगी में मौजूद हर शख्स 
बस ये तीन लफ्ज़ बोलकर 
अपनी हर चिंता से मुक्त हो जाता है 
या स्वयं को शासक और उसे सेवक 
की जगह खड़ा कर देता है हर रोज़ 

सुबह से लेकर रात तक वो 
"मैंने कहा था" में उलझी रहती है 
 अब तक नहीं हुआ ये काम
मेरे जूते धुप में रखना
स्त्री के कपडे दे आना
खाने में ये बनाना
इस रिश्तेदार से एसे मिलना
उससे  एसे बात करना 
इस त्यौहार पर ये रीत निभाना
घर आँगन एसे सजाना
बच्चो को ये सब सिखाना 

और भी ना जाने कितने 
"मैंने कहा था" के साथ जुड़े वाक्य 
और कहा अधुरा रह जाने पर जुडी कडवी बात 
हर रोज वो अपने आस पास मंडराती देखती है .
अलग अलग लोग पर बस तीन शब्द 
जिन्हें बोलकर वो आज्ञा देते हैं 
और वो करती है कोशिश हर
मैंने कहा था को पूरा करने की 
सारे "मैंने " सारे "मैं" उसके आगे
 विकराल रूप धारण करते हैं
और वो हर रोज़ सोचती हैं
वो भी तो कुछ कहती है
कभी सुना है किसी ने ? 


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Monday, September 3, 2012

मिलोगे बस मेरे दिल में ....

इस कविता में इक खास बात है इसे लिखते समय पैराग्राफ की तरह लिखा गया फिर जाने क्यों लगा कविता सी हो गई तो बस कुछ पंक्तियों में शब्द कांटे छांटे   एंटर मारा और बस ये कविता बन गई अब कितने लोगो को ये कविता लगेगी नहीं जानती .....

 जिंदगी का हर कतरा जेसे इक ख़त 
 मैं तुम्हे लिखती थी लिखती हू 
 लिखती रहूंगी जब तक साँस है 
हर शब्द ,उम्मीद से  है 
हर मात्रा जन्म देती है तेरे अहसास को 
हर नुक्ते का ख्वाब तुम्हारे दिल में 
हर्फ़ (शिलालेख) सा ख़ुद जाने का, 
ये बात शायद तुम समझ गए
तभी तुम्हारा दिल शिला हो गया .....

 मेरा ये इश्क पन्ना दर पन्ना
मुझे अमृता बना देता है 
तुम भी मेरे कल रहे ?
शायद कल भी रहो ?
पर ना जाने क्यों
तुम मेरे इमरोज़ (आज) नहीं होते 
एसे ही बस ये ख़त भी बढ़ता जाता है 
और स्याही भी खत्म नहीं होती...

कहने को तुम फकीर से हो
पर मेरे दर पर नहीं आते 
मेरे लिए तुम शहंशाह सी 
शक्शियत के हो जाते हो 
जो इश्क तुम्हे चाहिए 
वो मुझे देने आना होता है दस्तक देकर 
प्यासे और कुए का अंतर नहीं होता......

लोग मेरे दर पर आकर 
तुम्हे पुकारते हैं 
शायद जानते हैं तुम चाहे 
दुनिया में कहीं भी देखे जा सकते हो 
सड़कों पर,नदी किनारे या भीड़ में गुमसुम 
पर मिलोगे बस मेरे दिल में .....

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Friday, August 31, 2012

वो स्याही जिसने मेरी कलम को अर्थ बख्शा है

वो स्याही जिसने मेरी कलम को अर्थ बख्शा है 
लोग कहते हैं उसका रंग तेरे आंसुओं सा है
काली रात,काली आँखें  गहरे दर्द में डूबी  
शक होता है सब पर रंग  तेरे गेसुओं का  है

मुस्कुराहटों ने मायूसी का कफ़न पहना है ,
 खिलखिलाहटें  लौट आने की दुआ करती है
सारा शहर ही जैसे उदास ,तनहा है ,
लगता है सबका हाल तेरे मजनुओं सा है

वो बादल जो तेरे लिए  घुमड़कर बरसता था 
खामोश मंडराता है अब तेरे इंतज़ार में 
ताने देती  है दुनिया पर सूना सा फिरता है 
आजकल वो भी बड़ा  बेआबरू सा है 

दिल जिसमे  तस्वीर तेरी धुंधली नहीं होती 
होता है सजदा आज भी उतनी ही शिद्दत से
बस फर्क है इतना की अब उत्सव नहीं होता
जो मंदिर था कल तलक वो अब मकबरा सा है

Wednesday, August 29, 2012

डायरी के पन्नो में वो लड़की

मैं फेसबुक पर लिखने की आदि हू वहा से कुछ चीज़ें ब्लॉग तक आ पाती  है कुछ वही रह जाती है ...कुछ एसे ही  पेराग्राफ ले आई हू आज ..इन्हें किस श्रेणी में रखा जाए समझ नहीं आ रहा इन्हें मेरी डायरी का हिस्सा माना  जा सकता है 
ज़िन्दगी में पहले प्यार सा पहला कुछ नहीं होता ,ना वेसा रुपहला ना वेसा खूबसूरत....और पहले टूटे प्यार से ज्यादा कुछ इंसान को तोड़ता भी नहीं ..... जिस्म ,रूह सब शायद इन सबके आने जाने से इतना दुःख ना हो जितना उसे अपने पहले प्यार के बिखर जाने से हुआ (ऐसा उसे लगता था ) पर ऐसा होता नहीं सिर्फ पहला कह देने से प्यार सच्चा हो जाए ये ज़रूरी नहीं हर पहले के साथ सच्चा जुड़ा होना ज़रूरी है .....सच्चा प्यार पूरा होना ना हो इंसान को तोड़ता नहीं मजबूत कर देता है....
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लड़की बात में कहती है मैं मर जाउंगी तब तुम समझोगे और लड़का उदास सा दिखने लगता है कुछ क्षणो के लिए और फिर मगन हो जाता है अपनी गढ़ी व्यस्तताओं में ...लड़की की आँखें छलछला जाती है .... फिर वो रूठने के से अंदाज़ में सोचती है मेरी जिंदगी तुम्हारे प्यार और अपनेपन की कमी में मर जाएगी इक दिन तब ही तुम्हे मेरे प्रेम का अहसास होगा...जानती है अगर एसा हो गया तो लड़का बड़ा उदास होगा पर अब वो हार मान चुकी है....
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कभी कभी अचानक से लड़की सोचती है अब उसे इंतज़ार की इतनी आदत हो गई है की किसी दिन अगर मोहब्बत उसके सामने आकर उसकी आँखों में आँखें डालकर खडी हुई तो भी वो शायद उसे पहचान ना पाए...दर्द लिखते लिखते उसे दर्द की आदत सी लगने लगी है एसी आदत जो एकदम अफीम के नशे सी है सारी हवा में मदहोशी फेलाती सी ...थोड़ी देर दर्द की मदहोशी कम हुई की तलब उठने लगती है ,वो लड़का अब उसे चाँद की तरह प्यारा है पाना भी है पर पाना भी नहीं ...उसी को वो कभी तकिया बनाकर रो लेना चाहती है ,कभी उसे दूर से देखकर विरह गीत गा लेती है , वही प्रेमी है वही सखा है ,सारे ताने उलाहने सब उसके हैं....उसे चाहती बहुत है पर अपना बनाना नहीं चाहती....सच है विरह प्रेम से कई ज्यादा गहरा राग है ,और विरह का रिश्ता कई ज्यादा गहरा भी है शायद....
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लड़की कहती है तुम मेरा इनाम कभी थे ही नहीं क्यूंकि इनाम तो जीते जाते है पर मैंने तुम्हारे लिए कोई प्रतियोगिता नहीं लड़ी ,किसी दौड़ में भाग नहीं लिया ना बाधा दौड़ ना सामान्य दौड़ ना रिले रेस ,रिले रेस तो तुम्हारे लिए में कभी दौडती नहीं तुम्हे इक हाथ से दुसरे हाथ में जाते देखना कभी मेरे बस का नहीं था ,तुम्हे एसे पाने से ना पाना शायद बेहतर होता....पर बिना किसी द्वन्द के तुम मेरी झोली में आ गिरे इसीलिए तो दिल कहता है तुम मेरा इनाम नहीं हो तुम तो मेरी ईदी हो बड़ों के आशीर्वाद जेसे एकदम दिल से दिए हुए और दिल तक लिए हुए....
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मैने तुम्हारा प्रेम संसार बड़ी ही बारीकी से गढ़ा हर उस स्त्री की तरह जो प्रेम में अटूट विश्वास रखती है जिसका प्रेम स्वप्न संसार के अधिक करीब होता है पर रचनाकार की वेदना तुम क्या जानो तुम बस हर बार इस संसार का कोई अंश तोड़ देते हो और मुस्कुराते हुए निकल जाते हो ,और मैं ध्वस्त अंश की किरचें समेटने में लग जाती हू ...संसार इस संसार पर ऊँगली उठा सकता है कमी बेशी भी निकाल सकता है उसने इस संसार की रचना के लिए अपनी रूह की मिटटी नहीं लगाईं सच है रचनाकार की वेदना कौन जाने....
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जब जब कसी सड़क से गुजरती हू मेरी दिशा के विपरीत दौड़ते बिजली के तार मुझे तुम्हारे मेरे रिश्ते की याद दिला देते हैं ...मजबूती से हर आग को अपने अन्दर छुपाए हुए रिश्ता ,गलतियाँ किसी दुसरे की और ख़ुद को झुलसा लेने वाला रिश्ता....कुछ ऐसा ही तो गंतव्य तक सही ढंग से पहुंचा तो रौशनी ही रौशनी होगी और अगर कही उलझ गया,कही अटक गया तो तबाही ही तबाही.....
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हाँ हाँ हाँ मेरा दिल कहता है मैं तुम्हे लिख लुंगी इक दिन इक क्षण आएगा जब में तुम्हे लिखकर मुक्त हो जाउंगी पूरी तरह मुक्त और स्वतंत्र ,तब तक तुम अपनी सारी शक्ति एकत्रित कर लो ताकि तुम मेरे शब्दों में लिखे ख़ुद को पढ़ सको....
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किस्सा अगर सिर्फ पूर्णता का होता तो शायद किस्सा कभी होता ही नहीं ,क्यूंकि तब तो हर किस्सा सपाट सा होता पर हर किस्से का किस्सा होना तो उसके उतार चढ़ाव पर टिका है अदृश्य धुरी है ना आज तक ग्लोब के सिवा किसी ने पृथ्वी की देखी और ना ही किसी रिश्ते की...तो पूर्णता की ये बात भी बस अदृश्य सी होती है ..हर बार वो अपना इक हिस्सा तुम्हारे पास भूल आती है और हर बार तुम्हारा हिस्सा अपनी आँखों में ले आती है...दोनों पूर्ण होकर भी अपूर्ण हो ...क्यूंकि तुम्हारी कहानियां नहीं किस्से फैलने वाले हैं कहकशां में...और किस्से कभी पूरे कहाँ होते है....? सही है ना?
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वो लड़का ,उस लड़की के जगती आँखों का सपना हुआ करता था कभी (आखिर असली सपने तो यही होते हैं ना जगती आँखों वाले) पर आज वो नींद के सपनो में भी उसे नहीं देख पाती ,कितनी कोशिश करती है ख़ुद को तैयार करती है की काश वो ! ख्वाबों में आए पर रात को आँख लगने से लेकर सुबह खुलने तक बस अँधेरी खाई का सपना आता है घनी अँधेरी खाई जहा से वो निकल जाने की कोशिश करती है रात भर पर निकाल नहीं पाती....लड़का उसका प्यार था कभी आज भी हो शायद पर अब ये प्रश्न ख़ुद से पूछने की हिम्मत नहीं होती उसकी ना अब समय मिलता है ...रिश्ते बंध जाने के बाद ऐसा ही होता है शायद
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तुम्हारे नाम अब कोई चिट्टी लिखने का मन नहीं करता की जानती हू वो चिट्ठिया मेरे आंसुओं की नमी से कितनी ही भीगी हुई हो तुम्हारे प्रेम की धूप अब उन्हें सुखा नहीं सकती ...की मेरे अक्षर कितना ही तुम्हे खोज लाना चाहे तुम इतने दूर चले गए हो हो अब कोई खोज तुम्हे पा नहीं सकती...शायद प्रेम एसे ही मर जाता है.....हमेशा हमेशा के लिए....

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फेसबुक पतन की ओर ?

ज्यादा समय नहीं हुआ जब 'ऑरकुट' हम सब का चहेता था जिस तरह हम आजकल फेसबुक को जिंदगी का हिस्सा मानते हैं ठीक वैसे ही उस समय 'ऑरकुट' जिंदगी का हिस्सा था हाँ इस हद तक स्टेटस अपडेट करने का चलन नहीं था पर जो भी था जितना भी था सबकुछ 'ऑरकुट' था ,पर अचानक से फेसबुक की बयार आई लोगो ने फेसबुक पर अकाउंट बनाना शुरू किया और थोडा समय निकला की लोग पूछने लगे तुम फेसबुक पर हो और एसे कुछ लॉयल लोगो ने भी अंतत : फेसबुक पर अकाउंट बनाया क्यूंकि उनके सारे मित्र फेसबुक का रुख कर चुके....अब तो ये हाल है की मुझे ख़ुद अपना 'ऑरकुट' का अकाउंट ओपन किए महीनो बीत गए होंगे यहाँ तक की पिछले लगभग २ साल में शायद मुश्किल से २,४ बार चेक किया होगा वो अकाउंट . लोगो में फेसबुक का क्रेज़ है और स्मार्टफोन ,टेबलेट्स और अन्य आधुनिक गेजेट्स ने फेसबुक की लोकप्रियता को और भी बढ़ा दिया ...पर आजकल सुगबुगाहट है की जितनी तेज़ी से फेसबुक की लोकप्रियता बढ़ी ,जितना ज्यादा ये जिंदगियों का हिस्सा बना उतना ही जल्दी इसका नशा उतरेगा और लोग इससे दूर होते चले जाएँगे पर ये भी सच है की धुआ उठ रहा है तो आग कही ज़रूर होगी ..

ये आग सिर्फ दिखने वाली नहीं है इसके पीछे कई कारण है सबसे बड़ा कारण देखा जाए तो वो फेसबुक का जन्म के इतिहास में छुपा है कई लोग है जो ये बात नहीं जानते की हॉवर्ड यूनीवर्सिटी में पढने वाले स्टुडेंट्स के इक ग्रुप ने अपने कॉलेज के लिए इक प्रोजेक्ट बनाया पर उनमे से एक छात्र मार्क जुकरबर्ग ने वो प्रोग्रामिंग बाद में फेसबुक के नाम से लॉन्च की .इसके लिए उनके साथी छात्रों ने बिना अनुमति और सहमती के प्रोग्राम यूज करने के लिए उनका विरोध भी किया ,इस तरह देखा जाए तो फेसबुक एक तरह की चोरी से बनाई गई सोशल साईट है.
ये सच है की व्यापार में नैतिकता एक अलग मुद्दा है और इसका सम्बन्ध फेसबुक के पतन जोड़ना शायद ठीक नहीं पर इस कम्पनी की अपने यूज़र्स के प्रति भी कुछ नैतिक जिम्मेदारियां है पर फेसबुक पिछले कुछ समय जिस तरह से अपने निर्णय यूज़र्स पर थोप रहा है वह फेसबुक के लिए अच्छे भविष्य के संकेत नहीं हैं .

ज्यादा समय नहीं हुआ जब फेसबुक ने अपने यूज़र्स को टाइमलाइन के प्रयोग के लिए सिर्फ ७ दिन का समय दिया था और उसके बाद सभी प्रोफाइल टाइम लाइन पर शिफ्ट हो गए थे , फेसबुक के इस कदम से आज भी कई यूज़र्स नाराज़ दिखते हैं इसी के साथ फेसबुक ने अपनी ईमेल सेवा लॉन्‍च करके एक बार फिर यूजर्स को अनदेखा किया . यूजर्स की राय लिए बिना फेसबुक ने सभी यूजर्स को नया ईमेल आईडी ‘yourname@facebook.com’ दे दिया. यह ईमेल यूजर्स के टाइमलाइन में बतौर प्राइमरी आईडी दिखने लगा है. फेसबुक के इस कदम की भी काफी आलोचना भी हुई . अधिकतर यूजर्स ने तो इस ईमेल आईडी को नकार दिया है. शायद ही कोई यूजर इस आईडी का इस्‍तेमाल कर रहा होगा.
हाल ही में फेसबुक ने सरकारी दबाव में आकर कई प्रोफाइल बंद कर दिए यहाँ तक की लोगो को मेसेज भेजे गए की वो अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग उनके हिसाब से नहीं करेंगे तो उनके प्रोफाइल बंद कर दिए जाएँगे इन सभी बातों के कारण कुछ लोगो ने ख़ुद ही फेसबुक से कन्नी काटना शुरू कर दिया है .

निवेशको के लिए फेसबुक द्वारा जरी किए आई पी ओ भी खटाई में पड़ते दिखाई दे रहे है 2012 की शुरुआत में फेसबुक ने दावा किया कि उसका फायदा पिछले साल की तुलना में 65 फीसदी बढ़कर एक अरब डॉलर हो गया है. कंपनी के रेवेन्‍यू में करीब 90 फीसदी का इजाफा हुआ और यह 3.71 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. बीते मई में फेसबुक ने आईपीओ जारी किया. कंपनी ने 421,233,615 शेयर बेचने की पेशकश की और एक शेयर का मूल्‍य 38 डॉलर रखा गया. कंपनी को उम्‍मीद थी कि आईपीओ से उसे पांच अरब डॉलर की कमाई होगी. लेकिन बेहद तामझाम के साथ जारी हुआ फेसबुक के आईपीओ का बुलबुला फूट गया. शेयरों की कीमत गिरने लगी और बीते 18 अगस्‍त को कंपनी के एक शेयर का मूल्‍य 19.05 डॉलर तक पहुंच गया. अब इसके पीछे दो ही कारण हो सकते हैं या तो फेसबुक का अपने बारे लगाया गया आकलन गलत हुआ या निवेशकों का फेसबुक से विश्वास उठ गया पर दोनों कारणों का फल एक ही है की फेसबुक के आई पी ओ ने निवेशकों को नुक्सान पहुँचाया और फेसबुक की बाज़ार साख को भी .....

फेसबुक से लोगो को एक और शिकायत ये भी है की इसने लोगो की प्राईवेट जानकारिया सार्वजनिक कर दी हैं ,फेसबुक अपने यूज़र्स से समय समय पर जानकारी अपडेट करवाता है और ये साडी जानकारियां एक डाटाबेस के रूप में सार्वजनिक हो जाती है जिसके कारन कई बार यूज़र्स को समस्याओं का सामना करना पड़ता है ऐसे में लगता है कि फेसबुक अपने यूजर्स को बिना तनख्‍वाह के कंपनी के लिए ऐड जुटाने वाले कर्मचारी के तौर पर देखता है.इसी के साथ कोई यूजर यदि अपना फेसबुक अकाउंट डिलीट करना चाहता है तो भी उसे काफी दिक्‍कत होती है. sileo.com जैसी कई वेबसाइटों ने फेसबुक अकाउंट डिलीट करने से जुड़े कई लेख लिखे हैं. लेकिन जानकारों का मानना है कि फेसबुक अकाउंट डिलीट करना बेहद कठिन काम है.

फेसबुक ने शुरू से ही प्रोफिट मेकिंग को बहुत ज़रूरी समझा पर आईपीओ फेल होने से इसके रेवेन्‍य में गिरावट आई है विज्ञापनों से होने वाली आय फेसबुक की सबसे बड़ी कमाई है पर इसमें भी तेजी से गिरावट आई है कई कंपनियां फेसबुक पर विज्ञापन देने से हिचकने लगीं और इनके कदम पीछे खींच लेने से फेसबुक को रेवेन्‍यू का नुकसान हुआ.

फेसबुक के आने के बाद सामाजिक जीवन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है ,बहुत छोटी उम्र के बच्चे भी इसका प्रयोग कर रहे हैं और कुछ लोगो की माने तो फेसबुक ने बच्चो का बचपन छीन लिया है, बच्चे बाहर जाकर खेलने की जगह फेसबुक का प्रयोग ज्यादा कर रहे हैं जो उनके मानसिक विकास पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है फेसबुक पर अधिक समय बिताने वाले बच्‍चों में मैनिया, पैरोनिया, चिड़चिड़ापन और शराब पीने की लत जैसी बीमारियों का खतरा ज्‍यादा होता है. ,कई माता पिता इसके सम्बन्ध में गहन चिंता व्यक्त करते हैं और चाहते है की उनके बच्चे फेसबुक से दूर रहे, ठीक यही स्तिथि बड़ो के साथ भी है अपने आस पास की दुनिया से दूर ये लोग फेसबुक के साथ अपनी इक नई ही दुनिया बना रहे हैं ,इसी के साथ साइबर क्राइम भी काफी बढ़ा है ,यूज़र प्रोफाइल हेकिंग ,गलत प्रोफाइल बनाना, लड़कियों के प्रोफाइल से फोटो चुराना आदि घटनाएँ भी बढ़ रही है ,जो सामाजिक रूप से सही नहीं कही जा सकती .

फेसबुक के अपने कुछ फायदे भी है और नुक्सान भी .पर लोगो के इसके प्रति बढ़ते असंतोष के कारण इसके पतन का रास्ता खुलता जा रहा है , क्यूंकि जुकरबर्ग के साथ प्रोजेक्ट में शामिल २ जुड़वाँ भाइयों ने अपनी सोशल नेटवर्क साईट लॉन्च करने की घोषणा की है जिससे हो सकता है भविष्य में फेसबुक पर प्रभाव पड़े साथ ही निवेशकों की नाराजगी भी फेसबुक को झेलनी पड़ सकती है.संभावनाएं है की ऑरकुट की तरह फेसबुक भी भूतकाल की गर्त में समां जाए....

इस आर्टिकल को भास्कर भूमि और मीडिया दरबार एवं खरी न्यूज़. com  पर भी देखा जा सकता है 
.आपका एक कमेन्ट मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा और भूल सुधार का अवसर भी

Wednesday, August 22, 2012

तुम्हारे लिए Just For you

तुम्हारे नाम के अक्षर
मेरे सपनो को गढ़ते हैं 
तुम्हारी मुस्कुराहटों से 
मेरे दिन रात चलते हैं
की "ल " से लक्ष्य है मेरा 
जनम भर साथ निभाना 
तुम्हारे साथ ही जीना 
तेरे ही संग मर जाना 



जो "क" से कृष्ण कह दू तो 
कही ज्यादा ना इतराना 
सुनेगा नाम जब तेरा तो 
ताने देगा ये ज़माना 

तुम "श " से शास्त्र जीवन का
मुझे अपने से बांधे हो 
परिंदे हो हवा के तुम 
पर मेरे बिन तुम भी आधे हो 

 मेरे इश्वर नहीं हो तुम 
पर उससे कुछ कम भी नहीं
ना पूजुंगी कभी तुमको 
साथी रहना बंधन नहीं 

तुम्हारा प्रेम जीवन है 
ये रास्ता तुमने दिखाया है
तुम्हे सबसे ज्यादा अपना समझू
तुम्ही ने तो सिखाया है 

कहो कहते हो क्या बोलो
चलोगे साथ क्या मेरे ?
अग्नि के आस पास से गहरे हैं 
अपने मन के पड़े फेरे.......

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Thursday, August 16, 2012

बोलो भला कैसे ?

तुम्हे बनाना ताज महल है
मै मरने से क्षण क्षण घबराऊ
बोलो इतनी उथल पुथल में
प्रेम भला कैसे पनपेगा ?

तुम जौहरी के जैसे गहरे
हीरों सी रंगत गढ़ना चाहो
मै नदिया के पत्थर सी उथली
बिखरी बिखरी सी चलना चाहू
तुम प्रश्नों की उलझी दुनिया
मै उत्तर की रीत चलाऊ
अमृत गरल के इक से मंथन में
बोलो साम्य कहाँ उपजेगा  ?

तुम देवी मूरत के मूर्तिकार से
मैं सुबह के खिले हरसिंगार सी
तुम मूरत में अमरत्व चाहते
मैं शाम ढले तक ढल जाउंगी
इतने विपरीत गहन  चिंतन में
बोलो बंधन कहाँ जन्मेगा ?
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Friday, August 10, 2012

तुम मेरे कर्म फल हो : कर्मन्यवाधिकारस्ते

आँखों के सामने तेर जाते हैं हर बार
तुम्हारे नाम के  कुछ अक्षर 
जो मैने समय की बर्फ में दबा दिए थे 
ये सोचकर की फिर सामने नहीं आएँगे 
नज़रों से दूर हुए तो दिल से दूर हो जाएँगे
पर मैं भूल गई 
तुम  और तुम्हारा नाम 
उस बर्फ में दबकर अमर हो गया 
जीवाश्मों की तरह 

तुम्हारी यादों के कुछ ख़त 
जो जला दिए थे अनमनेपन की अग्नि में
फिर आ खड़े होते है सामने
नाच उठते हैं शब्द 
सोचा था जले हुए खतों के साथ
यादें भी जल जाएगी 
पर तुम्हारी यादें तो आत्मा जैसी हो गई
नैनं  छिन्दन्ति शस्त्राणी, नैनं दहति पावक: 

तुम्हारे अस्तित्व के कतरे 
हर बार छोड़  आती हू कहीं पीछे
अपने कर्तव्यों के आगे मुझे तुम्हारा अस्तित्व 
बौना ही लगा सदा 
पर तुम तो हर बार बड़ा रूप लेकर 
आ खड़े होते हो मेरी राह में 
जैसे मेरे हर कर्तव्य का फल 
बस तुम ही होने वाले हो हमेशा 
चाहे अनचाहे ,जाने अनजाने
कर्मन्यवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन 

आपका एक कमेन्ट मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा और भूल सुधार का अवसर भी (चित्र गूगल से साभार )