Friday, August 31, 2012

वो स्याही जिसने मेरी कलम को अर्थ बख्शा है

वो स्याही जिसने मेरी कलम को अर्थ बख्शा है 
लोग कहते हैं उसका रंग तेरे आंसुओं सा है
काली रात,काली आँखें  गहरे दर्द में डूबी  
शक होता है सब पर रंग  तेरे गेसुओं का  है

मुस्कुराहटों ने मायूसी का कफ़न पहना है ,
 खिलखिलाहटें  लौट आने की दुआ करती है
सारा शहर ही जैसे उदास ,तनहा है ,
लगता है सबका हाल तेरे मजनुओं सा है

वो बादल जो तेरे लिए  घुमड़कर बरसता था 
खामोश मंडराता है अब तेरे इंतज़ार में 
ताने देती  है दुनिया पर सूना सा फिरता है 
आजकल वो भी बड़ा  बेआबरू सा है 

दिल जिसमे  तस्वीर तेरी धुंधली नहीं होती 
होता है सजदा आज भी उतनी ही शिद्दत से
बस फर्क है इतना की अब उत्सव नहीं होता
जो मंदिर था कल तलक वो अब मकबरा सा है

7 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत ही बढ़िया


सादर

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (01-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही अच्छी रचना..

साकेत शर्मा said...

acchi rachna

Amit Chandra said...

khubsurat ehsas.

जयकृष्ण राय तुषार said...

बहुत सुन्दर |

Neetu Singhal said...

मेरी कलम को मायने बख्शा..,
उसका रंग तेरे अश्कों सा है..,

स्याह रात , सुरमई नजर.....