Thursday, July 7, 2011

अभिशाप (देश स्वतंत्र पर नारी मन ?)

सपनो  की  किरचो  (टुकडो ) से  उलझती  वो ,
जब  भी  सोचती  है  की  ये  विरासत  उसी  के  भाग्य  में क्यों ?
तब  अंतस (अंतर्मन ) का  ताप  जेसे  ज्वर   बनकर  उभर  आता  है
द्वन्द  ही  अब  उसका  भाग्य  है  शायद
ये  चुभन  जो  शरीर  में  नहीं  दिल  में  है
क्यों  करती  है  उसे  लहूलुहान  पल  –प्रतिपल ?.


एक  पड़ाव  से  दूसरा  पड़ाव  ,बदले  पेड़  और  बदली  छाव
पर  ये  आतंरिक  पीड़ा  नहीं  बदली , बस  बदलते  रहे  द्वन्द  के  भाव .
कंभी -कभी   सोचती  है  किसकी  विरासत  ढो रही  है  वो ?
क्या  वो  भी  अभिशप्त  है  भटकने  के  लिए ?
बाहरी  भटकाव  से  तो  फिर भी  बचाव  है
पर  आतंरिक  भटकाव  उसे  घुटन  और  पीड़ा  के  सिवा  क्या  दे  रहा  है ?

फिर सोचती है
शायद  वो  ढो  रही  है  विरासत  हर  उस  स्त्री  की
जिसने  भोगा  है  दर्द  , सही  है  पीड़ा  ,और  बाहरी  ख़ुशी  के  बाद  भी  आतंरिक  कष्ट .

न  जाने  केसा  कर्ज  है  उस  पर  की  जेसे  जेसे  भोगती  है
ये  बढ़ता  ही  जाता  है  महाजन  के  सूद  की  तरह .
पर  दोष  भी  किसे  दे  वो ?  जब  उसका  अपना  मन  ही  दोषी  है
जो  उसे  हर  बात  को  अनंत  गहरे  तक  सोचने  पर  करता  है  मजबूर .

उसे  समस्या  है  अपने  विद्रोही  होने  से
और  इस  बात  से  भी  की  ये  विद्रोह  पूर्ण  मुखर  क्यों  नहीं  है ?
उसे  समस्या  है  अपनी  संवेदनशीलता  से
पर  समस्या  ये  भी  की  ये  संवेदनशीलता  चरम  तक  क्यों  नहीं  जाती ?
उसे  समस्या  है  की  क्यों  वो  अपनी  तकलीफ  बयां  करती  है
पर  समस्या  ये  भी  है  की  जब  भी  मुखर  होती  है  तो , कही  से  समझदारी  आकर  उसके  होठ  क्यों  सिल  देती  है ?

उसे  जितनी  समस्या  दुसरो  से  है  उससे  कही  ज्यादा  वो  खुद  से  नाराज  है
मध्य -मार्गो  पर  चलते  चलते  वो  थकन  महसूस  करती  है
या  तो  पूर्ण  विद्रोह  या  पूर्ण  बंधन  चाहती  है  वो
पर  अपने  मन  को  दोनों  में  से  किसी  एक  के  लिए  राजी  नहीं  कर  पाती …..

वो  मन  से  अभिशप्त  है  और  ये  अभिशाप ,
शायद  उसे  मृत्युपर्यंत  भोगना  है  .
पल  पल  खुद  से  द्वन्द  करते  हुए
उसे  कर्ज  उतारना  है  न  जाने  कितनी  स्त्रियों  का  जो  उसी  की  तरह  भोगती  रही  पीड़ा
और  अतृप्त  ही  चली  गई  इस  दुनिया  से

उन  अनजानी  रूहों  की  ये  अभिशप्त  विरासत
अपने  भाग्य  मैं  लिखवाकर  ली  है  वो
और  चिर  निंद्रा  मैं  जाने  तक  ये  विरासत  उसे  संभालनी  ही  होगी

13 comments:

Bhargav said...

you left me speechless... but would say, we all are equally responsible for her tears...

Kanu,... bahot hi gehri soch hai aapki,

"jaani pehchani rahoon me anjaan se the hum,..
silsile itne badhe ke rooh tak khamosh ho gai"

kanu..... said...

thanks bhargav..haan hum sab responsible hai but ye kavita mujhe apni si lagti hai .ase hi antar dwand me apne andar bhi mahsoos karti hu kai baar.shayad isilie ye likh pai...acchi hai ya buti ye mere pathkon par chor diya maine

रचना said...

good work and keep it up we need more woman to write continuously on such issues

Bhargav said...

i knew... and that is the reason i wrote last two lines for you...

even me, am fighting with ma ownself, but the concept is different..

शिखा कौशिक said...

bahut achchha likha hai kanu .aabhar

संजय भास्कर said...

Kanu ji ... bahot hi gehri soch hai aapki

संजय भास्कर said...

वाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.
आप बहुत अच्छा लिखती हैं और गहरा भी.
बधाई.

Mohinee said...

आपने हर नारी की पीड़ा बयां की है | यही विचार मुझे भी झुलसा रहे थे | उन विचारों की आवाज है आपकी कविता | बहुत बहुत धन्यवाद प्रतियोगिता में प्रस्तुत करने के लिए भी बहुत बहुत आभार|

आपको कोटि कोटि नमन |

kanu..... said...

मोहिनी जी आप मुझसे उम्र ,अनुभव और विचारों में बहुत बड़ी है आपकी एसी प्रतिकिरिया ही मेरे लिए पुरूस्कार है

Someone is Special said...

This is my first visit here.. Love your take and it is beautifully crafted sad post from your pen.. Thank you so much for writing for the contest..

Someone is Special

GeetaSingh said...

beautiful dear ..all the best :)

kanu..... said...

@ geeta singh and someone special.thanks for comment

Anonymous said...

Thanks for all your work.