Saturday, July 9, 2011

भगवान को तो बक्श दो....


बहुत छोटी सी थी में तब से देखती आ रही हू दादी,नानी अपनी छोटी से थेली में थोडा अनाज (जिसे हमारे मालवा में मुट्ठी कहा जाता था. पर वो कहने को ही मुट्ठी हुआ करता था वास्तविकता में वो 400-500 gram अनाज था ),५-७  अगरबत्ती ,एक नारियल ,एक दीपक  और भी कुछ छोटा मोटा सामान लेकर मंदिर जाया करती थी और हम बच्चे भी उनके साथ हो लिया करते थे ,उस समय पूजा और प्रार्थना हमारे दिल में हो न हो मुक्य बात तो ये होती थी की चटक (नारियल की गिरी) खाने मिलती थी.नानाजी के गाँव के कोने में एक मंदिर  हुआ करता था वहा जाना तो मन को खूब भाता था क्यूंकि, वहां के पंडितजी गर्मी के दिनों में ठन्डे पानी के मटके में शक्कर डालकर रखते थे तो हमे भी वो मीठा पानी पीने का बड़ा चाव रहता था .उसके बाद कितनी ही कोशिश की पानी में शक्कर डालकर वेसे पानी पिया जाए पर कभी वो स्वाद न आया जो उस पानी में आता था.

खैर इस सब के साथ एक बात और होती थी वो थी की नानी अपने अपने पल्लू में बंधा सवा रुपया,५ रुपया,१० रुपया कुछ न कुछ जरूर भगवन को चढाती थी हम तब भी नानी से पुछा करते थे की ये सब भगवन को क्यों चढाते है पर जवाब एक ही होता था की भगवन खुश होता है .पर एक बार हम अड़ ही गए की नानी जो भगवान हमें देता है हम उसे पैसा क्यों चढाते है बताओ ना?उस दिन नानी से बड़े प्यार से समझाया की बेटा ये पैसा इसलिए चढ़ाया जाता है ताकि मंदिर की पूजा आरती का खर्चा निकल सके,साफ़ सफाई हो सके और जो पंडितजी भगवान् की सेवा करते है उनका घर खर्चा चल सके ये तर्क हमें भी सही प्रतीत हुआ....

समय बदला हम बड़े हो गए धीरे धीरे देखा की लोग इतना पैसा चढाते है की वो पूजा आरती के खर्चे से तो लाखो गुना ज्यादा है अब मम्मी का नंबर आया बताने का तो मम्मी ने बताया बेटा ये पैसा भगवान् को धन्यवाद् स्वरुप चढाते है अब हमे भी शौक चढ़ा हम भी हर छोटी मोटी बात में भगवान् को रिश्वत का लालच देने लगे "भगवान् ये काम कर देना २१ रुपैये का प्रसाद चढ़ाउंगी ".जैसे जैसे उम्र बढती गई ये रिश्वत भी बढती गई २१ से ५१ ,फिर १०१,१५१  और भी ये राशि बड़ी होती गई और बढती गई हमारी मांगे .......

पर कल रात  गजब हो गया जैसे ही एक मन्नत मन ही मन बुदबुदाकर हम सोए तो भगवान् ही हमारे सपने में आ गए  और बोले "शर्म नहीं आती हमें रिश्वत देती हो " हम घिघियाकर बोले अरे नहीं भगवान वो तो धन्यवाद् स्वरुप राशी है
भगवान ने कहा "अरे वाह हमारी बिल्ली हामी से म्याऊ ?"हमसे ही मांगते हो हम जैसे तेसे तो जुगाड़ तुगाड करके तुम्हारी मांग पूरी करते है और तुम फिर वो हमें ही लौटा देते हो "और फिर आ खड़े होते हो हाथ में कटोरा लेकर"हम क्या हमेशा यही करते रहेंगे कुछ तो शर्म करो भगवान् को बक्शीश देते हो इसीलिए तुम्हारे काम अटक जाते है "तुम्हे खर्च करना है तो ये सारा पैसा मानव कल्याण में खर्च करो,भूखे को खाना खिलाओ,प्यासे को पानी पिलाओ पर तुम हो की सबकी झोली भरने वाले की झोली में पैसा डालते हो....

अब तो हमे काटो तो खून नहीं शर्म के मारे आँखें जमीन में गड़ गई अपने किये पर पछतावा होने लगा ,बड़ी जोर जोर से रोकर विलाप करने लगे भगवान् हमें माफ़ कर दो अब ऐसी गलती नहीं होगी ,अब कभी एसी गलती ना होगी ,आप जैसा कहंगे वेसा करेंगे हम बस हमारा काम मत अटकाना ,तभी अचानक नींद खुल गई देखा तो सामने पतिदेव खड़े मुस्कुरा रहे थे और अपनी चिर परिचित मुस्कान के साथ वो बोले इसीलिए कहता हू  भगवान्  को तो बक्शीश मत दो कम से कम उन्हें तो बक्श दो और हम बस इतना ही कह पाए हांजी अब नहीं देंगे भगवन को बक्शीश .............

7 comments:

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

भगवान को तो बक्शना ही होगा, वो पकड में आने वाले भी नहीं है, चाहे कितनी रिश्वत दे लो

Bhargav said...

wowwww, kanu... such a depth and philosophy... awesome ppost, the way you have written the whole conern is fantabulous... people awake...

thanks for sharing your such a beautiful chemistry of mind...

kanu..... said...

sahi kaha aapne sandeepji.bhagwan ko rishwat nahi dena chahiye par hum log mante kaha hai...sabko dene wale ki jholi me bhi paisa dalne se nahi chookte.
thanks bhargav

Manish Kr. Khedawat said...

zi padhkar maza aa gaya ! sachhi !
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राजनेता - एक परिभाषा अंतस से (^_^)

loks said...
This comment has been removed by the author.
loks said...

सही है!!.. पैसा भौतिक चीज़ है ! इंसान की बनाई चीज़ है ! और भला भगवान् को उससे क्या सरोकार! ऐसी कोनसी चीज़ है , ऐसा कोनसा काम है जो भगवान् बिना पैसे के नही कर सकता! ये इंसान के अहम् की उपज ही है की आज इंसान खुद को बनाने वाले(भगवान्) को अपनी बनाई चीज़ (पैसों ) से खरीदने चला है...

Anonymous said...

Hehe, the post took quite a while to read but it sure worth it