Friday, September 9, 2011

लौट आओ तुम (ए लव स्टोरी -destroyed by terrorism )

वो मासूम सा लड़का उसे बचपन से भला लगता था ,छोटी छोटी सी आँखें,घुंघराले बाल ,वो हमेशा से छुप छुप के उसे देखती आई थी ,जब वो अपना बल्ला  लेकर खेलने जाता,अपने दीदी की चोटी खींचकर भाग जाता,मोहल्ले के बच्चो के साथ गिल्ली डंडा खेलता हर बार वो बस उसे चुपके से निहार लिया करती थी .जैसे उसे बस एक बार देख लेने भर से इसकी आँखों को गंगाजल की पावन बूदों सा अहसास मिल जाता था .घर की छत  पर खड़ा होकर  जब वो पतंग उडाता वो उसे कनखियों से देखा करती थी जेसे जेसे उसकी पतंग आसमान में ऊपर जाती, इसका दिल भी जोरों से धड़कने लगता और फिर वो भागकर नीचे आ जाती की इंजन की तरह आवाज करते इस दिल की आवाज कही आस पास के लोगो को ना सुनाई दे ,कितनी पगली थी वो जानती ही नहीं थी दिल की आवाज़ बस उसी  को सुनाई देती है जिनका दिल आपके दिल से जुड़ा होता है बाकि लोग तो बस शब्द सुन सकते है  अनंत आकाश में हमेशा  गूंजने वाले शब्द....

जब उम्र ने थोडा बदलाव लिया ,शरीर के साथ मन भी बदलने लगा ,बातों के साथ नजरें भी बदलने लगी ,गली के लड़कों के तेवर और माँ की सीखें भी बदलने लगी पर वो नहीं बदली वो बस उसे निहारा करती थी चुपके से  बस अंतर इतना आया था की उसके इस तरह चुपके से देखने की आदत शायद वो ताड़ने लगा था ,कभी कभी कनखियों से वो भी उसे देख लेता जेसे मौन संवाद की प्रतिक्रिया मौन में ही दे देना चाहता हो.
दोनों नहीं जानते थे ये क्या था ,बस इतना जानते थे की ये मौन संवाद अच्छा लगने लगा था दोनों को. कभी कभी जब दोनों आमने सामने पड़ जाते तो नजरे मिलती और साथ ही झुक भी जाती जेसे अगर ज्यादा देर तक मिली रह गई तो एक दुसरे का चुम्बक उन्हें दूर ना होने देगा.

दोनों की उम्र बढती जा रही थी और ये मौन संवाद भी  मुस्कुराहटों में बदलने लगा था पर शब्द अभी भी इस मौन संवाद की जगह नहीं ले पाए थे ,दोनों कॉलेज जाते थे लड़का वकील बनना चाहता था इसलिए ला कॉलेज में दाखिला  लिया और लड़की अपनी डाक्टरी की पढाई में लग गई ,दोनों बस एक दुसरे को देखकर मुस्कुराते,और फिर नजरे चुरा लेते,धीरे धीरे दोनों समझने लगे थे की उनके अन्दर क्या पनप रहा था पर इस पनपते अंकुर को दोनों दुनिया से छुपा रहे थे शायद या इन्तेजार कर रहे थे सही समय का ,पर इससे भी ज्यादा इन्तेजार उन्हें इस बात का था की वो खुद ठीक से समझ पाए की क्या था ये ?

बरसात की सुबह थी वो 7 september 2011  आज  लड़के ने सोचा था सुप्रीम कोर्ट का अपना काम निपटाकर वो शाम को वापस लौटते हुए उससे एक बार बात जरूर करेगा ,चाहे शुरुवात  ही पर इस मौन संवाद को में थोड़े शब्दों की लड़ियाँ पिरोएगा.. आज उसने एक छोटी सी पर्ची बनाई और रस्ते में जब वो मिली तो उसके हाथ में थमाकर निकल गया लड़की ने चारों तरफ नजर घुमाते हुए उस पर्ची को पढ़ा उसमे लिखा था "शाम को वापस आते समय कालोनी के पार्क में मिलना बात करनी है.".पर्ची खोलते ही उसका दिल जोरो से धड़कने लगा, एक अजीब से अहसास ने दिल को भर दिया,बस बार बार यही सोचती थी आज उससे बात होगी क्या बात होगी , केसे  होगी वहा तक वो पहुँच ही नहीं पा रही थी.बस बात होगी मौन टूटेगा इसी की ख़ुशी उसके पैरों को जमीन पर नहीं पड़ने दे रही थी.

बस इसी उधेड़बुन में वो कॉलेज चली गई शाम को जल्दी से वापस आकर पार्क में बैठ गई ,दिन में दिल्ली में हुए आतंकवादी  धमाके की खबर पर लोग बातें कर रहे थे आखिर उसका शहर दिल्ली से थोड़ी ही दूरी पर था सो चर्चा होना भी चाहिए थी. उसे भी बड़ा दुःख था की लोगो की जानें चली गई ,पर वो फिर भी उसका इन्तेजार कर रही थी और ये इन्तेजार की ख़ुशी उसे बड़ा सुकून दे रही थी ,एक घंटा बीता ,२ घंटे बीत गए अँधेरा चने लगा पर वो ना आया ,घर से २ बार माँ का फ़ोन आ गया  था की आज उसे इतनी देर क्यों हो रही है पर वो एक्स्ट्रा क्लास का बहन बनाकर वहा बैठी उसकी राह ताकती रही .आखिर वो ना आया और वो उठकर घर आ गई .

उसने देखा गली में मुर्दानगी छाई है और कही बस रोने की आवाजें आ रही है,उसने सोफे पर बैग फेकते हुए माँ से पूछा  क्या हुआ है माँ ? माँ ने कहा वो कोने वाले  शर्मा  है ना उनका बेटा आज दिल्ली गया था कोर्ट के काम से  वहा बम धमाका हो गया बिचारा लड़का  वापस नहीं आया मैं जा रही हू उनके घर तू चलेगी मेरे साथ ?पर ये सब सुनने के लिए उसे होश ही कहा था वो तो वही जमीन पर बैठ गई थी ,उसके लिए अब किसी शब्द का कोई मतलब नहीं था जिसके शब्द सुनने के लिए वो बचपन से तरस गई थी वो उससे अबोला ही चला गया.....क्या कहे वो इस रिश्ते को ,क्या नाम दे वो तो रो भी नहीं सकती .....

बस यही सोचती रही हमेशा सुना था आतंकवादी हमलों में जब कोई अपना जाता है तो सच्चा दर्द पता चलता है पर उसका जो चला गया वो तो पूरी तरह से अपना नहीं था पर बचपन से लेकर आज तक उससे ज्यादा अपने ढूँढना भी मुश्किल है उसके लिए ,वो अकेला नहीं गया अपने साथ उसके बचपन की यादें,उसकी आँखें,उसके अहसास ,उसका जीवन और उसकी वो मांग जो शायद उसके नाम के सिन्दूर  से भर सकती  थी सब सूना कर गया.....और वो ?वो बिचारी तो रो भी नहीं सकती  किस रिश्ते से रोए वो.....?अब तो ये भी नहीं कह सकती की लौट आओ तुम क्यूंकि शब्दों ने तो कभी जगह ली ही नहीं उनके बीच.........



आपका एक कमेन्ट मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा और भूल सुधार का अवसर भी

15 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

आपने वो लिख दिया है जो बहुतों के साथ हुआ होगा। बहुत ही मार्मिक और सोचने को मजबूर करती कहानी है।

सादर

अखिलेश उपाध्याय said...

बहुत ही मार्मिक चित्रण है. दिल को छू देने वाली कहानी.....बधाई....

kanu..... said...

pasand karne ke lie dhanyawad.aam si baat hai par khas hai kyunki kisi ki jaan se jud gai...

Maheshwari kaneri said...

मार्मिक चित्रण....

रविकर said...

मार्मिक चित्रण ||

बधाई ||

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

best

youth is ready for kranti said...

बहुत आभारी हैं झकझोरने के लिए.

Manish Kr. Khedawat " मनसा " said...

bahut hi dard bhara chitran
:'( :'(

Suresh kumar said...

बहुत ही खुबसूरत और दिल को छु लेने वाली कहानी ...

Mirchi Namak said...

भाई आप ने बहुत अच्छा लिखा है झकझोर गया पर कुछ कहने को शब्द नही ...

Patali-The-Village said...

बहुत ही मार्मिक चित्रण| दिल को छु लेने वाली कहानी|

प्रवीण पाण्डेय said...

12 हतजनों की कहानी ऐसी ही होगी, दुखद, दुर्भाग्यपूर्ण।

Bhushan said...

ऐसे हालात में किस रिश्ते से कोई रोए...मार्मिक कथा.

Anonymous said...

kanupriya ji bahut hi sarthak kahani hai,chayawad ki yaad aa gai ise padhkar .

अमरनाथ 'मधुर' said...

आपने कितना मार्मिक लिख दिया ऐसे में कोई टिप्पणी लिखना भी मुश्किल है पढ़कर मन भारी हो गया |