Tuesday, June 7, 2011

हाथ से हाथ जुड़े तो बहार आए शायद ......

मेरी बस्ती के सारे  चिराग सोते है
कोई रौशनी के लिए खुद को जलाए शायद
भीड़ में गर्क हो गए है जिंदगी के निशान
कोई अँधेरे में उम्मीद जगाए शायद.

सब के सब सो रहे है अँधेरी गर्तों में
आए आकर कोई नींदों से जगाए शायद
बड़ी बैचैन सी रातें है बेक़रार से दिन
कोई आवाज़ उठे तो करार आए शायद


हर तरफ दर्द है लाचारी है बेबसी है
अब कोई ख़ुशी के असार बनाए शायद
विद्रोह की चिंगारियां तो है पर नेतृत्व नहीं
कोई बदलाव का ऐतबार दिलाए शायद

भरी बरसात में आंसू भी नहीं दीखते है
रूह जगे तो तो ये आंसू  भी दिख जाए शायद
सब अकेले है भीड़ में सभी मन बंजर हैं
हाथ से हाथ जुड़े तो बहार आए शायद ......

1 comment:

Sheelnidhi said...

कविताओ का अत्यन्त ही सुन्दर सृजन किया हे आपने । बधाई स्वीकार करे.......

Sheelnidhi Gupta
www.sheelgupta.blogspot.com