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Tuesday, April 17, 2012

वो एसी पागल लड़की थी....

ए चितेरे मेरा चित्र बनाओगे क्या ? एसा चित्र जो सच में मेरा हो मेरा दर्पण...बोलो बना सकोगे एसा चित्र ? एसा चित्र जिसमे इक रेगिस्तान हो जिसके बीचोबीच समुन्दर हो रेगिस्तान भी फेला हुआ और समुन्दर भी अथाह .इस समन्दर के बीच इक पनडुब्बी में रखे इक संदूक में बंद "मै'....बार बार बाहर निकलने की कोशिश करती हुई ..प्यास से तडपती हुई एकदम निस्तेज पर इस आस मै तड़पती की समुद्र के उस पार कोई मेरा इंतज़ार कर रहा है ...ये जानते हुए भी की संदूक से बाहर आकर मै पनडुब्बी से निकाल भी गई तो अथाह समद्र मेरी प्यास ना बुझा सकेगा ...पर शायद इंतज़ार करने वाले की उम्मीद मुझे पार लगा दे...ये जानते हुए भी की आग सी गर्मी से तपता रेगिस्तान मुझे जिन्दा ना रहने देगा पर फिर भी ना जाने किस उम्मीद से बंधी मै बाहर आना चाहती हू बस इक बार इंतज़ार करने वाले उस चहरे को देखना चाहती हू....बोलो बनाओगे मेरा एसा चित्र ?
एसे चित्रकार का बड़ा इंतज़ार है उसे ...

वो लड़की है ही एसी एकदम पागल ,दीवानी सी .जाने क्या क्या सोचती है  ...दुनिया में जीने की हजारों वजहों को छोड़कर जाने कहाँ  से मरने के नए नए बहाने खोज लाती है जेसे आज ही पीएचडी करेगी इस सब्जेक्ट में ...जितनी शिद्दत उसमे अलग सी जिंदगी जीने की है उससे कई ज्यादा शिद्दत अलग सी मौत मरने की है ..खामोश मौत से उसे बड़ा डर लगता है ....वो चाहती है उसके चाहने वाले सारे लोग उसकी मौत तक जिन्दा रहे और  वो रात को अपनी पसंद के समोसे खाए और सो जाए फिर कभी ना उठे ...

जिसे वो प्यार करती है वो जब सुबह उसे आवाज़  देकर उठाए तो वो जगे ही ना ...और तब उसे अहसास हो की वो लड़की उसे छोड़कर एसे अचानक से चली गई ...उसके जाने के लिए कोई भी तैयार ना हो ,उसके लिए किसी ने ना सोचा हो की वो एसे चली जाएगी ,उसके जाने के बाद कोई ना कहे की उम्र हो गई थी,बीमार थी अच्छा हुआ भगवान ने उठा लिया...बस सारे  ये कहें अरे कल रात को तो हँस हँस कर समोसे ख़ा  रही थी,कोई कहे कितना पीछे पड़ पड़कर बातें कर रही थी मैंने ही ध्यान नहीं दिया काश उसकी बातें सुन लेता...कोई कहे कल ही तो कह रही थी इस सन्डे बाजार जाएगी , कोई कहे थोड़े दिन पहले ही तो कह रही थी मुझे डांस सीखना है  और बस लोग एसी ही बातें करे और वो चली जाए....कब ? कैसे ? क्यों ? ये सारी वजहें बाद में लोग खोजते रहे वो बस चली जाए .......

एसी मौत किस्मत वालों को मिलती है  और एसी लड़कियां भी शायद...हाँ पर ये बात अलग है की एसी लड़कियां जिन्हें मिलती है उनकी किस्मत जितनी अच्छी होती उतनी ही खराब भी बिचारे इनके प्रेम से परेशान हो जाते हैं ,जिंदगी से भी प्यार और मौत से भी प्यार ...अलग ही किस्म है इन लड़कियों की ..सबको मिलती नहीं और जिन्हें मिल जाए उनमे से ज्यादतर से संभलती भी नहीं  ....

अब इक कविता....जिसे कविता मान लेना या ना मान लेना पढने वालो पर है...पर ये जेसे इक इच्छा सी होती है एसी लड़कियों की ....

मेरी मौत तुमसे पहले होगी
ये अब बहस का मुद्दा ही नहीं
क्यूंकि वो खुदा भी
मुझे प्यार करता है
तुमसे ज्यादा या कम ?
ये तुम दोनों आपस में समझ लेना
मैं बस इक बात मांगती हू
बोलो दोगे ना ?
जब मैं इस दुनिया से जाऊ
मुझे कफ़न की जगह
मेरे खवाबों से सज़ा देना
बाकि सारी रस्मे तो
ये दुनिया निभा देगी
तुम्हारे मन से जुदा करे या ना करे
ये तुम और दुनिया समझ लेना
बस मेरे शब्दों को कभी
अपने से अलग मत करना
उन्हें अपने दिल में सभाल लेना....

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Tuesday, April 3, 2012

मेरी आत्मा को मत बेचना.....कविता और कवि

ए मेरे जन्मदाता कवि
मुझे यूँ अकेले भटकने के लिए ना छोड़ो
इस मशीनी दुनिया में मैं रास्ता  भूल जाउंगी

तुमने मुझे अपनी घोर बेचैनियों को  पालकर
मोह और निर्मोही जीवन के बीच संघर्ष करके
अस्तित्व को दिन प्रतिदिन की चुनौती देकर
बड़ा दर्द उठाकर जन्म दिया

अब इस तरह मुझे इन निर्मोही वाहकारों
की कुछ वाह वाह के लिए नीलाम ना करो
कुछ पन्नो में मुझे समेट कर जिल्द की बेडी में जकड़कर
अपनी कला का अपने दर्द का अपमान ना करो

याद है तुम्हे तुम घोर विचार जंगलों में
कही बहुत अन्दर बैठी उस मासूम लड़की
के बालों में उलझे  शब्द खोज लाए थे
और उन्हें पिरोकर मेरे लिए माला बनाई थी
तब से आज तक वो लड़की अपने बाल नहीं बांधती
बस तुम्हारा इंतज़ार करती है ...

विचारों के उस जंगल का हर कतरा
हर लहर,नदियाँ ,पहाड़ ,बादल सब
तुम्हारे उनके करीब जाने के अनंत इंतज़ार में हैं
पर तुम चमक दमक में खो गए हो कहीं
वो गहरा दर्द वो  शापित रात्रियाँ ,
वो अनसुलझी  पहेलियाँ सब तुम्हे पुकारती हैं
पर तुम प्रसिद्धि के शोर में
नेपथ्य से आती वो आवाजें सुन नहीं पाते

हे दर्द के कवि,प्रेम के पुजारी
मुझे इस मशीनों  के पुजारियों को मत सौपो
मेरे शब्द दे दो मेरा रूप देदो पर
बस मेरी आत्मा को मत बेचना  कभी....
ना अपनी आत्मा को .....
सुन रहे हो ना....

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Friday, September 23, 2011

वो खुशबुएँ और मासूम लड़की-fragrances and that sweet girl


सुबह ८.३० की वो ए सी बस मेरे घर से ऑफिस आने का साधन बनती है रोज ,अनवरत , हमेशा की दिनचर्या है मेरी. उसी बस में बैठकर मैं ऑफिस तक आती हू .वैसे बेठना कहना सही नहीं क्यूंकि आज तक मुझे कभी उस बस में बेठने की जगह नहीं मिली ज्यादातर सफ़र खड़े होकर ही करना पड़ता है  पर में फिर भी खुश रहती हू क्यूंकि कम से कम बेस्ट की बस की तरह भाग दोड़ कर और गंभीर  भीड़ में लोगो से टकराते, माफ़ी मागते हुए ,लोगो के टकराने पर भी कुछ ना कह पाने के गम से जूझते  हुए नहीं आना पड़ता . ये एक बस छूटी की मुझे ना जाने कितने पापड़ बेलते हुए भाग दौड़  करते हुए ऑफिस आना पड़ता है...
हाँ तो मैं ए सी बस पर थी  आज सुबह मुझे मेरी किस्मत और भगवन के करम से फिर ए सी बस मिल ही गई किस्मत और भगवन का करम इसलिए कह रही हू क्यूंकि में बहुत ही बिखरी बिखरी सी लड़की हू आज भी बचपना है मुझमे जिसमे लोग अलार्म बजने पर खुद से ही कहते है १० मिनिट  और सो जाती हू १० मिनिट  में कोई फर्क नहीं पड़ेगा और ये १० मिनिट का फरक मुझे दौड़ लगाकर लंच तैयार करने और नहाने ,तैयार होने , भागते भागते दूध पीने और जल्दी जल्दी सीढियां उतरने पर मजबूर कर देता है....पर जाने क्यों सब जानते समझते में सुधरती नहीं या शायद सुधरना नहीं चाहती.

मैं फिर बातों में उलझ गई न तो में कह रही थी आज बस में खड़े होने के बाद हमेशा की तरह अलग अलग चेहरों से नजर टकराई कुछ से टकराकर नजरों में जान पहचान वाले भाव उभरे तो कुछ से टकराकर  परावर्तित हो गई जैसे उनकी भाव शुन्यता और अनजानापन आकर्षण का केंद्र ना हो मेरे लिए  .इन्ही चेहरों के साथ एक और अनुभव जो इस तरह की बस में होता है वो है अलग अलग खुशबुओं का अहसास सारे खिड़की दरवाजे बंद होने के कारन शायद ज्यादा बढ़ जाता है. जानती हू  गवारों जैसी बात लगे शायद क्यूंकि सब जानते है की ए सी बस में खिड़कियाँ होती नहीं पर इसी के कारन ये खुशबुओं वाला अहसास हावी होता है.

तरह तरह की खुशबुएँ कुछ इतर की , कुछ परफ्यूम  की , बॉडी लोशन की, हैयेर  जेल की,क्रीम ,पौडर  और भी ना जाने कितनी तरह तरह की खुशबुएँ...कभी आकर्षित करती कभी सर को भन्नाने और दर्द की कगार पर पहुंचती इन खुशबुओं से रोज ही दो चार होना पड़ता है .कभी कभी लगता है इन सारी खुशबुओं को ओढ़कर हम सब जैसे दिखावे की दुनिया के करीब आ जाते है...अपने आप से अपने खुद से काफी दूर , जैसे इन लिपे पुते चेहरों और तेज़  खुशबुओं के पीछे सब अपना दर्द ,अपनी तकलीफें अपने असली रंग रूप को दबा लेना चाहते हो. कभी जकड़ती सी लगती है ये तरह तरह की खुशबुएँ ....

हाँ तो आज इन्ही खुशबुओं और लिपे पुते जाने अनजाने चेहरों के बीच मुझे एक नया चेहरा नजर आया वो मेरे काफी पास खडी थी ,थोड़ी ही देर में उसने मुझे पूछा आप कहा तक जा रही है ?जवाब में मैंने कहा एल एंड टी तक.फिर प्रश्न था :आप मुझे बता देंगी स्टॉप आएगा तो?में पहली बार जा रही हू  मैंने कहा हाँ क्यों नहीं? बिलकुल बता दूंगी और फिर छोटा मोटा बातों का सिलसिला चल  पड़ा वैसे भी ये मेरी आदत है में लोगो के साथ बड़ी जल्दी घुल मिल जाती हू, और मुंबई में क्यूंकि हम दो लोगो के सिवा घर में कोई है नहीं तो ,जहा भी बातें करने का मौका मिलता है वहा चूकती नहीं .अभी ये शहर मुझे इतना नहीं बदल पाया की मैं घुन्नो की तरह व्यवहार करू ,पर हाँ कोशिश में जरूर है मुझे बदलने की देखते हैं कौन जीतता है .

बातों ही बातों में पता चला की वो आज ही ज्वाइन करने आई है बाकि भीड़ के कारन ज्यादा बात नहीं हुई.थोड़ी देर में ही उसे सीट मिल गई और मेरी नजर  घूमकर उससे मिली .सच कहू तो प्यारी से लड़की थी वो चटकीला  पिंक फूलों वाला सूट ,उसी रंग के टॉप्स ,एक कड़ा , मचिंग  चप्पल  और सबसे बड़ी बात चेहरे पर मासूमियत.देखकर ही  लगता था बाहर से आई है मुंबई की नहीं है कारन दो थे पहला ये की मुंबई में नए नए आए लोग अलग से पहचान में आ जाते है और दूसरा उसका मचिंग प्रेम ,क्यूंकि मुंबई में ऑफिस जाते लोगो को आप इस तरह से कम ही देखेंगे .उसे देखकर वो समय याद आ गया जब स्कूल के पहले दिन नया बैग ,उसी रंग का तिफ्फिन ,और उसी रंग की बोत्तल लेकर जाते थे. वैसे सच कहू तो जब मैंने बैंक की अपनी पहली नौकरी ज्वाइन की थी तो मुझे ये मचिंग प्रेम नहीं था पर मेरे पापा को लगता था की पहला दिन है ऑफिस का तो उनने मुझे एक पिंक बोतल,पिंक तिफ्फिन,पिंक बरसाती,,पिंक बैग  सब दिलाकर  पूरा पिंकी बना दिया था :) बस क्यूंकि में पिंकी दिखना नहीं चाहती थी इसलिए पिंक ड्रेस नहीं पहना और बाद में अक्भी ये मौका नहीं मिला क्युंकी प्राइवेट बैंक में official ड्रेस होता है . 

खेर मै यादों के जगल में खो गई लगती हू  हाँ तो वो  लड़की के चहरे पर डर और मासूमियत के मिले जुले भाव देखकर ये भाव मन में आए की कुछ ही दिनों में ये भी मुंबई के रंग में रंग जाएगी इसका भी चेहरा यंत्रवत , भावहीन टाइप का हो जाएगा जैसे वो सबसे आगे वाली सीट पर बैठी लड़की का है , वो ठुल्तुले से अंकल का है ,वो जींस वाली लड़की का है जो मुस्कराहट का जवाब भी मुस्कराहट से नहीं देती...एक दिन आएगा जब ये भी इन खुशबुओं का हिस्सा  बन जाएगी ,ये सारी खुशबुएँ  जकड लेगी इसे भी एक दिन.या शायद  ये मेरी तरह संघर्ष  करती रहे इन खुशबुओं की भीड़ में खो जाने से बचने की....बस एक ही दुआ निकल रही है सुबह से बार बार हे इश्वर  हे खुदा तू जहा भी है काश अगर तुझे बने तो एक काम करना इसकी मासूमियत ,अल्हड़ता ,बचपना बचा लेना इस भीड़ में खो जाने से.....आमीन




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