Monday, April 22, 2013

क्या तुम सुनते हो

ये कविता शुरू किसी अन्य  भाव से हुई थी ख़तम दुसरे भाव पर हुई . कोई फेरबदल न करते हुए इसे पोस्ट कर रही हूँ आशा है दोनों भाव पाठको तक पहुंचेंगे


तुम नर्तन के अनन्य भक्त से 
मुझको जीवन नाच नचाए 
जितना ज्यादा गहरा उतरु 
उतना फंदा कसता जाए 

तुम वैभव के स्वामी हो 
मैं अंधियारे का बंधक सा 
तुम कनक कंचन के रखवाले 
मैं अकिंचन बंजर मरघट सा 

तुममे सारा जगत समाया 
मुझमे एक रोटी की भूख 
तुम प्रसादों में रहने वाले 
मुझे टूटी छत का भी दुःख 

तुम रखो कर्मो का लेखा 
मैं कर्मसागर मैं उलझ गया हूँ 
तुम मन ही मन  मुस्काते 
मैं  नैनों से बरस गया हूँ 

तुम अनंत सारी दुनिया में 
मैं  पत्थर पूज पूज कुम्हलाया 
जब आत्मा में बसे बेठे हो 
तो इतना रास क्यों रचाया 

तुम भी मुझसे बात करो न 
इतना क्यों इतराते हो 
जब मेरे मन में रहते हो 
तो मंदिर क्यों बुलवाते हो 

मुझे क्यों दी खुद्दारी इतनी 
अब देकर क्यों पछताते हो 
मैं तो तेरे दर पर आता हूँ 
तुम मेरे घर  क्यों नहीं आते हो 


आपका एक कमेन्ट मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा और भूल सुधार का अवसर भी

7 comments:

कालीपद प्रसाद said...



प्रेम और भक्ति का अनूठा संगम
डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
latest post बे-शरम दरिंदें !
latest post सजा कैसा हो ?

vandana gupta said...

भक्त मन के उदगारों को सुन
वो मधुर मधुर मुस्काते हैं
भक्त की मीठी वाणी पर
वो रीझे रीझे जाते हैं

सदा said...

जब मेरे मेन में रहते हो तो मंदिर क्‍यों बुलवाते हो ... क्‍या बात अनुपम भाव संयोजित किये हैं आपने ....

दिगम्बर नासवा said...

इसी घर आने न आने के फर्क से ही उसके ओर हमारे बीच का फर्क है ... हम कभी कभी जाते हैं ... वो हमेशा रहता है हमारे घर ... बस देखने की जरूरत है ...

प्रवीण पाण्डेय said...

नर्तन करते शब्द, भक्ति में परिपूर्ण..

संध्या शर्मा said...

भक्ति भाव से परिपूर्ण सुन्दर रचना...

Anju (Anu) Chaudhary said...

शब्दों को नर्तन करवाते हुए मन के भाव लिख दिए हैं .....बहुत खूब