Wednesday, July 25, 2012

अंतर्मन में उतरे पात्र

वो लोग जो हमने कुछ देखे कुछ पुस्तकों में ही पढ़े 
वो पात्र जो शायद कभी रहे या सिर्फ गए थे गढ़े

वो लड़के जिनकी प्रेमचंद की किताबों से यारी होती थी
प्रेम सूक्तियां जिनको अपने जीवन से प्यारी होती थी

वो लड़के जिनका जीवन देश की सेवा में जाता था 
वो लड़के जिनका नाम बड़े देशभक्तों में आता था 

वो लड़के जो रस्ते चलतों के अपने से हो जाते थे 
वो लड़के जो यारों की यारी में प्राणों को खो जाते थे 

वो लड़के जो बहनों की राखी का रास्ता तकते थे 
सारे गाँव की बेटिओं को अपनी इज्जत सा रखते थे 

वो लड़की जो " मेरी कुडमाई हुई" कहने में शर्माती थी
वो लड़की जो चुन्नी का पल्लू हाथों में ले मुस्काती थी 

वो लड़की  जो जरुरत पड़ने पर वीरांगना हो जाती थी
बम तलवार चलाती थी क्रांति गीतों को गाती थी 

वो लड़की जिसके संस्कार में भक्ति भी थी शक्ति भी
वो लड़की जिसके व्यवहार में तर्क भी थे युक्ति भी 

सब बिखरा बिखरा सा अब है बस वाक् बाण ही चलते हैं 
वो सारे पात्र दिन रात इन आँखों में उतरते ढलते हैं....

वो ढलता सूरज ना फिर लौटा ,वो शाम कभी ना फिर आई 
कुछ चले गए ,कुछ आ गए बनकर जाने वालो की परछाई... 

वो जो कल थे वो आज नहीं बस उनकी धुंधली यादें है 
कुछ पन्ने रंग बिरंगे है ,कुछ कहानियां सीधी सादी है 

कुछ पात्र हमारे जीवन का आधार बनाकर चले गए 
कुछ अंतर्मन में गहरे उतरे स्वप्न संसार बनाकर चले गए ......

आपका एक कमेन्ट मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा और भूल सुधार का अवसर भी

15 comments:

शालिनी कौशिक said...

बहुत सराहनीय प्रस्तुति.ब्लॉग जगत में ऐसी आती रहनी चाहिए.आभार हमें आप पर गर्व है कैप्टेन लक्ष्मी सहगल

Rajesh Kumari said...

वो सब कहाँ चले गए वक़्त के साथ साथ सब बदल रहा है आदर्श ,मर्यादाएं ,भावनाएं कल की बात हो गई गईं ....बहुत सुन्दर बहुत कुछ कहती रचना

संध्या शर्मा said...

कहाँ गए वे लोग...??? सार्थक प्रस्तुति...बहुत-बहुत आभार

निर्मला कपिला said...

बहुत शानदार प्रस्तुति। बधाई।

दिगम्बर नासवा said...

बदलते समय को बाखूबी उतारा है इस रचना में ... वो सब कुछ जो गुजरा है आँखों के सामने आ गया ...

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 27/07/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Vivek Rastogi said...

पता नहीं वे सब कहाँ चले गये, बहुत अच्छा ।

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" said...

badhiya

प्रवीण पाण्डेय said...

इन्हीं पात्रों में हम स्वयं को ढूढ़ने का आनन्द उठाते हैं।

expression said...

बहुत सुन्दर...
अच्छी रचना..

अनु

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

सुन्दर अभिव्यक्ति....
सादर.

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Madan Saxena said...

बहुत सराहनीय प्रस्तुति.

Pallavi saxena said...

वक्त के साथ अक्सर बहुत कुछ बदल जाता है शायद इसलिए की परिवर्तन की प्रकृति का नियम है।