Thursday, June 28, 2012

इक रात अमावस है फिर चाँद का आना है

ढलती हुई हर रात का बस इतना फ़साना है 
सारी दीवारें तोड़कर उसे कल फिर चली आना है..
रोकेगा कोई कितना चाहत की चांदनी को 
इक रात अमावस है फिर चाँद का आना है 

पाक मोहब्बत की तस्वीर निराली है 
इक जज़्बात है दिल में, सामने सारा ज़माना है 
तुमसे लगाकर दिल बस यही दर्द है मुसाफिर
ना तेरा है कोई ठोर ना मेरा ही ठिकाना है

बस्ती जलाके दिल की वो खुश है मीनारों में
सितमगर क्या जाने उसे भी खाक हो जाना है
कल जिसने दिया धोखा वो आज सामने है 
उसे माफ़ कर दिया है दिल कितना दीवाना है 

वो जिसके तसव्वुर में वजूद खो दिया था
जब रूबरू  हुआ तो लगता है बेगाना है 
उसका नहीं कुसूर ,ये जुर्म में हमारा 
उसने अपना बनाना चाहा हमें उसका हो जाना है 

आपका एक कमेन्ट मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा और भूल सुधार का अवसर भी (thanks to Google for picture)

11 comments:

रविकर फैजाबादी said...

बहुत खुबसूरत प्रस्तुति ।

बधाई कनु जी ।।

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

Fantastic!


Regards

dheerendra said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति,,,सुंदर शीर्षक ,,,,
कनु जी,,,,,बेहतरीन रचना के लिए,,बधाई

MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: बहुत बहुत आभार ,,

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही अच्छी कविता, कई बार पढ़ी..

kanu..... said...

thanks sir.

kanu..... said...

shirshak pasand krne k lie thnx

kanu..... said...

thnx

Anonymous said...

एक उम्दा प्रस्तुतीकरण

संध्या शर्मा said...

अमावस के बाद चाँद को आना ही होगा... बहुत खूबसूरत रचना

dr.mahendrag said...

khoob surat rachna

Pallavi saxena said...

bahut badhiya kanu....best wishes...