Tuesday, November 22, 2011

बस इश्क की बंदिश होती है



 मैंने अपनी पिछली पोस्ट मैं भी कहा था इश्क करने लगना अलग बात है और इश्क लिखने  लगना अलग ...वेसे देखा जाए तो कोई बड़ा सा फर्क नहीं पर, बारीक सी  रेखा भी गहरी सी है..अलगाव,त्याग,विरह सब इसी  से जन्म लेते हैं और जब इंसान इश्क में होता है तो वो हर बात पर सोचता है गोया भविष्य देख लेना चाहता  हो ,तोल लेना चाहता हो खुद को हर कसोटी पर ,वैसे कसौटियों का क्या है ये बदलती रहती है हर इंसान हर भावना के साथ....किसी ने मेरी पिछली पोस्ट के कमेन्ट में कहा आप इश्क को गलत ढंग से समझ रहीं हैं ,शायद उनकी बात सही हो पढ़कर अच्छा लगा की मुझे पढ़ा जाने लगा है ,मैं जो समझ रही हू वो कही गलत न हो इस बात पर गौर किया जा रहा  है... मुझे लगता है हर इंसान इश्क को  अपने अलग ढंग से ही समझता है और समझना भी चाहिए क्यूंकि इश्क मैं कॉपी कैट वाला फंडा लागू नहीं किया जा सकता...वेसे अभी मेरी उम्र ही क्या है न इश्क समझने की न जिंदगी समझने की फिर भी कोशिश कर रही हु....समझने की नहीं लिखने की...शायद लिखते लिखते समझ जाऊ...या समझते समझते लिखने लगी हू.......

कुछ छोटी छोटी  कविताएँ ,कुछ मुक्तक लिखे है आज वो आप सब के सुपुर्द कर रही हु...
        आम बन जाओ
जानती हू तुम दिल की दिल में रखते हो
हमेशा शांत रहते हो कभी कभी बरसते हो...
यूँ सब समाकर ना रखो, छलकता जाम बन जाओ
कभी तो  ख़ासपन  छोड़ो ज़रा से आम बन जाओ
         
        बदनाम हो जाए..
हर एक लम्हा तुम्हारी याद में तमाम हो जाए
तुम्हारा नाम जुड़ जाए और हम गुमनाम हो जाए
राहे मोहब्बत  से बस इतनी सी तमन्ना है
तुम्हारे इश्क में हम भी ज़रा बदनाम हो जाए....

       पलटकर नहीं देखा 
कश्ती डूब गई इसकी भी अपनी वज़ह थी
मै लहरे मोह्हबत में रही, मैने गहराई-ए -साग़र नहीं देखा
 जो फासले बढे उनका गुनाहगार  कौन हो?
मैं धीरे चली और तुमने  पलटकर नहीं देखा 

  बस इश्क की बंदिश होती है
जो लोग  कहते हैं इश्क अमीरों का काम है
कोई उन्हें बताए फकीरी में भी मोहब्बत होती है

ख़ामोशी में ही दिल की गहराई में लावा पकता है
जब घुटन बेइंतेहा  बढती है तभी बगावत होती है

अपनों को अपना बनाकर रखना ही   मुनासिब है
बर्बाद किसी को करने में अपनों की ही साजिश  होती है

दीवारों के पीछे कुछ आवाजें घुटती रहती है
उन्हें लोगो का डर नहीं होता बस इश्क की बंदिश होती है .

बस आज के लिए इतना ही अगली पोस्ट पर त्याग और अलगाव की कुछ पंक्तियाँ डालूंगी.....

आपका एक कमेन्ट मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा और भूल सुधार का अवसर भी

29 comments:

Bhushan said...

जीवन और जीवन से संबंधित अहसासों का अनुभव सबका अपना-अपना होता है. आपने स्वयं को अभिव्यक्ति दी, यह महत्वपूर्ण है.
सुंदर पोस्ट.

सुनील दत्त said...

बहुत रोचक अभिव्यक्ति

Chandan said...

Bahut khub kha kanu......
Waise ishq byan krna utna hi easy h jitna samjhna mushkil h
ri8

Sajal said...

आप वाकई बहुत अच्छा और दिल की गहरायिओं से लिखती हैं.....

संजय भास्कर said...

अच्‍छे शब्‍द संयोजन के साथ सशक्‍त अभिव्‍यक्ति।

ASHA BISHT said...

behad khoob......

इमरान अंसारी said...

इश्क करने लगना एक बात है - मोहतरमा हमारा नज़रिया ये कहता है इश्क तो कभी 'किया' ही नहीं जा सकता 'वो आतिश जो लगाये न लगे' .....बस हो जाता है |

हाँ इश्क लिखना ज़रूर मुश्किल काम है.....क्योंकि हर इंसान की इसकी परिभाषा उसके अपने अनुभव पर ही आधारित होती है तभी तो 'प्रेम' सनातन काल से ही मुख्य विषय रहा है........बाकी शेर आपके अच्छे लगे|

प्रवीण पाण्डेय said...

इन भावों को व्यक्त करने में शब्द बहुधा अन्याय कर जाते हैं।

DUSK-DRIZZLE said...

IT IS BEYOND DESCRIBE

prashant mishra said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है आपकी,साधुवाद..

अनुपमा पाठक said...

' मैं धीरे चली और तुमने पलटकर नहीं देखा '
सामंजस्य न हो तो कितना कुछ खो जाता है... इसका सुन्दर संकेत है इस पंक्ति में!
सुन्दर अभिव्यक्ति!

वन्दना said...

बहुत सुन्दर भाव संयोजन्।

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

यूं तो हर दिन बहुत से ब्लोगस पर जाना होता है पर जिन्हें पढ़कर कुछ अपना सा लगता है आपका ब्लॉग भी उनमें से एक है।

'पलट कर नहीं देखा' बहुत अच्छी लगी।

सादर

रविकर said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||

बधाई महोदय ||

dcgpthravikar.blogspot.com

Sunil Kumar said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति बधाई

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

वाह! बहुत सुन्दर...
पलटकर नहीं... को पढकर जनाब बशीर साहब याद आ गये...

आँखों में रहे, दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ति के मुसाफिर ने समंदर नहीं देखा
पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा...

उम्दा रचनाएं हैं कनु जी...
सादर बधाईयां...

रश्मि प्रभा... said...

इश्क मिजाज़ और इश्क में फर्क है...

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" said...

mizaaze ishq
nahee karaataa ishq

rochak khyaal

Atul Shrivastava said...

इश्‍क के सबके लिए अपने मायने होते हैं... किसी के लिए दर्द तो किसी के लिए खुशी..... पर यह जज्‍बात होता अलहदा है...
शानदार मुक्‍तकों के साथ इश्‍क के भावों का प्रस्‍तुतिकरण।

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

सभी रचनाएं बहुत अच्छी लगी.

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" said...

yun to sabhi muktak hain laajawab,
par pehle muktak pa kahunga ek baat,
ishq hua ya ishq kiya samjhna na aaya,
jazbaat dil me hi damm todte rahe jataana na aaya"........

दिगम्बर नासवा said...

इश्क तो अपने आपमें बंदगी ही है ... खुदा की बंदगी का दूसरा माँ इश्क है ... बहुत लाजवाब हैं सभी क्षणिकाएं ..

दिलबाग विर्क said...

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा मंच-708:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

Jitendra Gupta said...

nice poem which have been evolved directly from the heart.
specially, "Kasti doob gayi..."
and "har ek lamhaa".


I like it very much.

gurufrequent said...

बहुत ही अच्छा लगा पढ़ के .........लिखते रहिये :)

seenu said...
This comment has been removed by the author.
seenu said...

bahut khoob...lagta hai ishq ko fir se samajhne ki jarurat padegi mujhe...lekin soch raha hu ki likh kar samajhu ya samajh kar likhu ya fir ishq karke use samajha jaye...

Anonymous said...

It's obviously what I am looking for , very great information , cheer!

रविकर फैजाबादी said...

मित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |
आओ धक्का मार के, महंगा है पेट्रोल ||
--
बुधवारीय चर्चा मंच