Saturday, November 18, 2017

ननिहाली किस्से-यादों का सफ़र भाग 1

प्यारे नानाजी,हम सच में आपको बहुत याद करते हैं।ये यादों का सफ़र आपके लिए आपके गांव और अपने ननिहाल को फिर से जी लेने की तमन्ना के साथ।
ननिहाली किस्से हाँ यही नाम दे रही हूँ इस किस्सों की लहर को क्या कितना याद है कितनी यादें धुंधली हुई ये तो लिखते लिखते याद आएगा शायद पर अपना बचपन फिर से जी लेने का और उसे पन्नो पर उतार देने का इससे बेहतर मौका मुझे शायद फिर न मिले....
कयामपुर यही नाम है मेरे नानाजी के पुश्तेनी गाँव का अब ये नाम क्यों रखा गया होगा इसके बारे में ना तो वहाँ कोई लोकचर्चा या कथा प्रचलित है और न कभी कोई बात सुनने में आई पर अंदाज़ा लगाया जा सकता है उर्दू शब्द "कयाम" का अर्थ क्योंकि 'रुके रहना','ठौर' आदी होता है तो हो सकता है पुराने किसी ज़माने में ये लोगों के ठहरने का स्थान रहा हो,क्योंकि गाँव के किनारे से होकर एक नदी बहती है या यूँ कहें कि गाँव नदी किनारे बसाया गया होगा तो इस बात की संभावनाएं बढ़ जाती है कि ये कभी राहगीरों या सेनाओं का ठौर रहा होगा।

पर जैसा कि हर गाँव इतिहास में दर्ज़ तो किया नहीं गया इसलिए सिर्फ़ कयास लगा सकती हूँ।अब तक तो आप लोग समझ ही गए होंगे कि मेरे नानाजी का गाँव कोई ऐतिहासिक धरोहर नहीं है पर इलाके में लोग गाँव को जानते हैं।मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में पड़ने वाला ये गाँव जिले के लोगो मे जाना पहचाना है...एक मिनट एक मिनट हाँ!मंदसौर वही पशुपति नाथ मंदिर वाला.हाँ हमारे मंदसौर में भी एक पशुपतिनाथ का मंदिर है और यकीन मानिए ये  मूर्ति नेपाल वाली मूर्ति से 19,20 ही होगी लेकिन मध्यप्रदेश में महांकाल,ओम्कारेश्वर  जैसे ज्योतिलिंग हैं और खजुराहो कान्हा किसली ,महेश्वर ,मांडू जैसे कई दूसरे पर्यटन स्थल है इसलिए मन्दसौर के पशुपतिनाथ को शायद उतनी प्रसिद्धि न मिल सकी जितनी अब तक मिल जानी चाहिए थी।
हाँ तो मंदसौर जिला एक और चीज़ के लिए प्रसिद्द रहा है'अफ़ीम की खेती'. सरकारी नियमों के चलते जो अब थोड़ी कम हो गई पर यकीन मानिए अफ़ीम इलाके के कई किसान उगाते रहे और ईमानदारी से सरकार को बेचते आए हैं।आगे कभी मौका मिला तो अफीम की खेती और उससे जुड़े व्यापार की पूरी डीटेल बताउंगी पढ़ने वालों को, फिलहाल कयामपुर पर वापस आते हैं।
कुल मिलाकर स्टैण्डर्ड गाँवो की छवि वाला गांव है रुकिए रुकिए जनाब हवा में किले मत बनाइये यश जी की फिल्मों वाले गाँव फिल्मों में ही होते हैं हाँ उनकी फिल्मों जैसे राज सिमरन टाइप के किरदार इस गांव में भी रहे होंगे पर ये पंजाब का गाँव तो है नहीं जो सरसों के खेत लहलहाए और बैकग्राउंड में हमेशा' घर आजा परदेसी 'की धुन बजती रहे या हवा में मोहब्बत तैरती फिरे, हाँ गाँव मे नदी है पर कोई सोनी महिपाल वाला किस्सा नहीं है क्योंकि नदी बिचारी छोटी सी बची है और पुराने ज़माने में भी सोन नदी जैसी तो नही ही थी कि उफनती नदी को मटके लेकर पर करना पड़े ...खैर!आम स्टैण्डर्ड गाव से मेरा मतलब था पुराने कच्चे घर ,एक नदी आस पास  के इलाकों में खेत जिनमे पहले मोटा अनाज और सब्जियां लगती थी जो बाद हरित क्रांति के समय गेहूँ और फिर सोयाबीन की खेती में बदला और अब तो इन सारी फसलो के साथ संतरों के बाग भी काफी प्रचलित है।और कई छोटे मोटे गांव भी लगे हैं तो व्यापार का छोटा मोटा केंद्र जैसा है मेरा ननिहाल।
एक बात तो है मेरे किस्सों में आपको ट्रेजिक पार्ट कम मिलेगा पहली बात तो ये की कयामपुर इलाके का संरराध गाँव है तो भूख से बिलबिलाते बच्चे या सिर्फ आलू भूनकर खाने जैसी तकलीफों वाले किस्से ज़रा कम या शायद नहीं ही सुनने में आते हैं दूसरी बात मेरा ननिहाल का परिवार जाना पहचाना काफी समृद्ध है तो किस्सो में गाँव मे छोटी सी झोपड़ी और टिमटिमाता तेल के अभाव में बुझने को हो आया दीपक जैसा एंगल भी न ही मिलेगा।(इन वाक्यों को गरीबी का मज़ाक उड़ाता हुआ कतई मत समझियेगा ये बस  इसलिए कि मेरी कहानी या आने वाले किस्से गाँव की दुखभरी कहानी नही है। हाँ गाँव है तो कई भौतिक असुविधाएं रहीं है माहौल भी रहा है वो ज़रूर पढ़ने मिलेगा।
हाँ तो मंदसौर जिले के मंदसौर शहर से मेरा ननिहाल कयामपुर तकरीबन 35 किलोमीटर दूर है और लगभग दस हज़ार की आबादी वाला ये गांव आजकल लगभग सर्वसुविधायुक्त है।गांव के रास्ते में दूर दूर तक लगे सोलर पैनल और पानी की कमी पूरी करने के लिए बड़े बड़े पाइप की पाइपलाइन डालकर बनाया जा रहा वाटर प्रोजेक्ट इस बात की गवाही देता है।ये गांव भी हमेशा से ऐसा नहीं था समृद्धि आते आते आई है और इसके लिए गाँव के लोगो ने भी मेहनत की है।
सबसे पहले बात करते हैं कि यहां तक पहुंचा कैसे जाता है देखिए मेरी बात मत करिए मेरे लिए कयामपुर पहुंचने के लिए सोना जरूरी है एक दम सिंपल चादर तानो सो जाओ सपनो में नाना घर। पर सब मेरी तरह महान तो नहीं हो सकते ना तो आम लोगो को वहां तक पहुंचने के लिए दुनियावी तरीको का इस्तेमाल करना होता है।
कयामपुर तक पहुंचने के कई तरीके होते है पहला तो इंदौर शहर से काफी दूर होने के बावजूद रोज एक बस इंदौर से कयामपुर के लिए चलती है जिससे आप डायरेक्ट वहाँ पहुंच सकते हैं।
दूसरा इंदौर से  मंदसौर ( ट्रेन या बस किसी भी साधन से )जाइये वहाँ मंदसौर बस स्टैंड से हर आधे घंटे में कयामपुर के लिए बस मिल जाती है जो आपको तकरीबन सवा से डेढ़ घंटे में कयामपुर छोड़ देगी वैसे इन बसों का हाल आज भी लगभग वैसा ही है जैसा मेरे बचपन मे था।भारी भीड़, धक्कामुक्की ,धूल और टिपिकल बस वाली गंध जिसमे बीड़ी ,गुटखे पसीने और धूल की मिली जुली गंध शामिल होती है।
तीसरा रास्ता है आप मंदसौर से अपनी गाड़ी लेकर जा सकते हैं पर आप क्यों जाएंगे ये सोचने वाली बात है क्योंकि ये कोई पर्यटन स्थल तो है नहीं गाड़ी लेकर चले भी गए तो वह कोई होटल तो है नहीं रुकेंगे कहाँ?अब मैं लिख रही हूँ तो कह सकती हूँ मेरे ननिहाल में रुक जाइयेगा पर जाकर करेंगे क्या ये टेढ़ा प्रश्न है।वैसे पूरा गाँव मेहमाननवाज़ी के लिए फेमस है और गाँव की मेहमाननवाज़ी के भुक्तभोगी कई लोग हैं आगे वो किस्से भी सुनाऊँगी कभी,लेकिन एक बात पक्की है लोग दिलदार है चाय पिलाने के मामले में तो पक्के दिलदार।
अभी फिलहाल इतना समझ लीजिए कि किस्सों की दुनिया मे स्वागत है आपका ....
इनमे कुछ किस्से मेरे अपने होंगे कुछ मेरे ममेरे भाई बहनों के,कुछ गांव के लोगो से भी लिए जा सकते हैं और चाहे तो आप पढ़ने वाले भी अपने ननिहाल के किस्से शेयर कर सकते हैं।मालवा अंचल पर ज्यादा लिखा नही गया है वैसे और जो लिखा गया है वो इंदौर के आसपास ज्यादा भटका है मंदसौर तक काम ही आ पाया है तो कोशिश करूँगी कि मंदसौर जिले की संस्कृति और बोली भाषा से भी परिचय करवा सकूँ।।आगे इस बात पर निर्भर करेगा कि लिखने वाले को लिखने में और पढ़ने वालों को पढ़ने में कितना मज़ा आता है और ये यात्रा कितनी लंबी और कब तक चलेगी..देखते हैं ये ननिहाली किस्से सिर्फ मेरे रहते हैं या और भी लोग इनसे जुड़ने का मन बनाएंगे...



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Tuesday, November 14, 2017

तुम इश्क़ में भोपाल हो जाओ हम इंदौर हो जाएं

चलो हम दोनों भी इश्क़ में मशहूर हो जाएं
तुम भोपाल हो जाओ, हम इंदौर हो जाएं

 तुम धीरे से मुस्का देना हम ताली देकर हँस देंगे
तुम शायरी एक उछालना, हम बाहों में तुमको कस लेंगे
 तू भीमबैठका की सुबह सा शांत, मैं चौक बाज़ार की रात सी हूँ
तू भोपाली नफ़ासत वाला, मैं बिन बातों की बात सी हूँ
तुम बन जाओ साँची के संयम, हम भेड़ाघाट की जलधारा का शोर हो जाएं...
तुम भोपाल हो जाओ हम इंदौर हो जाएं।

चलो हम दोनों भी इश्क़ में मशहूर हो जाएं
तुम भोपाल हो जाओ हम इंदौर हो जाएं।

 खजुराहो की कला जैसे ,हम प्रेम को वश में कर लेंगे
 बाजबहादुर रूपमती के किस्से फिर जीवित कर देंगे
 तुम विशाल बड़े तालाब बनो, मैं पातालपानी की लहर बनु
 तुम महेश्वर के घाट जैसे, मैं राजवाड़ा सी शान बनु
तुम भटके हुए मुसाफ़िर, हम तेरा ठौर हो जाएं
 तुम भोपाल हो जाओ हम इंदौर हो जाएं।

रीगल में फिल्में देखकर हम इश्क़ के ढेरों ख्वाब बुनें
वीआईपी रोड की शाम तले हम ख्वाबों के गहरे रंग चुने
तुम तालाब के गहरे नीले रंग, मैं रंग में तेरे रंग जाऊ
तुम बन जाओ मेरे जोगी, मैं तेरी जोगन कहलाऊँ
तुम चौक का मीठा शर्बत, हम सर्राफे की चाट- चटोर हो जाएं
तुम भोपाल हो जाओ हम इंदौर हो जाएं।

जहाँ प्यार बढ़े वो सुबह हो तुम जहाँ सुकूँ मिले वो सहर हूँ मैं
धीरज धरते महाकाल से तुम,शिप्रा सी चंचलचपल हूँ मैं
 मैं रेवा सा आँचल फैला दूँ तुम छाव में आकर सो जाओ
 मेरी गहरी काली आंखों में भोपाली सुरमे से रम जाओ
प्रेमरंग में डूबें कान्हा-किसली के मोर हो जाएं
तुम भोपाल हो जाओ हम इंदौर हो जाएं।

चलो हम दोनों भी इश्क़ में मशहूर हो जाएं
तुम भोपाल हो जाओ, हम इंदौर हो जाएं


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Monday, November 13, 2017

वो भी खुश नहीं रहते

देकर के ज़ख्म ख़ुद भी तो मरहम नहीं लेते
जो बीच राह छोड़ते हैं वो भी खुश नहीं रहते

इश्क़ की दीवारों में सेंध मारकर
सोने के महलों में भी बैचेन होते हैं
खून के आंसू रुलाकर वो
दर्द की बात कहते हैं
उनके सज़दे भी अनसुने
उनकी दुआएं भी बेअसर
उनकी पूजा भी अधूरी
उनके दीपक भी चमक भर
किसी की दुनिया जलाकर ख़ुदा का कहर वो सहते
जो बीच राह छोड़ते हैं वो भी खुश नहीं रहते

वो ज़माने से लड़ जाने की कसम खाकर
प्यार के झूठ का रंग चढ़ाकर
ले जाते है हर रंग ज़िन्दगी से खींचकर
बेरंग कर गए जो सब्ज़बाग दिखाकर
वो रंगमहल में भी चले जाएं तो जाए
दुनिया की हर शय अपने कदमों में बिछाए
ख्वाबों का कारोबार करें ख्वाब सजा ले
अंधेरों की दुनिया का बद्दुआ का असर है
ख्वाब की दुनिया मे भी बेधड़क नहीं रहते
जो बीच राह छोड़ते हैं वो भी खुश नहीं रहते।

Sunday, August 27, 2017

देहगंध (कहानी)

वो इत्र की शीशी को दाहिने हाथ में लेती है और अपने बाएं हाथ की तरफ धीरे से बढ़ा देती है ,हथेली को उल्टा करके रुई के फाहे से उसपर खुशबू बिखेर लेती है और उस हाथ को अपनी नाक के पास ले जाकर सूँघती है और फिर खुशबू को सूंघते ही उसके चेहरे पर ऐसे भाव आते हैं जैसे किसी अजनबी से इस आस में मिली हो कि वो कोई अपना ही है पर मिलते ही अजनबीपन का अहसास हो गया हो...
उसने इत्र की दुकान वाले को दो इत्र की शीशी के पैसे दिए और इत्र हाथ मे लिए बाहर की तरफ बढ़ गई,तभी दुकानदार ने कहा "बेटा बुरा न मानो तो एक बात पूछू?" लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा जी चाचा पूछिये न"
बेटा तुम कितने ही दिनों से हर सप्ताह यहाँ आती हो जाने कितनी ही खुशबुएँ सूँघती हो और 1,2 शीशी इत्र लेकर चली जाती हो पर तुम्हे  कभी इत्र को सूंघते ही खुश होते नहीं देखा किसके लिए ले जाती हो ये इत्र"
लड़की लंबी सांस लेकर मुस्कुरा देती है आह भरते हुए आंखों में उतार आए समंदर को रोक लेने की कोशिश करते हुए कहती है "मैं इत्र में खुशबुएँ नही अपनापन ढूंढने आती हूँ चाचा मेरा खोया हुआ करार ढूढने आती हूँ। पर हर बार बेचैनियां ले जाती हूँ "
इत्र की शीशियां शोकेस में जमाते हुए हुए चाचा के हाथ वही रुक जाते हैं वो हैरानी से लड़की की तरफ देखते हुए कहते हैं "मैं  कुछ समझा नहीं बेटा"
लड़की अपनी उदास आंखों से इत्र की शीशियों को ऐसे देखती है जैसे उनमें कोई उम्मीद छुपी हो, और फिर हाथ की घड़ी की तरफ देखती हुई हड़बड़ाहट में कहती है आज ज़रा जल्दी में हूँ चाचा अगली बार आउंगी तो सारी कहानी बताउंगी"इतना कहकर वो दुकान से बाहर निकल जाती है
काउंटर के इस पार खड़े चाचा मन में घुमड़ते हुए ढेरों सवालो को रोकते हुए इत्र की शीशियों को निहारते हैं और मुस्कुराते हुए मन ही मन सोचते हैं"अगले सप्ताह का इंतज़ार..."
कुछ दिनों बाद नूर इत्रवाले ने रोज की तरह ही अपनी दुकान खोली और एक छोटा काउंटरनुमा टेबल दुकान के मेन काउंटर से सटाकर बाहर की तरफ रख दिया इस टेबल पर कुछ सीधी के जैसे दिखने वाले शेल्फ बने थे नूर चाचा ने में काउंटर के दाहिने तरफ बने एक खाने ( खंड/शेल्फ) से लकड़ी के डंडे पर  मलमल का कपड़ा बांधकर बनाई हुई झटकनी उठाई और हल्के हाथों से काउंटर साफ करने लगे।
उनने एक एक करके इत्र के बड़े छोटे मर्तबान और शीशियां काउंटर पर जमाने शुरू कर दिए।साथ मर्तबानों पर लिखे इत्रों के नाम चेक करने लगे और जिन मर्तबानों पर नाम हल्का हो गया या उनकी चिट फटी हुई दिखी उनपर नई चिट लगाने लगे। ये उनका हर दिन का काम था जो वो बरसो से बिना नागा के करते आ रहे थे।उनके बारे में मशहूर था कि वो इत्र के जादूगर थे,इत्र की खुशबू भर से वो उसकी तासीर ,प्रकार,असर सब बता देते थे,लोग कहते थे नूर चाचा इत्र बेचते नही इत्र जीते आए हैं।
उन्होंने एक इत्र की शीशी हाथ में ली और जाने उनके मन में क्या आया कि उसे एक तरफ रख दिया और दुकान के नौकर मुन्ना को आवाज़ लगाते हुए बोले "मुन्ना आज ये चंदन वाला इत्र किसी को न देना देना हो तो अंदर के मर्तबान से निकालकर देना या न समझ आए तो मनाही कर देना "
मुन्ना ने हाथ घुमाते हुए चेहरे पर बड़ी ही हैरानी वाले भाव लाते हुए कहा "चाचा क्या बात हो गई कल ही तो ये इत्र इस मर्तबान में डाल कर रखा था आपने" चाचा ने बड़ी ही संजीदगी से जवाब दिया '"लगता है इस इत्र में कुछ बूंदे चमेली के इत्र की पड़ गई है " मुन्ना बड़े इत्मिनान से बोला चाचा आपकी परख की तो लोग कसमे कहते हैं पर आप भी जानते हैं इससे खुशबू में कोई खास फर्क नहीं आता फिर क्यों इतना महँगा इत्र एक तरफ रखना"
चाचा ने इत्र की शीशी एक तरफ रखते हुए कहा "कभी कभी फर्क खुशबू पर नहीं ईमान और ऐतबार पर पड़ता है और मैं अपने ईमान पर ,लोगो के ऐतबार पर कोई फर्क नही डालना चाहता"
मुन्ना चाचा की बात सुनकर मुस्कुरा दिया वो जानता था बरसों से चाचा ने इत्र बेचकर पैसे से ज्यादा इत्र का इल्म  और लोगो का ऐतबार कमाया है ये दुकानदारी का नहीं इत्र से इश्क़ का मामला है और इश्क़ में सौदे का क्या काम...
सोचते सोचते ही मुन्ना ने अपनी टेढ़ी हुई जालीदार टोपी सीधी की और बाहर वाले काउंटर पर इत्र की रंग बिरंगी कतारें जमाने मे चाचा की मदद करने लगा।
मुन्ना ने देखा कि आज चाचा ने इत्र की शीशियों को देखकर मुस्कुरा रहे हैं और न ही गुनगुना रहे हैं यह तक कि उनने चंदन के इत्र को देखकर गाया 'चंदन सा बदन चंचल चितवन' और न ही रजनीगंधा का इतर हाथ मे लेते हुए उनके होंठों में हरकत हुई " रजनीगंधा प्रेम तुम्हारा"...और तो और गुलाब का इत्र हाथो में आकर वापस शेल्फ में चला भी गया पर उनने नही गुनगुनाया "फूल गुलाब का लाखों में हज़ारों में चेहरा जनाब का.."मुन्ना का मुंह हैरत से खुला का खुला रह गया इतने सालों में उसने कभी ऐसा नही देखा था ...
मुन्ना ये तो समझ गया था कि चाचा खोए खोए हैं पर इस अनमनेपन की वजह से वो अनजान था आखिर उसने पूछ ही लिया " क्या बात है चाचा आज आप किसी और ही दुनियामे खोए दिख रहे हो " चाचा ने उसी अनमनेपन से जवाब दिया "हाँ इंतेज़ार कर रहा हूँ उस लड़की के लौट आने का" मुन्ना अवाक होकर बोला कौन लड़की चाचा? चाचा ने कहा "वही जो अपनी कहानी अधूरी छोड़ गई "फिर जैसे खुद ही बोले तुम नही जानते जाने दो इस बात को..मुन्ना भी सर हिलाते हुए वापस काम में लग गया...
ऐसे हर दिन इंतेज़ार करते हुए दिन बीतते जा रहे थे ना तो लड़की आ रही थी न चाचा के दिल को चैन आ रहा था
एक दिन चाचा ने दुकान खोली ही थी कि दूर से वो लड़की आती दिखाई दी नूर चाचा के चेहरे पर जैसे नूर लौट आया होंठों पर बच्चो की सी मुस्कुराहट तैर गई...वो दुकान के अंदर मुन्ना को आवाज़ लगाते हुए बोले"मुन्ना ये सुबह का काम ज़रा तू निपटा मुझे कुछ और काम करना है आज.....
मुन्ना ने अंदर से ही कहा ठीक है चाचा पर बात क्या है चाचा कुछ जवाव दे पाते उसके पहले ही वो लड़की दुकान तक आ गई और उसे देखते ही चाचा ने कहा "आ गई तुम बेटा"  और लड़की फीकी सी हँसी हँसते हुए बोली लगता है मेरा इंतेज़ार कर रहे थे आप? चाचा ने मुस्कुराते हुए कहा "हां बेटा तुम्हारा भी और तुम्हारी इत्र की शीशियां खरीदने की वजह का भी"
लड़की ने पास ही रखा स्टूल अपनी तरफ खींचा और उसपर बैठते हुए बोली अच्छा तो आज इतर बाद में देखूंगी पहले आप मेरी कहानी ही सुन लीजिए शायद मेरी उलझन का कोई हल आप ही बता दें मुझे.."फिर कुछ सोचते हुए लड़की ने कहा पर एक बात का वादा करिए चाचा की मेरी कहानी सुनकर आप मेरे लिए कोई राय नही बनाएंगे क्योंकि आप अनजान नही पर इतने जाने पहचाने भी नही की मै आपको ये सब बताऊ पर क्योंकि आप इत्र का इल्म रखते हैं और ये कहानी सुनना भी चाहते हैं इसलिए मेरा दिल कहता है कि आपको बताने में हर्ज़ नहीं...। ये कहकर वो चाचा की आंखों में सवालिया निगाहों से देखती है और चाचा बस इतना कहते है  इत्मिनान रखो बेटी मैं ना तो तुम्हारे बारे में कोई राय बनाऊंगा और हो सकेगा तो तुम्हारी मदद भी करूँगा....

नैना ने लंबी सांस लेते हुए बोलना शुरू किया आदित्य नाम था उसका इंटरनेट पर मिला था हम दोनों के शौक मिलते थे हम दोनों को ही पढ़ने का शौक था वो कभी कभी कविताएं लिखता भी था ...जीवन से भरी हुई, प्यार से भरी हुई सतरंगी कविताएं और में उसकी लिखी कविताएं पढ़ती थी...अच्छा लगता था उसकी कविताओं में बंधी उम्मीद की पोटली को खोलना ऐसा लगता था जैसे जीवन को नए रंग मिल गए हों ,जैसे जीवन संघर्ष नही उत्सव है और इस उत्सव को उत्साह से मनाना ही इंसान के लिए सबसे ज़रूरी है  बस इसी सब के बीच उससे दोस्ती हो गई..इंटरनेट पर ही बातें होने लगी एक दूसरे के बारे में जानने का मौका मिला नैना दो मिनट रुककर कुछ सोचते हुए बोली आपको कुछ अलग लग रहा होगा ना ये सुनकर तो चाचा ने मुस्कुराते हुए कहा नही नैना बेटा ऐसा कुछ नही ऐसी दोस्तियां हमारे ज़माने में भी हुआ करती थी पेन फ्रेंड होते थे उस ज़माने में और लोग ऐसे ही अनजान लोगों को खत लिखकर दोस्ती किया करते थे बस तरीका बदल गया अब नए जमाने मे. चाचा की बात सुनकर नैना मुस्कुरा दी और इस बीच चाचा ने 2 चाय का आर्डर भी दे दिया चाय की चुस्की लेते हुए नैना ने आगे कहा आदित्य से कई दिनों तक छोटी मोटी बातें होती रही पर धीरे धीरे बारें लंबी होती गई और जुड़ाव गहरा होता गया बातों बातों में ही पता चला कि इलाहाबाद का रहने वाला है वो बैंगलोर में एक फाइनेंशियल कंपनी में मैनेजर की पोस्ट पर था  । इलाहाबाद में बीते बचपन और गंगा नदी के सानिध्य का ही असर रहा होगा जो वो लिखने पढ़ने का शौकीन था और मेरा पढ़ने का शौकीन होना शायद मेरी  यहां भोपाल में हुई परवरिश का नतीजा है मैंने अपना सारा बचपन पुराने भोपाल के पटियों के किस्से सुनते और भोपाल मेले से लेकर, रविन्द्र भवन,गौहर महल छोटे बड़े तालाब के आस पास होने वाले मुशायरो को सुनकर बिताया।नैना की बातें सुनकर जैसे चाचा भी पुराने दिनों में खो गए और मुस्कुराने लगे नैना ने आगे कहा हमारी दोस्ती ऐसे ही बढ़ती जा रही थी कविताओं से शुरू हुई बातें कब सुख दुख की बातें बताने और फिर दिल धड़कने ,दिल की गिरहें खोलने तक जा पहुंची हमें पता ही नही चला हम दोनों एक दूसरे के लिए जुड़ाव महसूस करने लगे और ये धीरे धीरे हम दोनों की बातों में झलकने लगा।इंटरनेट से शुरू हुई बातें फ़ोन पर रोज़ होने वाली बातों में बदल गई शायद इश्क़ हमारी ज़िन्दगियों में चुपके से दबे पांव आने लगा था
बस हमने इज़हार नही किया था या शायद हम खुद ही उसके आने को महसूस नही कर पाए थे।
फिर एक दिन उसने मुझसे कहा कि वो अपनी बुआ के घर भोपाल आ रहा है 2,3 दिन के लिए क्या मैं उससे मिलना चाहूंगी और मैंने उसे हाँ कर दिया पर मैं उससे ज्यादा देर नही मिल सकती थी तो उससे कहा कि मैं  कॉलेज जाते समय उससे स्टेशन पर ही मिलने आ जाउंगी वो स्टेशन पर आया हम दोनों मिले थोड़ी देर बात करने के बाद हम दोनों अपने अपने रास्ते चल दिए। बस यही शायद वो समय था जब हमें इश्क़ का अहसास हुआ हमने अपने अपने दिल मे एक दूसरे के लिए प्यार महसूस किया जाने से पहले उसने एक बार और मुझसे मिलने के लिए पूछा और मैने भी हाँ कह दिया।
हम बड़े तालाब के किनारे बने रेस्टॉरेंट में मिले पिंक कलर के शर्ट में वो मुझे बहुत ही प्यारा और मासूम लग रहा था चश्मे के पीछे से झांकती उसकी गहरी नीली आंखें बेहद खूबसूरत लगी मुझे, तालाब के पानी का नीलापन जैसे उनमे उतर आया था उसने धीरे से मेरे हाथों को पकड़ते हुए कहा - नैना में तुमसे प्यार करने लगा हूँ  और अपनी सारी जिंदगी तुम्हारे साथ बिताना चाहता हूँ क्या तुम ज़िन्दगी भर मेरा साथ देना चाहोगी?
मैं कुछ समझ नहीं सकी और बस इतना कह पाई की आदित्य प्यार शायद मैं भी करने लगी हूँ तुमसे पर मुझे सोचने के लिए थोड़ा टाइम चाहिए ।उसने धीरे से मेरा हाथ दबाया और मुस्कुराते हुए कहा तुम पूरा टाइम लो नैना ,ये ज़िन्दगी का सवाल है अच्छे से सोचसमझकर फैसला लेना क्योंकि प्यार कर लेना अलग बात है पर उसे निभाने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए होती है। एर उसने पूछा क्या एक चीज़ मांग सकता हूँ तुमसे ?मना तो नहीं करोगी मैंने आंखों में तैरते सवालों के साथ उसे देखा उसने कहा जाने से पहले एक बार तुम्हे गले लगाना चाहता हूँ उसके बाद तुम जो भी फैसला लोगों मुझे मंज़ूर होगा ।उसकी बात सुनकर मैं धीरे से उसके गले से लग गई ।उसके इत्र की खुशबू मुझे बेहद अच्छी लगी ऐसा लग जैसे बरसो से कस्तूरी की खुशबू के लिए भटकते हिरण को कस्तूरी मिल गई हो और उसी समय मुझे याद आया कि उसने कभी कहा था कि उसे इत्र का बेहद शौक है भोपाल के चौक बाजार से न जाने कितने ही इत्र उसने खरीदे थे और भी जहां जाता उस शहर में अगर इतर की कोई फेमस दुकान होती तो वहाँ से इत्र ज़रूर लाता था
नैना ने खोई खोई सी आवाज़ मे कहा वो अलग ही अहसास था जैसे मन की शांति का अहसास हो मैंने उसी समय आदित्य के साथ ज़िन्दगी बिताने के लिए मन बनाना शुरू कर दिया था ।बस फिर हम दोनों उस रेस्टॉरेंट से बाहर आए आदित्य ने जाते जाते एक बार मेरा हाथ अपने हाथों में लिया और मुस्कुराते हुए कहा मुझे तुम्हारे जवाब का इंतज़ार रहेगा नैना , मन तो हुआ कि कह दूँ की मेरा जवाब हां है पर जाने क्यों खुद को  ये सोचकर रोक लिया की 1,2 दिन में बता दूंगी।पहले खुद ज़माने से लड़ने और इश्क़ को निभा सकने के लिए तैयार हो जाऊं
आदित्य चला गया और मैं मन ही मन सोचने लगी कि कैसे उसे बताउंगी की में भी उससे प्यार करने लगी हूँ वो बंगलोर पहुंचा उस दौरान मेरी उससे बस एक बार बात हुई  वो मुझे बातों में बहुत खुश लगा उसने मुझसे पूछा भी की क्या नैन कुछ सोच पर मैन उसे कहा कि तुम घर पहुंचो टैब तुम्हे बताउंगी।फिर 2 दिन बाद मैंने पूरी तैयारी करके एक एक शब्द मन में रटकर उसे फ़ोन किया, काफी देर घंटी जाने के बाद जब कॉल रिसीव किया तो दूसरी तरफ से एक अनजानी आवाज़ ने कहा मैं समीर बोल रहा हूँ आदित्य का रूममेट हूँ आदित्य ने बताया था तुम्हारे बारे में इतना कहकर वो चुप हो गया मैंने बैचेनी से कहा है समीर तुमने फ़ोन क्यों रिसीव किया है आदित्य कहाँ है अच्छा ठीक हैं आदित्य से कहना नैना का फ़ोन था...
समीर ने रुआंसी आवाज़ में कहा मैं नही बात सकूँगा नैना बंगलोर आने के बाद टेक्सी से घर आते टाइम उसका एक्सीडेंट हो गया चोटें बहुत गहरी थी अस्पताल ले जाते हुए रास्ते मे ही..जाते वक्त उसके होंठो पर तुम्हारा नाम...ये कहते कहते वो फूट फूटकर रोने लगा...आगे उसने क्या कहा न तो मुझे सुनाई दिया और ना ही कुछ सुनने की मुझमे हिम्मत थी...ये कहते कहते नैना की आंखों में आंसू आ गए चाचा ने अपनी आंखों में आई नमी छुपाते हुए कहा या अल्लाह ये क्या किया तूने...नैना ने सुबकते हुए कहा वो  खुशबू अब भी मेरे साथ है चाचा सोते जागते वो खुशबू जैसे मेरा पीछा करती है रात दिन बस ये खयाल खाए जाता है कि काश मैंने उसके जाने से पहले अपने इश्क़ का इज़हार कर दिया होता काश उसे रोक लिया होता...
नैना की बातें सुनकर चाचा अचानक कुछ सोचते हुए कहते हैं तो इतने दिनों से तुम वो खुशबू ढूंढने यहाँ... नैना से आंसू पोंछते हुए कहा हाँ चाचा मैं पिछले चार साल से वो खुशबू ढूंढ रही हूँ न जाने कितनी दुकानों पर इतर ढूंढे पर वो खुशबू कभी नहीं मिली कभी नहीं..
चाचा ने पानी का ग्लास उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा नैना मत ढूंढो उस खुशबू को वो अब तुम्हे नही मिलेगी नैना ने आश्चर्य से उनकी तरफ देखा तो चाचा बोले हैं बेटा हर खुशबू हर इंसान पर अलग असर करती है कभी सोचा है गुलाब का वही इत्र कही मज़ार पर अलग महसूस होता है और हाथों में लेकर सूंघने पर अलग  और अलग अलग इंसानो पर अलग ऐसा क्यों? क्योंकि इंसान खुशबू नही चुनता खुशबुएँ इंसान चुनती है वो अपनी महक अलग अलग जगह अलग ढंग से फैलाती है..
ये खुशबुओं की दुनिया का उसूल है बेटा वो सबके साथ अलग होती है हर देह पर अलग, हर जगह पर अलग, हम ज़िन्दगी भर इस मुगालते में रहते हैं कि हमने खुशबू चुनी पर हम खुशबू नही चुनते खुशबू अपने अलग ढंग से महकने के लिए हमें चुनती है...
आदित्य के पास जो खुशबू तुम्हे महसूस हुई  वो सिर्फ इतर नही था उसमें उसका इश्क़ भी था उसकी रूह भी थी अब कोई इत्र उस प्रेमगन्ध को उस देहगंध को वापस नहीं ला सकता...उस खुशबू ने आदित्य को चुना था इसलिए वो गंध तुम्हारे मन में घर कर गई आज भी तुम उसे भूल नही सकी..
तुम उस खुशबू को मत खोजो अब ...क्योंकि वो अब वापस नहीं आ सकती जानता हूँ तुम भूल नही सकती पर अब छोड़ दो उसे आज़ाद कर दो उस रूह को, उस इश्क़ को...उस खुशबू को...क्योंकि आदित्य के साथ वो देहगंध जा चुकी हैं... ये सुनकर नैना ज़ोर ज़ोर से रोने लगी चाचा ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा मुक्त कर दो बेटा उसे ,मत ढूंढती फिरो उस खुशबू को इसी में तुम्हारी भलाई है और आदित्य की रूह के लिए भी यही मुनासिब है...
जा चुकी खुशबू को ढूंढोगी तो दर्द के सिवा कुछ नही मिलेगा कुछ भी नहीं

Monday, September 19, 2016

अन्वित


बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर पोस्ट कर रही हूँ ..बेटे के लिए एक कविता लिखी है 

कितना सुन्दर है प्यारे बेटे तेरा इस जीवन में आना
शीतल कोमल पूर्ण चन्द्र सा मद्धम मद्धम मुस्काना
इस दुनिया के सब रिश्तों पर धीरे से भारी पड़ जाना
हौले हौले से मेरा सबसे प्यारा अन्वित (दोस्त) हो जाना

तुम मन के तारों में झंकृत हो साँसों में गुंजित हो  
सब बच्चे प्यारे होतें पर तुम ही एक मेरे शाश्वत हो 
टूटी तुतली बोली में कानों में धीरे से कुछ कह जाना
हौले हौले से मेरा सबसे प्यारा अन्वित(दोस्त) हो जाना

छोटे छोटे पैरों से जीवन की हर मंजिल चढ़ना
सुनना सबकी पर तुमको जो ठीक लगे वो ही करना
हँसते हँसते आगे बढ़ना खूब पल्लवित हो जाना
जो करना उस काम में सबके अन्वित (लीडर) हो जाना

तुम छोटे तुम बच्चे हो छोटी सी दुनिया तुम्हारी है
पर देखना सारी दुनिया जो सच में बहुत ही प्यारी है
हम भी गलत कहें ,रोकें तुम्हे तो अपनी बातों से समझाना
हम पीछे हट जाएँगे सच्ची,तुम हमारे अन्वित (लीडर)हो जाना   

सब माया है सब मोह है सब छोड़कर हमें जाना है
पर जब तक जीवन है तेरी मुस्कानों का फ़र्ज़ निभाना है
मुश्किल है इस रिश्ते का इस जन्म में सीमित हो जाना
मन को भाए तुमसे जन्मों का अन्वित(सम्बन्ध) हो जाना

जीवन की राहें मुश्किल है रास्तों में कितने रोडे है
दर्द के लम्हे ज्यादा है खुशियों के मौसम थोड़े हैं
मनका माला को जोड़ कर प्रेम का संचित हो जाना
हो सके तो धीरे से अपनेपन का अन्वित (रिश्ता जोड़ने वाला) हो जाना

दुनिया की अंधी दौड़ की होड़ में तुमको न झोकेंगे 
तू सोच समझकर मन से करना हम करने से न रोकेंगे 
दुनिया की नज़रों में उठकर क्या जीवन भर पछताना 
बस बेटा तू अपनी नज़रों में साबित हो जाना 
मेरे लिए मायने रखता है तेरा एक दिन अन्वित हो जाना 






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Tuesday, March 17, 2015

तेरे इस शहर के बच्चे मुझे बच्चे नहीं लगते

उतने मासूम नहीं लगते,उतने कच्चे नहीं लगते
तेरे इस शहर के बच्चे मुझे बच्चे नहीं लगते

जहाँ लगते थे मेले कभी गर्मी की छुट्टी में
उन जगहों को अब झूले अच्छे नहीं लगते

वो सिक्के जो बोए थे कभी नाना के बाग़ में
पूरी जेबें भरे नोट भी उन सिक्को से नहीं लगते

जो लोग दूसरों की गलतियों का तमाशा बना दे
अपने बच्चो के गुनाह माफ़ करे तो सच्चे नहीं लगते

मेरे शहर में लोग ऐसे ही थे जेसे इस शहर में है
लाख कोशिश करू ये लोग मेरे मन से नहीं लगते ...

वहां भी ऐसे घर थे, बाग़ थे दिन और रात थे
परदेस में ये सब भी अपने वतन से नहीं लगते

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Wednesday, March 4, 2015

दम लगा के हईशा :तुमसे मिले दिल में उठा दर्द करारा (dam laga ke haisha :movie review)

छोटा सा, शहर गंगा का किनारा, कुछ गलियां  इन गलियों से ही अन्दर की तरफ जाती और छोटी गलियां जिनके दोनों तरफ कुछ घर, बड़ी गलियों में कुछ दुकानें और इन दुकानों में कुमार शानू ...नहीं कुमार शानू खुद नहीं पर उनकी आवाज़ ...और हमारे साथ उस आवाज़ को सुनता आयुष्मान खुराना ...मतलब फिल्म का नायक प्रेम ...और गाना एकदम जबर "तू मेरे इम्तेहानो में" सच कहूँ सुनकर ऐसा  लगा जेसे “अरे कितने दिनों से ये मीठी आवाज़ नहीं सुनी थी , ऐसा  लगा जेसे ओह यार हमें पता भी नहीं चला की हमने इतने दिनों से क्या खो दिया था जो इस फिल्म ने दे दिया ....
मुझे बचपन याद आ गया केसेट रिकार्डिंग  की दुकानें याद आ गई वो लिस्ट याद आ गई जो हम केसेट वाले भैया को देकर आते है गाने भरने के लिए ....दिल का आलम मैं क्या बताऊँ तुम्हे एक चेहरे ने बहुत प्यार से देखा मुझे...., मेरा दिल भी कितना पागल है ...,एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा ,,,,और भी न जाने क्या...

एक बडबोले शाखा बाबु जो खुद शादी करके मजे में है और प्रेम को सारे कुंवारों के महान कामों के उदहारण देते हैं   ,एक इंजीनियरिंग करके आया दोस्त जो तब तक पीछा नहीं छोड़ता जब तक बिचारे दसवी फेल प्रेम को मिठाई नहीं खिला देता अपने पास होने की,एक बुआ एक माँ , कुछ इधर उधर के लोग और एक कद्दावर मोटी बीवी जो सच में सारी छुईमुई हीरोइन वाली छवि को ध्वस्त करती है ....

प्रेम के पिताजी का कहना “ अरे कित्ती बार कहा है ये हैडफ़ोन लगाकर गाने न भरा कर  बीमार हो जाएगा , या दूकान में कुत्ता न घुस जाए ध्यान राखिओ”...जेसे उस ज़माने में लिए जाता है ..ऐसा लगता है यही सब तो होता था बिलकुल ऐसा ही तो सेम टू  सेम ....स्कूटर पर पीछे बैठी बीवी की चप्पल गिर जाना ,ससुराल से प्रेम का भूखा आ जाना और रस्ते में कचोरियाँ खाना , एक सिगरेट का दम भरना और जब संध्या ने कहा आप सिगरेट पीते हो तो बड़ा अकड़  के कहना "हां शराब भी पीता हु डरता थोड़ी हु किसी से" ...फिर धीरे से कहना "अच्छा ये बात घर में मत बताना" ...पति पत्नी के कमरे में जाने पर सास और बुआ का मुह दबाकर हसना ....पति का पत्नी से कहना अपनी पढाई का रोब न झाड़ो ....सब कुछ असा लगता है अरे एक दम सही ऐसा ही तो होता था डिक्टो .....

एक मिनट मुझे लग रहा है लिखते लिखते इतना खो न जाऊ की इस फिल्म की पूरी स्क्रिप्ट ही लिख डालू ....तो कहानी बताना बंद करती हु वो आप लोग खुद देख आइयेगा पर इतना कह सकती हु ये फिल्म  सच में लम्बे समय के बाद प्यार की महक लेकर आई है ...ये मेट्रो वाला हाई फंडू प्यार नहीं है ,न गाव वाला दबा छुपा डरा घूंघट वाला प्यार ये ऐसा प्यार हे जो शादी से शुरू होता है दिखावे से त्रस्त  आदमी की मजबूरी से गुजरता हुआ तलाक तक जाता है और फिर साथ रहने की मजबूरी से फिर शुरू होकर , अपनेपन ,सपोर्ट की सीढियां चढ़ता हुआ एकदम्मी सच्चे सच्चे पक्के ,गंगा मैया की कसम टाइप प्यार तक जाता है ....

अच्छा वापस से कहानी बताना बंद करती हूँ... हाँ तो फिल्म देखते हुए बार बार लगा जैसे ये फिल्म दिल के उस कोने को छूती है जिसे छूने वाली लिस्ट में बहुत ही कम फिल्मों का नाम लिखा जा सकता है ... एक ऐसे नायक नायिका की कहानी जो अपनी अपनी कमजोरियां जानते हैं लड़का जानता  है वो कम पढ़ा लिखा है लड़की जानती है वो मोटी है सब कुछ परफेक्ट......
ऐसी फिल्म जिसे देखते हुए लगता नहीं की हम कही दूर बेठे हैं सब कुछ अपने आस पास होता दीखता है ,छोटी छोटी चालाकियां,चुहलबाजियाँ ,सब अपना सा लगता है ,एक सीधा सा लड़का जो अपने माँ बाप की बहु को रोक लेने की चालाकियों का खुलासा करता है ,एक पढ़ी लिखी लड़की जो चांटा मरने से भी नहीं डरती और जरुरत पड़ने पर साथ भी निभाती है प्यार करती है तो जताती भी है ...पर मॉड टाइप नहीं है भोली है पर आत्मसम्मान वाली है ...सब कुछ खुद में से गुजरता हुआ सा लगता है ...पता ही नहीं चलता फिल्म गुजर रही है या हम फिल्म में से होकर गुज़र गए....

कुछ रूहानी नहीं ,कुछ कानफोडू नहीं,कोई ड्रामा नहीं ,कोई धमाल नहीं,शादी के ताम झाम नहीं सब कुछ सिंपल और यही चीज़ इस फिल्म को सबसे अलग बनाती है साथ में एक सोशल मेसेज भी की खूबसूरती सिर्फ शरीर से नहीं होती और प्यार इस सब बहुत ऊपर की चीज़ है ..पर कही भी ये मेसेज थोपा हुआ नहीं लगता क्यूंकि इसे किसी आदर्शवादी ढंग से नहीं दिखाया धीरे से बीज बोया गया धीरे धीरे फलने दिया गया ...कोई ज्ञान नहीं आराम से पनपता हुआ प्यार ....

आयुष्मान और भूमि दोनों की एक्टिंग जबरजस्त ,सारे चरित्र अभिनेता अभिनेत्री या साइड एक्टर्स इतनी स्वाभाविक एक्टिंग करते हुए दीखते हैं जेसे कोई दम नहीं लगाया गया हो सब उनकी खुद की भावनाएं है ... ये फिल्म चोपड़ा केम्प ने दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे जेसे बड़े केनवास पर नहीं बनाई पर यकीन मानिये इसके रंग उतने ही बेहतरीन है ...राइटर ने बारीक बारीक चीज़ों का ध्यान रखा है और देखकर असा बिलकुल नहीं लगता जेसे राइटर कोई हाई फंडू पेंटिंग बना रहा था ऐसा लगता है जैसे गावों में तीज त्योहारों पर बनाया हुआ मांडना है जिसमे हर चीज सही जगह पर होना ही उसे सबसे बेहतरीन बनाता है ....और कुमार सानु के गाने इस मांडने को बनाते हुए गए जाने वाले लोकगीत ...

फिल्म के लास्ट में एक गाना है तुमसे मिले दिल में उठा दर्द करारा , शूटिंग कपडे सब देखकर लगता है हम पुरानी (ज्यादा पुरानी  नहीं गोविंदा वाली ) फिल्मों के दौर में हैं....और सबसे बड़ी बात फिल्म जब ख़तम होती है तो लगता है अरे ये खत्म क्यों हो गई और बहार निकलते ही पहले शब्द इसे तो एक बार और देखूंगी ...अरे असा नहीं की मुझे समझ नहीं आई एक बार में J बस ये वो फिल्म है जिसे मैं बार बार देख सकती हूँ...

 हाँ बस जब फिल्म देखने गई तब ये दुःख जरूर हुआ की यशराज ने इस फिल्म का थोडा और प्रमोशन क्यों नहीं किया और अच्छे पोस्टर्स क्यों नहीं बनवाए क्यूंकि इस फिल्म को तो सिर्फ डायलोग ,सिर्फ आस पास की घटनाओं के लिए भी देखा जा सकता है ....उस दिन थिएटर खाली थे पर फिल्म के चलने की खबर से में खुश हूँ कुछ फिल्में माउथ पब्लिसिटी से ही चमकती है ....
 

अरे हाँ एक बात और भूमि इसमें सच में प्यारी लगी है 

(रिव्यू कैसा लगा बताइयेगा ):)

Friday, January 30, 2015

प्यार सच में पागल बना देता होगा न ? पता नहीं

मैं हमेशा से तुम्हे लिखना चाहती थी और  लिखना चाहती थी खुद को. लिखते लिखते जी लेना चाहती थी पर न जाने क्यों लिखते लिखते खो जाना इतना आसान नहीं , मैं ज़हर लिखना चाहती हु ऐसा ज़हर जो लिखते लिखते सूज गई उँगलियों में उतर आए , लिखने वाले को खबर ही न हो उसकी खुद की कलम अब उसे छलनी करने लगी है ...स्याही खून में घुलकर उसे नस नस तक पंहुचा रही है और लिखने वाला दिन ,दिन ऐसे मर रहा है की उसे खुद को भी असर पता न चले ...
मैं उस लड़की की कहानी लिखना चाहती हूँ जिसने कभी कुछ ख़ास बुरा नहीं किया पर बादल हमेशा उसे सिर्फ इसलिए प्यासा छोड़कर चले गए क्योंकि उसने कुछ ख़ास बुरा नहीं नहीं किया न कुछ ख़ास अच्छा किया ....जो खो गई इस दुनिया में क्योंकि उसने वो किया जो सब चाहते थे वो नहीं किया वो खुद चाहती थी ...वो प्यासी  रह गई क्योंकि वो प्यासी होने का ढिंढोरा न पीट सकी ...बस अपनी बारी का इंतज़ार करती रही ......

मैं हमेशा से कहानी लिखना चाहती थी उस लड़के की जिसे दुःख है की उसने प्रेम नहीं किया बस विवाह किया और अब वो इस बात का बदला सारी दुनिया से ले लेना चाहता है ...जता देना चाहता है  सारी दुनिया को की वो भी प्रेम की पींगे भरना चाहता था पर इन सारे लोगो की वजह से वो ये नहीं कर पाया ...ऐसा लड़का जो अपनी हर भूल का बदला अपनी ब्याहता से ले लेना चाहता है ...जैसे कह रहा हो तुम न होती तो मैं कहीं ज्यादा सुखी होता , या तुम न होती तो मैं भी किसी के प्रेम में सारी दुनिया से लड़ जाता पर अब कैसे लडू...तुम जो आ गई .....


मुझे मेरी कहानी में हमेशा से एक खुश लड़की चाहिए थी जो आंसू न बहाए ,जरा हिम्मती सी हो मैंने ऐसी  लड़की तो लिख दी पर राज़ की बात तो ये है की लिखने वाले जादूगर हुआ करते हैं  अरे नहीं नहीं जादूगर नहीं तांत्रिक जेसे कुछ ...सुना होगा न की तांत्रिक को अपना परिवार नहीं रखना चाहिए क्योंकि वो अगर किसी बुरी बीमारी या आत्मा का साया किसी पर से उतारते है तो तांत्रिक के अपने घर के किसी आदमी पर असर पड़ता है ...हम लिखने वालो के साथ भी शायद कुछ ऐसा ही होता है हम किसी खुश लड़की को ऐसे ही नहीं लिख सकते उसकी आँखों में चमक ,दिल में ख़ुशी डालने के लिए हमें अपनी आँखों में उसके आंसू लेने होते हैं ,अपने दिल की खुशिया निचोड़कर उस केरेक्टर में दाल देनी होती है ...

मैं इश्क लिखना चाहती हूँ ,इतना इश्क की एक दिन तुम्हे लगे की मैं तुम्हारे इश्क में पागल हो गई हूँ मैं तुम्हारे इश्क को गूगल ड्राइव जेसा एक फोल्डर बनाकर लिखना चाहती हु की जेसे ही में कुछ लिखू वो क्लाउड पर अपलोड़ हो जाए फिर जहाँ चाहे जब चाहे तुम्हारे इश्क को डाऊनलोड कर सकू....में स्याहियों के रंग नहीं ज़िन्दगी के सारे रंग बदल देना चाहती हूँ ...

मैं खिड़की के पास टंगे पिंजरे में बैठे पंछी को आजाद कर देना चाहती हूँ ताकि उसे मलाल न रहे की उसे उड़ने का मौका ही नहीं मिला ...मैं उसकी घुटन को एक बार पूरी तरह ख़त्म कर देना चाहती हु ....मैं अपनी कहानी वाले लड़के को भी बंधन से आजाद कर देना चाहती हूँ और उसकी ब्याहता को भी ...चाहती हूँ की लड़के के मन में मरते दम तक ये मलाल न रहे की उसने प्रेम विवाह नहीं किया ...वो प्रेम विवाह करता तो लड़की को प्यार करता ....

मैं एक बार उस खुदा को लिखना चाहती हूँ जिसने प्रेम दिया ढेर सा प्रेम पर प्रेम करने के लिए कोई नहीं दिया ....मैं तुम्हे लिखना चाहती हु हर बार अलग केरेक्टर में जिसे तुम खुद न पहचान सको ...उन्ही बातों  उन्ही यादों के साथ ...उसी ज़हर के साथ ....हर बार नए असर के साथ ....

प्यार सच में पागल बना देता होगा न ...? पता नहीं ....

Wednesday, January 7, 2015

लोग तो लाखों है पर , क्या थोड़े से भी इंसान है ( A song)

आज कई दिन बाद ब्लॉग पर एक पोस्ट … इसे  कविता की जगह एक ऑफबीट सांग कहना ज्यादा बेहतर होगा … कोशिश कैसी है बताइयेगा …… 





























कोई हमको ये बताए क्यों ये अंधी दौड़ है 
गलियां और चौबारे नहीं लंबी सड़क पर मोड़ है
क्यों  रात में दिन जैसा हो जाने की लम्बी  होड़ है

दिल घरों में रख दिए सड़को पर सिर है पॉव है

मौत से इक कशमकश है, जिंदगी बस दांव है.…। 
इस शहर की धड़कनों में जीने/जीवन की सूखी आस है
चारों तरफ फैला समुंदर बुझती नही क्यूं प्यास है

आस  के गहरे कुएं में  खौफ खाती जान है 

लोग तो लाखों है पर ,
क्या थोड़े से भी इंसान है

चलती हुई लाशों के अंदर कसमसाती आत्मा

ढ़ूंढ़ते है हम जिसे वो चैन मिलेगा कहाँ
वो जिसे सब चाँद कहते है,दाग से काला हुआ
डर ने खामोशी को...,खामोशी ने डर पाला हुआ
चाँदी के सिक्को के दम पर 
डोलता ईमान है
लोग तो लाखों है पर ,क्या थोड़े से भी इंसान है

ज़ुल्म की सीढ़ी बनाकर चल रहा व्यापार सा 

जिसने ज्यादा खून चूसा वो बन गया अवतार सा 

आग में तपकर के वो सोना बनेगा झूठ है

दर्द की भट्टी है ,इम्तेहान लेती भूख है

एक गोली,एक खंजर,एक आदमी की वासना

चारों तरफ दहशत है कब हो जाए इनसे सामना

झूठ की है व्यूहरचना

सच रणनीती से अंजान है
लोग तो लाखों हैं पर, थोड़े से ही इंसान है..... थोड़े से ही इंसान है..... 

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Wednesday, June 25, 2014

हत्यारे...एक जैसे हत्यारे ....

बात ये नहीं की तुमने उसे कहाँ कैसे मारा
बात ये भी नहीं की मार देने के बाद
तुम्हें कितना अहसास हुआ की तुमने मार दिया ...

मार दिया एक बच्ची को माँ के पेट में
मार दिया उसे किसी पेड़ से लटकाकर
मार दिया उसे काल कोठरी में बंद करके
या मार दिया उसके अरमानो को


फर्क नहीं पड़ता की क्यों  मारा
फर्क नहीं पड़ता की मंशा क्या थी
पर जिस दिन तुमने उसे ये जानकर मारा
 की वो लड़की थी
तुम चाहे कितने ही ढोंग रचा लो
तुम्हारी नियत खराब ही है

तुमने अगर उसके अरमानों को मारा
बिना अपनी किसी मजबूरी के
सिर्फ इसलिए की वो लड़की जात है
उसे हक नहीं बराबरी से जीने  का
हसने मुस्कुराने ,सपने पूरे करने का
तो तुम भी गुनाहगार हो
क्यूंकि तुमने उसे जीते जी मार दिया

तुम सब ....हाँ सब बराबर के गुनाहगार हो
चाहे तुम माँ बाप हो अजन्मी बच्ची के
तुमने लड़की को रेप करके लटकाया फांसी  पर
या उसे जला दिया दहेज की आग  में
या मार दिया उसे जीते जी
सबके हाथ खून में रंगे हैं
तुम सब हत्यारे हो एक जैसे हत्यारे .....

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Wednesday, April 23, 2014

बस कह ही नहीं पाता हूँ मुझको तुमसे कितना प्यार है

एक ऐसी कविता जिसे कोई पुरूष लिखता तो बेहतर लिखता ज्यादा शिद्दत से लिखता...पर मैंने लिखी...लोग कहते हैं नारी का मन पढ़ा नहीं जा सकता..पर सच ये है कि पुरूष का मन ज्यादा गहरा है...उसमें भी प्रेम हैं संवेदनाए है...पुरूषो की ओर से ये एक कविता हर नारी के लिए....

क्या कहूँ ओ प्रियतमा 
तुम क्या मेरे जीवन में हो
शब्द ही नहीं मिलते उसे
जो प्रेम के बंधन में हो.

तुम अहसास हो हर साँस का
जीने का तुम आधार हो
आस की डोरी हो तुम
मेरे लिए संसार हो.

कह नहीं पाता मैं तुमसे
प्रेम के वो शब्द भी
उलझा हुआ भवसागर में
रहता हूँ में स्तब्ध भी.

जानता हूँ मेरी अनदेखी से
तुमको
रात दिन होती घृणा
पर सच कहूँ सबके लिए ही
ये कर्म का रस्ता चुना.
.
हाँ पुरूषो ने जन्मों जनम तक
नारियों के मन छले
पर कुछ दियों की उद्धन्डता का
दंड़ सबको क्यू मिले.
.
तुमने आँखों के सामने
देखाबच्चों को बढ़ते हुए
रोटियों के फेर में मैंने
वो सारे पल खो दिए

तुम माँ हो बहन होपत्नी हो
 प्रेम की छावं हो
मेरे लिए तुम दुपहरी में
शांति का गाँव हो

तुम घर में रही तो 
तुमनेघर को प्रेम का बल दिया
बाहर गई तो हर हाल में
मुझको अपना संबल दिया

तुम्हारे आँसुओं की हर धार
मेरे हृदय पर वार है
बस कह ही नहीं पाता हूँ
मुझको तुमसे कितना प्यार है

मैं वक़्त ना दे पाऊं
इस बात का ग़म है हमें
पर प्रेम है इस बात का
वचन देता हूँ तुम्हें

तुमने मेरे जीवन को सींचा
प्यार की फुहार से
मैं ज़रा पगला हूँ
कह पाता नहीं हूँ प्यार से

जब कभी लड़ता हूँ
सारी रात न सोता हूँ मैं
तुम मुँह ढांककर रोती हो
और मन ही मन रोता हूँ मैं
 
तुम्हारी तरह मेरा दर्द
चेहरे पर दिखता नहीं
पर ना समझना ये कि
मेरा दिल कभी दुखता नहीं

मनाना आता नहीं पर
दिल से मानता हूँ मैं तुम्हें
गर कभी तकलीफ में हो
साथ पाओगी मुझे....

कनुप्रिया गुप्ता....आपका एक कमेन्ट मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा और भूल सुधार का अवसर भी

Tuesday, April 1, 2014

अधूरी चिट्ठियाँ :परवाज़

फ़ोन की लम्बी लम्बी  बातें कभी वो सुकून नहीं दे  सकती जो चिट्ठी के चंद शब्द देते हैं .तुम्हे कभी लिखने का शौक नहीं था और पढने का भी नहीं तो मेरी न जाने कितनी चिट्ठियां मन की मन में रह गई न उन्हें कागज़ मिले न स्याही .तुम्हारे छोटे छोटे मेसेज भी मैं कितनी बार पढ़ती थी तुमने सोचा भी न होगा ,ये लिखते  टाइम तुमने ये सोचा होगा ,ये गाना अपने मन में गुनगुनाया होगा शायद  परिचित सी मुस्कराहट तुम्हारे होठों पर होगी जब वो सब यादें आती है तो बड़ा सुकून सा मिलता है ..और एक ही कसक रह जाती है काश तुमने कुछ चिट्ठियां भी लिखी होती मुझे तो ये सूरज जो कभी कभी अकेले डूब जाता है,ये चाँद जो रात में हमें मुस्कुराते न देखकर उदास हो जाता है तुम्हारे पास होने पर भी जब तुम्हारी यादें आ कर मेरे सरहाने बेठ जाती हैं इन सबको आसरा मिल जाता ..ये अकेलापन भी इतना अकेला न महसूस करता ....अब तो सोचती हु तुमने न लिखी तो में कुछ चिट्ठियां लिख लू  पर जिस तरह  तुम खो रहे हो दुनिया की भीड़ में तुम्हारे दिल का सही सही पता भी खोने लगा है  तुम तक पहुँच भी  गई गई तो जानती हु  तुम पढोगे नहीं .....पर फिर भी मेरी विरासत रहेगी किसी प्यार करने वाले के लिए ..

तुम्हे चिट्ठियां लिखने की तमन्ना होती है कई बार
पर तुम्हारे दिल की तरह तुम्हारे घर  का पता भी
पिछली  राहों पर छोड़ दिया कहीं भटकता सा
अब बस कुछ छोटी छोटी यादों की चिड़िया हैं
जो अकेले  में कंधे पर आ बैठती  है
उनके साथ तुम्हारा नाम आ जाता है होठों पर
और कुछ देर उन चिड़ियों के साथ खेलकर
तुम्हारा नाम भी फुर्र हो जाता है
अगली बार फिर मिलने का वादा करके......
पर सब जानते है कुछ चिट्ठियां कभी लिखी नहीं जाती
कुछ नाम कभी ढाले नहीं जाते शब्दों में 
कुछ लोग बस याद बनने के लिए ही आते है जिंदगी में
और कुछ वादें अधूरे ही रहे तो अच्छा है.....



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परिक्रमा शब्दों की :परवाज़

कई दिनों से कुछ लिखा ही नहीं जिसे यहाँ औसत किया ये कुछ  टुकड़े है कविताओं के  बस जो फेसबुक पर बिखरे थे समेत लाई हूँ …
1. नज़दिकियां बढ़ी तो पता चला आसमां भी तंगदिल होता है...
   कितने छोटे थे वो लोग जो सर पर साये की तरह थे 


2. मैं तेरे नाम को हज़ार जगह लिखती हूँ,
पर जो खो गया है लौटकर वापस नहीं आता....
तेरे नाम को हर जगह से मिटाती हूँ, 

पर जो बस गया है वो जाते नहीं जाता

3. ठहरे तो भी दिक्कत जाए तो भी ग़म हो,
तुम दिल के लिए जैसे सावन की तरह हो गए
आबो हवा की तरह अंदाज़ बदलने लगे,
तुम हर बार एक नए मौसम की तरह हो गए

की रश्क भी कैसे करें तेरे आशिकमिजाज़ से
हर चेहरे का अक्स लिए बैठे हो दर्पण की तरह हो गए....
रोक ले कैसे तुम्हें पल्लू से बांधकर ?
हर शीश की शोभा हो तुम चंदन की तरह हो गए...


4. बरसों से तेरे नाम का कलमा नहीं पढ़ा
तू खुद को खुदा मानकर कब तक इतराएगा
जा नाम को तेरे अपने नाम से जुदा किया
तू अपनी खुदाई को अब कैसे बचाएगा
 
  


5.  नींद न आए तो शिकवा करें किससे
कहीं दूर समंदर में सारे ख्वाब गर्क हैं
ये धूप के शहर हैं यहां कैसे मिले कोई
और अब नमी के शहर की नीयत में फर्क है...


6. तू मुल्कों मुल्कों में ढ़ूंढ़ उसे आवारा होकर बादल सा
वो इश्क तुझी में तन्हा था ,बन बैठा था पागल सा
तेरे रस्ते तेरी मंज़िल,सूना रस्ता सूनी मंज़िल
तेरा सब बस इक तेरा था वो रह गया यायावर सा.....

 
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Monday, January 20, 2014

इतिहास में स्त्री की झूठी भूमिका

 हमें नहीं चाहिए इतिहास की उन किताबों में नाम
जिनमें त्याग की देवी बनाकर स्त्री-गुण गाए जाए
त्याग हमारा स्त्रिय गुण है जो उभरकर आ ही जाता है
पर इसे बंधन बनाकर हम पर थोपने का प्रपंच बंद करो......

नहीं चाहिए तुम्हारी झूठी अहमतुष्टि के लिए अपनी आत्मा से प्रतिपल धिक्कार....
तुम अपने आहत अहम के साथ जी सकते हो पर हम बिखरी आत्मा के साथ नही....
तुम अगर नर हो तो हमारे जीवन में नारायण का किरदार निभाना बंद करो....

ये सारे घटनाक्रम जो कल इतिहास में लिखे जाने हैं
लिखे जाएंगे तुन्हारे अनुयायियों द्वारा, तुम्हारे गुणगान के लिए
हमेशा की तरह किसी द्रोपदी को महाभारत का कारण सिद्ध करते हुए...
या किसी सीता पर किए गए अविश्वास को धर्म का चोगा पहनाते हुए...

तुमहारे इतिहास के पदानुक्रम में हमें ऊपर या नीचे
कहीं कोई स्थान नहीं चाहिए
हम अपने हिस्से के पन्ने स्वयं लिख लेंगे .....
हो सकता है उन्हें धर्मग्रंथ का मान न मिले
पर तुम्हारे इतिहास में मानखंड़न से बेहतर है
अपनी क्षणिकाओं में सम्मान के साथ लिखा जाना.....
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Friday, October 18, 2013

हत्यारे हो जाने से विधर्मी कहलाने में भले ......


तुम लाशों के ढेरों पर तिलक लगाकर खुश होगे
या खून की नदियों को अज़ान सुनाकर खुश होगे
तुम धर्म के रंगों से मरघट में होली खेलोगे
या बच्चो के सर से माँ का आँचल चुराकर बहलोगे


तुम संगीत की ध्वनि में करूणा का रस भर दोगे
या बचपन के कन्धों पर बारूद की बोरी धर दोगे
तुम सावन की बूंदों  में जहर की धारा  घोलोगे
जब बोलोगे तब बस नफरत की बोली बोलोगे

तुम धर्म की ठेकेदारी में जीवन को कमतर समझोगे
प्रेम और अपनेपन  के बंधन को कमतर समझोगे
तुम आत्मप्रशंसा में सारी दुनिया में परचम फैला दोगे
जो खून बहा है रास्तों में उसका  जवाब कहाँ दोगे ?

हम धर्म की नहीं ,ठेकेदारों के अंधत्व की निंदा करते हैं
आस्था के ,अपनत्व के हत्यारों की निंदा करते हैं
गर यही धर्म है यही नीति तो हम हाथ छुड़ाकर लो चले
हत्यारे हो जाने  से विधर्मी कहलाने में भले ......

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Wednesday, August 14, 2013

आजकल नेताजी क्या कम नवाब है

अपना पसीना उनकी नज़रों में ख़राब है
आजकल नेताजी क्या कम नवाब है

उनके इत्र भी हमारी भूख पर भारी पड़े
खुशबुओं के दौर में रोटी का ख्वाब है

रेशमी शालू ,गुलाबी शाम के वो कद्रदान
आमजन की बेबसी का क्या जवाब है

मशहूर हो जाने को वो रोंदे हमारी लाश को
लाश हो जाना ही बस अपना सबाब है

रोशनाई ,जश्न उनकी जिंदगी का फलसफा
गरीबों की जिंदगी काँटों की किताब है 


 

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Tuesday, August 13, 2013

खोखला इतिहास लेकर क्या करूँ


भूख है और उम्र है ,दोनों ही खत्म होती नहीं
प्रसादों जेसे बड़े आवास लेकर क्या करू

उम्र भर की सेवा का मोल दिया न प्रेम से
सम्पूर्ण समर्पण के बदले ,परिहास लेकर क्या करू

बूँद बूँद के लिए तरसे हुए अंतस यहाँ
कागजों के कुएं और तालाब लेकर क्या करूँ

मैं चुनुँगा और को, राज करेगा दूजा कोई
अपने वोट पर ज्यादा विश्वास लेकर क्या करूँ


आएगा कल को कोई, मारेगा  भरे बाज़ार में
आतंकियों के शहर में साँस की आस लेकर क्या करूँ

जो आदमी आदमी  के खून में अंतर करे
मैं तुम्हारा खोखला इतिहास लेकर क्या करूँ

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Friday, July 5, 2013

क्यों खंड खंड है उत्तराखंड



parwaz blog:kyo khand khand hai uttarakhand




लाशों के ढेरों के बीच 
मानवता कराह रही 
बिगड़े हालातों के  बीच 
भूख हिलोरे मार रही 
बिना दस्तक के आ गया 
सारी वादी में प्रचुर विध्वंस 
किससे करें सवाल 
क्यों खंड खंड है उत्तराखंड 


क्यों बांधों ने सीना चीरा 
क्यों नदियों का रस्ता मोड़ा 
क्यों पत्थर में छेद कर दिया 
मिटटी में बारूद भर दिया 
क्यों रक्षक भक्षक बन बैठे 
क्यों अनजाने शासक बन बैठे 
सब तरफ है हाहाकार 
ये मानवता पर कैसा दंश 
किससे करें सवाल 
क्यों खंड खंड है उत्तराखंड 

क्यों माओं का आँचल सूना है 
पीड़ित घर का हर कोना है 
क्यों ये विषम आपदा आई 
क्यों शासक लेते जम्हाई 
क्यों हमने कोई पाठ न पढ़ा 
क्यों लोहे गिट्टी रेत  को चुना 
देव दर्शन को गए लोग 
और उजड़ गए वंश के वंश 
किससे करें सवाल 
क्यों खंड खंड है उत्तराखंड 

(Note:ये रक्षक शब्द सेनिको के लिए  नहीं है )
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