Wednesday, April 4, 2018

मुझे तन्हाइयां बख्शो

मुझे तन्हाइयां बख्शो
कहीं इस शोर से आगे
अंधेरे घोर के आगे
जो पल पल कसी जाए
गले की डोर के आगे
मुझे तन्हाइयां बख्शो
मुझे तन्हाइयां बख्शो
मैं उतना ही अकेला हूँ
जितना सीप में मोती
मेरी चाहत में सब पागल
मुझे कुछ भी नहीं हासिल
मेरी आँख डरती है
रोशनी के बवंडर से
चमकता हूँ ज़माने में
डरा बैठा हूँ अंदर से
कर लो दूर ये चाहत
मुझे रुसवाईयाँ बख्शो
मुझे तन्हाइयां बख्शो
तेज़ कदमों की आहट से
ये मेरा दिल धड़कता है
है इतना दर्द क्यों फैला
सोचता है तड़पता है
जो तुमने आग फैलाई
नए नए बहाने से
लपट इतनी लगी गहरी
साँस डरती है आने से
तुम अपना मुखोटा रख लो
मुझे सच्चाइयां बख्शो
इन ज़हरीली बातों से
मुझे तन्हाइयां बख्शो
क्षितिज की आस में चलते
मेरे पाँवों में छाले हैं
मेरे मन में बवंडर है
कई बरसों से पाले हैं
ये सारी मरीचिका है
मैं जानता हूँ सब
आंख पर झूठ का पर्दा
उसी को मानता हूँ सब
मशीनों सा चला जाऊं
मुझे अंगड़ाइयां बख्शो
भीड़ में खो रहा हूँ मैं
मुझे तन्हाइयां बख्शो

3 comments:

सदा said...

वाआआह बहुत खूब

दिगंबर नासवा said...

बहुत ही कमाल का लिखा है ...

Prakash singh bora said...
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