Saturday, March 16, 2013

इश्क यादें और उदासियाँ

म्यूट का बटन सिर्फ टीवी में ही नहीं ज़िन्दगी में भी बड़ा ज़रूरी होता है सारी चिल्लपों से दूर थोड़ी देर शांति के लिए , उदासियों से मोहब्बत करने के लिए  .... उदासियाँ कभी भी आ सकती हैं दबे पैर ,किसी ख़ुशी के मौके पर ,दर्द की घड़ी में कभी भी क्यूंकि इनके लिए कभी कोई समय बनाया ही नहीं गया सब अच्छी चीजों की फ़िक्र में साज संभाल में इनके लिए कोई जगह बनाई ही नहीं गई और जिसके लिए जगह न बनाई गई हो न मिलने का समय दिया गया हो वो अतिक्रमण करके आता है ...

उदासियों की कहानी  हमेशा से एसी नहीं थी उनका भी अपना गाँव था जहाँ उदासियाँ इतनी उदास नहीं थी एक पहाड़ी गाँव की वो  लड़की बौर के मौसम में अमराई के जेसी जो उसे देखता बस देखता ही रह जाता जो उसमे खोता बस खोता ही चला जाता फागुन में जब टेसू के फूल खिलने वाले होते तो हवा चुपके से आती और उसके गालों से लेकर थोडा लाल रंग टेसू की कलियों पर छिटक देती ....फसल के मौसम में पानी उसकी धानी चूनर से रंग उधार ले जाता ...लोग कहते एक बरस जब उसने  धानी चुनर ना ओढ़ी उस साल पूरे गाँव में फसलों में रंग ही न उतरा सारी की सारी फसल पीली पड़ गई ....

एसी जाने कितनी कहानियां थी उसके लिए ...वो थी तो गाँव में खुशियाँ  ही खुशियाँ  थी हर तरफ ....एसे में कहीं से एक परदेसी आया उस साल उस गाँव में पहली बार प्यार के सुनहरी फूल खिले लोगो ने पहली बार हवाओं में संगीत बहता सुना ,नदी को शराबी चाल चलते देखा और बादलों को घुमड़ घुमड़ कर बरसते भी ....
उसी के बाद लोगो ने पहली बार  देखा की लड़की के गालों का रंग अब टेसुओं पर नहीं खिल रहा और फसल का रंग उतना हरा दिखा बड़ी खोज खबर के बाद पता चला की परदेसी के प्रेम ने लड़की को खुशियों से भर दिया पर अब लड़की के सारे रंग परदेसी के हैं .  सारे रंगों पर प्रेम का सुनहरा रंग चढ़ गया है .....

फिर ? एक दिन परदेसी अचानक से कहीं चला गया या शायद जबरजस्ती भेज दिया गया इस आस में की फसलों पर फिर रंग आएगा टेसू फिर अंगार सा रंग लेकर खिलेंगे पर उसके बाद लड़की के आंसुओं से हुई बारिश ने सब तबाह कर दिया टेसू में रंग ना चढ़ा ..उसी के बाद लोगो ने नदी का उदास काला पानी देखा , बादलों की तबाही देखी , आसमान में घोर अँधेरा देखा ,हर तरफ निराशा देखी .....लोगो ने अकेली उदास लड़की को और अकेला कर दिया दूर कहीं जाकर एक बस्ती बनाई वहां एक नई ख़ुशी से भरी लड़की ढूंढ ली और पुरानी वाली लड़की के लिए ज़िन्दगी में कोई जगह ही न रखी न उससे मिलने का कोई समय ...
बस तब से वो बेचारी लड़की उदासी बन गई अब वो अचानक से आती है बिना समय बिना वजह ,अपने लिए थोडा सा अपनापन ढूँढने ...

उफ़ जब तुम याद आते हो इन उदासियों से मोहब्बत हो जाती है कहीं तुम मेरे सारे रंग तो नहीं ले गए या सच में प्रेम का रंग हर रंग पर भारी होता है ....कही कहीं न विज्ञानं काम करता है न गणित ....जैसे साइनाइड का कोई स्वाद नहीं होता फिर भी जहर तो जहर है और उदासियों का कोई रंग नहीं होता फिर भी प्यार तो प्यार है ही ....

Monday, March 11, 2013

लव थेरेपी बेस्ट थेरेपी

love therapy best therapy 
प्रेम लिखने पढने समझने के सबके अलग ढंग है ... पंजाब की हाथ की बनी  फुलकारी का काम देखा है कभी ? या मेहंदी के कोन से बनी मेहंदी की डिजाइन  तो देखी होगी ? सोचते हो इसमें नया क्या है अलग क्या है ? अलग है नया भी है ...अलग है हाथ का जादू , अलग अलग हाथ से बनी एक ही कलाकृति कभी एक सी नहीं दिखती और अलग अलग लोग उसे अलग ढंग से देखेंगे बस यही एक फर्क है इश्क के मामले में भी ...सब अलग ढंग से समझते है ,अपने ढंग से मायने निकालते है और बदलते हैं ....बदलते हैं इसलिए लिखा क्यूंकि जो लोग अपनी जवानी के दिनों में प्रेम के महासमर्थक बने फिरते रहे हैं वही एक उम्र के बाद प्रेम को घोर निंदा का सबजेक्ट मान बैठते हैं ....

सबका अलग ढंग ,अलग विचार। और हो क्यों ना  प्रेम भी तो अलग है और जिंदगी के हर पहलु पर प्रभाव भी डालता है, हर शरीर पर हर मन पर सब पर यूनीक प्रभाव ...

प्यार  का सम्बन्ध सिर्फ दिल से नहीं होता ये बात तो सच   हैं पर आपके मोटापे और भूख से भी क्या इसका सम्बन्ध हो सकता है ? हां ! ये भी सच है अचानक से विश्वास नहीं होता इस बात पर ...लेकिन ये सच है जो लोग प्रेम के लिए तरसे रहते है वो या तो बहुत तेजी से मोटे हो जाते है या इसके विपरीत  लाख चाहने के बावजूद सामान्य या अच्छे स्वास्थ्य के मालिक नहीं बन पाते और बहुत दुबले पतले से रह जाते हैं  । 

पहली परिस्थिति देखे तो जब इंसान प्रेम के लिए तरसता है तो उसे अन्दर से एक खालीपन का अहसास होता है उसे लगता है कोई उसे प्रेम नहीं करता कोई उसके बुरे समय में ,बुरे स्वास्थ्य में उसका सहारा नहीं बनेगा और इसी उधेड़बुन में ऐसे  लोग अपनी क्षमता से ज्यादा भोजन करने लगते हैं उन्हें पता भी नहीं चलता और वो अपने आतंरिक खालीपन की पूर्ती प्रेम की जगह भोजन से करने लगते हैं। आपने कभी कभी देखा होगा घर से दूर अकेले रहने वाले कुछ बच्चे अचानक से मोटे होने लगते हैं और हम सोचते हैं उन्हें उस शहर का हवा पानी रास आ गया , कभी कभी ये बात सही भी होती है की किसी स्थान विशेष की जलवायु 
मानव शरीर पर अनुकूल असर डालती है  पर हर बार एसा नहीं होता ,  ये अचानक आया मोटापा कभी कभी  प्रेम की ,अपनेपन की कमी के कारण होता है। 

यकीन मानिये अगर आप प्रेम से भरे हैं तो आपको बहुत ज्यादा भूख नहीं लगेगी क्यूंकि आप संतुष्ट है आपको डर नहीं है इस बात का की आपकी जरुरत के समय कोई आपके साथ नहीं होगा . अगर आपको किसी से अथाह प्रेम है या आपके पास कोई है या कई लोग हैं जो आपको बहुत प्रेम करते हैं तो आप आत्मसंतुष्टि से तरबतर होंगे और ऐसी  स्तिथि में आप भूख के, मोटापे के गुलाम नहीं बनते .....

अब दूसरी परिस्तिथि देखते हैं जब प्रेम की कमी इंसान की भूख को मार देती है और जो भोजन वो करता है वो लाख चाहने पर भी उसके शरीर को नहीं लगता। आपने देखा होगा की कभी कभी कोई बिमारी न होने ,घर में खान पान की अच्छी व्यवस्था होने के बावजूद भी कुछ लोग बहुत दुबले पतले होते हैं और लोगो के तानो का शिकार होते रहते हैं . सच मानिये कई बार इस तरह के स्वास्थ्य के पीछे प्रेम और अपनेपन की कमी एक बहुत बड़ा कारण होती है। जब किसी इंसान के आसपास ऐसे लोग मौजूद हो जो उसकी हर बात में मीन मेख निकाले ,उसके रंग रूप योग्यता हर बात पर टिप्पणी करे  उसे बार बार उसकी कमियों का अहसास दिलाए  या उसे बदल जाने के लिए मानसिक रूप से दबाव बनाए तो ऐसी  परिस्थति में इंसान प्रेम के लिए बेतरह तरस जाता है और उसे धीरे धीरे स्वयं से भी प्रेम नहीं रहता . वो खुद को संसार से और अपने आस पास के लोगो से काटने लगता है और प्रेम की ये कमी उसके अन्दर की भूख को मार देती है। 
वो तरह तरह के व्यंजन खाए ,प्रोटीन सप्लीमेंट  ले पर क्यूंकि उसका मन दुःख से भरा होता है भोजन उसके शरीर को नहीं लगता , वो चाव से भोजन नहीं कर पाता क्यूंकि मन तो प्रेम का भूखा है और कोई भोजन लगता ही नहीं .

अगर आपके पास प्रेम है तो वो आपके अन्दर की रिक्तता को पाट देता है जिसके कारण ना तो आप अत्यधिक मोटे होंगे और न ही दुःख और अवसाद को इतनी जगह मिलेगी की वो रिक्तता को इतना भर दे की आप भोजन में  रूचि ही न ले।

ये बातें सुनने में अजीब लगती है पर सच है की सिर्फ फैट, विटामिन  या प्रोटीन की सही मात्रा ही शरीर के लिए जरुरी नहीं प्रेम की सही आपूर्ति भी शरीर को ठीक ठाक बनाए रखने के लिए उतनी ही आवश्यक  है। विश्वास मानिये अगर आपका कोई अपना अचानक से मोटा हो रहा है या लाख चाहने के बाद भी उसके शरीर को भोजन नहीं लगता तो एक बार लव थेरेपी का प्रयोग करके अवश्य देखिए। उसे समझने की कोशिश करिए दवाइयों का डोज़ अपनी जगह है थोडा सा अपनेपन का अहसास दिलाइये , ये अहसास दिलाइये की वो आपको प्रिय है और आपके जीवन में उसका स्थान बहुत महत्वपूर्ण है ...यकीन माहिये असर होगा ...क्यूंकि प्रेम से बेहतर कोई उपाय नहीं ................

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Monday, February 18, 2013

ये शहर पराया लगता है


अपनी बिखरी यादों का हर ज़र्रा हमसाया लगता है
जब याद तुम्हारी आती है ये शहर पराया लगता है

वो लम्हे जो पीछे छूट गए
वो अपने जो हमसे रूठ गए
वो गाँव जो हमने देखे ना
वो शहर जो आकर बीत गए
सपनो की दुनिया में उनका मंच सजाया लगता है
जब याद तुम्हारी आती है ये शहर पराया लगता है


वो बरखा जो तुमसे सावन थी
सर्दी की धूप जो मनभावन थी
वो बसंत जो मन का मीत बना
वो फागुन जो संगीत बना
मन को ना भाए कुछ भी ,हर मौसम बोराया लगता है
जब याद तुम्हारी आती है ये शहर पराया लगता है

वो कलियाँ जो हमको प्यारी थी
जिन पंछियों से यारी थी
वो चाँद था जिससे प्रेम बढ़ा
वो लहरें जिनसे था सम्बन्ध घना
कतरे से लेकर ईश्वर तक अब सब कुछ ज़ाया (बेकार ) लगता है
जब याद तुम्हारी आती है ये शहर पराया लगता है

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Wednesday, February 6, 2013

बेटियों की शादी और मायका

मायका यानी माँ का घर
ससुराल यानी  पति का घर
बड़ा दोहरापन है जिंदगियों में
बचपन से लेकर शादी तक
हर लड़की को एक पराये -अपने घर
का दिया जाता है आश्वासन
घर जो एसा  होगा जहा वो
ना पराया धन होगी ना परायी अमानत
ना उसे वहा से कही जाना होगा
न अपने अस्तित्व का संघर्ष करना होगा
क्युकी वो  उसका अपना घर होगा

पर उस घर में जाने के बाद
उसे अहसास होता है
वो घर ,उसमे रहने वाले हर इंसान का है
यहाँ तक की घर के पालतुओं का भी
पर वो घर उसका नहीं है ......

पराई बेटी है बात छुपाकर रखो
कल की आई लड़की है सलाह न लो

सारे कर्तव्यों का ज्ञान करा दो इसे
हर बात पर हाँ कह्ना सिखा दो इसे
अधिकार मांगे तो बात को हवा मत देना
समानता मांगे एसी वजह मत देना

ज्यादा अपनापन ना दो सर चढ़ जाएगी
ज्यादा छूट मत दो बेटा लेकर उड़ जाएगी
इसे प्यार की नहीं धिक्कार की जरुरत है
हमे इसकी नहीं इसे परिवार की जरुरत है

तेरा न कोई आसरा ना सहारा हमारे सिवा
अपने मन की न करना क्यूंकि हम सर्वेसर्वा
रंगीन सपना न देख तोड़ दिया जाएगा
क्रोध  आ गया तो तुझे छोड़ दिया जाएगा

शायद इसीलिए स्त्रिया
 इन्तेजार करती है बेटी की शादी का
ताकी जब बेटी अपने जन्म-घर  आए
तो कहे- "मायके" जा रही हू
कोई तो हो जो माँ को अहसास दिलाए
हा ये घर उसका है उसका अपना घर
उसकी बेटी का मायका ...... 


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Thursday, January 10, 2013

शर्तों वाला प्यार भाग 2


कहानी के पिछले हिस्से में हमने जाना निशा के बारे में ..कैसे वो दिल्ली आई ....

भाग 2

दॊ इंसान कभी एक जैसे नहीं होते वैसे तो कहा जाता है सबका कोई न कोई हमशक्ल होता है ,पर हमशक्ल भी एक जैसे नहीं होते .और सारी दिखने वाली बाते शायद एक सी हो भी सकती है पर इंसानी फितरत और हर बात को लेकर उनका नजरिया अलग अलग होता है यही कुछ अनदेखी पर सबसे ज्यादा जरूरी चीज़ें हर इंसान को एक दुसरे से अलग बनाती है ।

प्यार के बारे में अलग अलग नजरिया ही अंशुल और निशा को एक दूसरे से अलग खड़ा करता था वैसे तो दोनों में कोई भी बात एक जैसी नहीं थी आदतों से लेकर व्यवहार तक पर, उन दोनों को प्यार हो गया अब ये क्यों हुआ कैसे हुआ ये वो दोनों भी ठीक से समझ नहीं पाए  कभी।  हाँ कहानी की शुरुवात कैसे हुई ये अंशुल जानता था और निशा कभी जान नहीं पाई . अपनी कई कोशिशो के बाद भी कभी नहीं .

अंशुल जबलपुर  का रहने वाला था और मुंबई में एक सॉफ्टवेयर कम्पनी में काम करता था किस प्रोसेस में था क्या काम करता था ये कहना थोडा मुश्किल सा है पर हाँजिस भी प्रोसेस में था उसकी नाईट शिफ्ट ज्यादा हुआ करती थी वो अपनी मर्जी से नाईट शिफ्ट ज्यादा लिया करता था कहता था उसे पैसे से बहुत प्यार है और नाईट
शिफ्ट के लिए मिलने वाले एक्स्ट्रा अलाऊँस उसे अपनी और खींचते थे . वो मानता था की पैसा हो तो इंसान कुछ भी कर सकता है सब कुछ खरीद सकता था ...अंशुल की ये सोच ऐसे ही नहीं बनी थी जिंदगी के  थपेड़ो ने खुद उसे सब सिखाया था जो कहानिया आम लोग सीरियल या टी वी पर या फिल्मो में देखते हैं वो उसकी जिंदगी की असली कहानी थी .

कम उम्र में ही उसने अपने पापा को खो दिया था और जिंदगी उसके सामने बाहें फेलाए नहीं परीक्षाओं के पुलिंदे लिए खड़ी थी जबलपुर से मुंबई तक का सफ़र उसके लिए आसान नहीं था चार साल रात दिन एक करके काम किया था उसने . वैसे देखा जाए तो खाते पीते परिवार का हिस्सा था वो . चाचा ताऊ ,  भाई बहनों से भरा पूरा परिवार था उसका पर पापा के गुजर जाने के बाद जैसे सब बिखर गया ...अपनी मनचाही पढाई से पीछे हटना पड़ा उसे , और माँ और छोटी बहन को छोड़कर वो मुंबई आ गया एक अच्छे भविष्य और ढेर सारे पैसे की तलाश में  और इस आस में की जो उसके साथ हुआ वो छोटे भाइयों के साथ न हो।
 मुंबई ने उसे पैसा तो दिया पर साथ में दिया गहरा अकेलापन और अकेलेप्न को दूर करने के लिए दी कुछ बुरी कही जाने वाली आदतें वो चेन स्मोकर बन गया ,शराब के बिना उसे नींद नहीं आती थी , और सिगरेट शराब सब मिलकर भी ये अकेलापन दूर नहीं कर पाते  थे। हँसता खेलता लोगो से मिलता पर  अन्दर से बिखरा सा अंशुल भुरभुरी सी जिंदगी जी रहा था .  कभी कभी उसे लगता अपने दोस्तों की तरह वो भी खो जाए मुंबई की रंगरलियों में ..पर बढ़ते कदम न जाने क्यों थम जाते .....
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 बात है बड़ी अजीब की दिल्ली  में लडकी  मुंबई में लड़का दोनों का दूर दूर तक कनेक्शन नहीं  तो ये मिले कैसे? अरे ! पर मैंने कब कहा की ये मिले फिर  हुआप्यार ....सोशल नेटवर्किंग का ज़माना है ...और सच मानिये क्राइम पेट्रोल पर जोसोशल नेटवर्किंग  वाला प्यार दिखाया जाता है वो मनगढ़त कहानिया नहीं होती बस हमारी कहानी में अंतर इतना है की इसमें क्राइम नहीं हुआ ....

वेसे सोशल  नेटवर्किंग वाला प्यार आते आते चिट्ठी पत्री वाला पनघट वाला प्रेम दूर से बेठा अपनी नई पीढ़ी को  आशीष देता होगा  जैसे पुराना  बरगद हवा से उड़कर  गए बीजो से  उगने वाले कोपलो को आशीष देता होगा ,दुआ करता होगा की जहरीले पोधो से बचकर  हर कोपल कोपल पनप जाए अपना नया अस्तित्व बनाए .... हर कोपल नहीं पनपती क्यूंकि कहते हैं बरगद  अपने आस पास कुछ  नहीं पनपने  देता पर हर बरगद चाहता जरुर होगा की उसके वंशज पनपे ...... ऐसे ही चिट्ठी पत्री वाला  प्यार  कहीं से सोशल  नेटवर्किंग वाले प्यार को पनपने का आशीर्वाद देता होगा .....

अंशुल ने निशा को मेसेज किया माफ़ी मांगी और निशा ने माफ़ कर दिया कहानी ज़रा फ़िल्मी है पर फिल्में हवा में नहीं बनती और लेखकों को  दुनिया का प्राणी मान लेना भी सही नहीं वो भी पर्सनल एक्सपेरिएंस या आस पास देखा सुना ही लिखते है बस थोडा सा कल्पना का तड़का लगाकर उनमे  से कुछ परदे पर उतर जाती हैं कुछ पन्नो पर और कुछ बस हवा में तेरती है ......पर सच तो ये है की मोहब्बतें हवाओं में नहीं तेरती न ही सपनो वाली रूमानी दुनिया का कोई अस्तित्व होता है। हीरो के वाइलिन बजाने  हाथ फेलाकर बुलाने  और
हीरोइन के दोड़े चले आने के सीन सबने देखे है पर असल दुनिया में प्यार ऐसा  होता नहीं या  शायद सबका प्यार ऐसा  नहीं होता पर अलग ढंग के प्यार वाली एक केटेगरी होती है और निशा-अंशुल का प्यार उसी में आता है ...जैसे आप मन में माने बेठे हो की तपस्या करने से कोई भगवान साक्षात् दर्शन नहीं देते और
साथ साथ तपस्या का थोडा नाटक  भी करते हो और ? और भक्क करके भगवान  आ खड़े हो सामने की ले बेटा मेरी परीक्षा ले रहा था ना ,नहीं मानता था न की मैं आता हूँ ले अब आ गया अब संभाल  मांग क्या मांगता है ...
बस ऐसे ही प्यार आया इनकी जिंदगियों में .. हमें तो हो ही नहीं सकता पर आखिर सामने आ खड़ा हुआ और  हुआ तो गजब का हुआ .....
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मेसेज धीरे धीरे बढते गए कभी कभी निशा जवाब भी देने लगी और ऐसे  ही गाहे बगाहे बातें भी होने लगी और ऐसे ही शुरुवाती परिचय  हुआ दोनों का एक दुसरे से।ऐसे ही एक कॉल के दौरान अंशुल  ने निशा से कहा " तुम बहुत सुन्दर हो" सुनकर निशा को हेरानी हुई आखिर अंशुल को कैसे पता उसने कब देखा उसे ? उसने ये बात अंशुल से भी पूछी " आपको कैसे पता ? सुनकर अंशुल सकपका गया फिर बोल एक सोशल नेटवर्किंग साईट पर उसने निशा को ढूंढा पर ये ढूंढा कैसे गया ये सच में बड़ा कन्फयूजिंग था क्यूंकि अंशुल ने उसे एक बार ये भी बताया की  कॉल के समय उसे किसी अर्पिता से बात नहीं करनी थी वो एक ब्लेंक कॉल था और एक बार ये भी की निशा का नंबर  पास निशा  के रिज्युमे से आया और रिज्युमे उसे कैसे मिला ये बात वो गोल कर गया
इसलिए कहानी के शुरू में ही कहा गया है की निशा को कभी कभी पता नहीं चला की आखिर अंशुल उस तक पहुंचा कैसे ...( ज्यादा डिटेल में जाने का फायदा नहीं क्यूंकि इस कहानी को उपन्यास में बदल देने का अभी खास विचार नहीं है )

और इस तरह की बातों के बीच निशा ने नाराजगी में अंशुल को झूठा  और चालबाज भी समझा ,नाराज़गी हुई ,रूठना मनाना सब हुआ पर फिर सब ठीक भी हुआ ( ज्यादा डिटेल के लिए उपन्यास का इंतज़ार करें) और थोड़ी दोस्ती (निशा की तरफ से ) हुई अब अंशुल इसे दोस्ती मानता नहीं था  तो ऐसे ही किसी दिन अंशुल ने निशा से प्यार का इजहार  किया (मिलकर नहीं फ़ोन पर ही ) कितना सच है न की इंसान अगर प्यार को बुलाना ही चाहे तो वो कहीं न कहीं से चला ही आता है पर निशा ने दरवाज़े बंद कर दिए उसे तो दोस्ती से प्यारा कोई रिश्ता था ही नहीं दुनिया में , ऊपर से गजब की कन्फ्यूज्ड  लड़की उसने मना  कर दिया कहीं घर   वालों  को दुःख न हो ,प्यार के चक्कर में दोस्ती भी न चली जाए जेसे जाने कितने सवाल उसके मन में थे और  बड़ी
बात उसे प्यार था ही नहीं और अंशुल की बातों  से उसे हमेशा यही लगा की अंशुल के लिए पैसा ही सब कुछ है पैसा है तो सब है और पैसे से सब ख़रीदा जा सकता है प्यार भी ........
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अकेलापन इंसान को सच में अन्दर से तोड़ देता है और यही बात निशा को अन्दर से तोड़ रही थी अपने न करने के कारन   उसे इस बात का दुःख भी था की उसने अंशुल का दिल दुखाया है और अंशुल उसका दोस्त था उसे  वो उसे दुखी नहीं करना चाहती थी और जेसा की कहानी में पहले  कहा गया है की कभी कभी प्यार इसलिए हो जाता है क्यूंकि आपको उसकी जरुरत  होती है ठीक इसलिए  इनदोनों को प्यार हुआ नहीं इन्होने प्यार कर लिया आखिर अपनी सारी दुविधा के बाद निशा ने अंशुल के  प्यार को हा कह दिया ,पर इन दोनों के साथ एक थी प्रॉब्लम थी दोनों लव मेरिज में विश्वास नहीं करते थे   करना नहीं चाहते थे ....
फाइनली दोनों ने प्यार  का एक्सपेरिमेंट करने का मन बनाया  पर एक शर्त के साथ  ( हाँ हाँ जानती  हु की अब पढने वालो के दिल  में ज़रा चैन आया की अब पता चलेगा  आखिर शर्त थी  क्या  ) और  शर्त थी की इस प्यार में शादी  की   बात नहीं होगी प्यार सच्चा होगा कोई छल कपट नहीं होगा पर शादी के लिए दोनों में से कोई एक दुसरे को मजबूर   नहीं करेगा दोनों अपने परिवार  वालो की इच्छा  को प्यार से ज्यादा अहमियत देंगे  ...ये शर्त  वाली बात हुई उस दिन दोनों के मन में क्या था ये पता नहीं पर ये खरा सच है की ये प्यार सच में सच्चा और  पवित्र साबित   हुआ ...........

ये  बिलकुल मत  सोचना  की छि ! ये कोई कहानी है दो छिछोरे से लोगो ने डर के कारण प्यार भी नहीं निभाया क्यूंकि प्यार सिर्फ  पाना नहीं होता और ये कहानी भी यहाँ ख़त्म  नहीं हुई  यहाँ से शुरू हुई और  आगे भी बढ़ी ......तो आगे क्या हुआ प्यार शादी में बदल गया या मिसाल में या कहीं चुपचाप  छिप  गया दुनिया की  नजरो से ....

(ये कहानी तो ख़त्म  होने का नाम ही नहीं ले  रही सच ये भी है की कहीं जब निशा और अंशुल है तो कहानी ख़त्म कैसे हो सकती है ...  लगता है उपन्यास ही बन जाएगा .........)

आगे अगले  भाग में
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Wednesday, December 12, 2012

शर्तों वाला प्यार (Love with conditions)

दिसंबर की वो ठंडक सारे  शहर को जमाए दे रही थी पर वो आधी रात तक अपने होस्टल की छत पर खड़ी कंपकपाते होंठो ठिठुरते हाथो में फोन लिए उससे बात करती , एक स्वेटर  पहने या शाल ओढे वो कहती सुनती रहती और सोचती प्रेम की ऊष्मा सच में गजब की होती हैतरफ  एक तरफ जहा पेड़ पोधे भी ठण्ड के मारे ऐसे सिकुड़ जाते जेसे सर्दियों का ये मौसम सबमे कुमुदिनी के गुण  बाँट रहा हो ,वहीँ दूसरी तरफ वो कुमुदिनी की तरह खिल उठती .....

कभी कभी प्यार सिर्फ इसलिए नहीं होता की दिल को कोई अच्छा लगे या  देखकर, सुनकर कोई आपको भा जाए ,कभी कभी प्यार इसलिए भी होता है क्यूंकि आपको उसकी जरुरत होती है ,आसपास का सन्नाटा आपको निगल ने ले ये दर आपको खाए जाता है . कभी कभी प्यार इसलिए भी नहीं होता की आप पर प्यार का जादू चढ़ा होता है ,वो इसलिए होता है अगर वो न हो तो ज़िन्दगी गजब की बेमानी सी लगने लगे ...

उन दोनों का प्यार भी कुछ ऐसे  ही जन्मा था ...जैसे धरती हर बार अम्बर से प्यार करने पर सोचती होगी की अम्बर से मिलन संभव नहीं ,क्षितिज  मिथ्या है , पर प्रेम तो प्रेम है हर बार सब जानते समझते वो अम्बर से दिल लगा बैठती  होगी ये सोचकर की ये आसरा तो है की कोई है उसे प्रेम करता है कोई है जिसे वो प्रेम करती है कोई है   आते ही उसके  होंठ मुस्कुरा देते है। कोई जिससे वो मन की सारी बातें कह देती है उसकी सारी  बातें सुन लेती है जिसे दिल की गहराई से प्यार किया जाए फिर चाहे  वो मिले न मिले . हालाँकि बदलते ज़माने में इस तरह का प्रेम कम ही होता है पर लड़की को  भी हुआ और लड़के को भी  ऐसे  ही प्रेम ने गिरफ्त में लिया ....(शायद ) 
प्यार ने उनकी ज़िन्दगी में बड़े आराम  से दस्तक दी , दोनों  अपने अपने घर से दूर नए शहरों में ज़िन्दगी के साथ आँख मिचोली खेलने आए थे ,कभी जिंदगी उन्हें हराती कभी वो जिंदगी को मात देते कुछ सीख भी  लेते और कुछ  भी देते ज़िन्दगी को , इस सारी उथल पुथल में दोनों के पास बस एक चीज की कमी थी किसी ऐसे इंसान की जिसे वो  हार जीत की नए तजुर्बे की बातें सुना सके जिसके साथ हस सके रो सके .....
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निशा अपने शहर लखनऊ से दूर पहली बार जॉब के लिए दिल्ली आई थी  वैसे ये शहर उसके लिए नया नहीं था वो पहले भी प्रोफेशनल ट्रेनिंग के लिए 3 महीने  इस शहर से रूबरू हुई थी पर तब उसके साथ उसकी खास दोस्त वैशाली थी ...दोनों बचपन की सहेलियां थी साथ साथ पढाई की थी साथ ही ट्रेनिंग करने दिल्ली आई और तब दोनों को एक दुसरे का खूब सहारा था । वैसे देखा  जाए तो दोनों का  स्वभाव काफी अलग  था , वैशाली जहाँ खुले विचारों वाली थी वो खुले माहोल में पली बढ़ी भी थी ,फेशनेबल कपडे ,चमक दमक ,घूमना फिरना , डिस्को ,पार्टियों पर खर्चा करना उसकी ज़िन्दगी का हिस्सा था वही निशा तेज तर्रार तो थी पर स्वभाव से  थी पैसे खर्च करने और उड़ाने के बीच का अंतर बनाए रखती थी , थी पर उन्ही लोगो से ज्यादा बातें करती जो उसके मन को अच्छे लगते , कुल मिलाकर वो आधुनिक थी पर अपनी बनाई कुछ सीमाओं में बंधी  रहना पसंद करती थी ....पर दोनों  में एक बात कामन थी दोनों एक दुसरे का ख्याल रखती थी गहरा अपनापन था दोनों के बीच ...सालों से चली आ रही दोस्ती को वो ज़िन्दगी भर की दोस्ती मानती थी .....
पर इस बार जब निशा दिल्ली आई तो उधेड़बुन में थी सारे दोस्त ज़िन्दगी के साथ चहलकदमी करने अलग अलग शहरों में चले गए और उसे इस शहर ने वापस बुला लिया ...किस्मत का खेल था की उसका कोई भी दोस्त दिल्ली नहीं आया जॉब के लिए और वो  अचानक से अकेली सी हो गई  वैसे होस्टल वही था जहा वो पहले भी रह चुकी थी पर दोस्तों परिवार सबका एक साथ छूट जाना उसके लिए एक सदमे  की तरह था । हर  दोस्तों से बात होती, घर बात होती पर सब कुछ जेसे  हाल चाल पूछने  पर सिमट गया  था अचानक आया खालीपन उसे तकलीफ  दे रहा था ...

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ऐसे ही दिन तो निकल रहे थे पर अच्छे निकल रहे थे ये  अजीब है शायद . एक दिन वो बालकनी में खड़ी थी तभी उसके मोबाईल पर एक कॉल आया सामने वाला किसी अर्पिता को पूछ रहा था उसने रांग नंबर कहकर बात ख़त्म कर दी . थोड़ी देर बाद   फिर कॉल आया और एक लड़के ने  आवाज़ में कहा " मैं अंशुल बोल  रहा हु अर्पिता मेरी दोस्त है शायद उसने नुम्बर बदल लिया है और सर्विस प्रोवाईडर ने नुम्बर आपको  अलोट कर दिया है आप मेरी कुछ हेल्प कर सके तो ....
निशा ने बीच में ही बात काटते हुए कहा  " देखिए ये सब तो में नहीं जानती पर ये नंबर अब मेरा है  हां कभी अर्पिता का  आया तो में नंबर लेकर रख लुंगी ताकि और लोगो को परेशानी न हो " और ये कहकर उसने कॉल कट कर दिया । 

थोड़ी देर में उसने फ़ोन देखा तो  उसी नंबर से मैसेज आया था - "सॉरी में आपको परेशान  नहीं करना चाहता था " थोड़ी देर के लिए तो निशा को लगा कोई दोस्त होगा जो मजाक कर रहा है क्यूंकि उसके दोस्त कई बार ऐसे  मजाक करते रहते थे ,नए नए नंबर से फ़ोन करना या नए नंबर से मैसेज करना और पूछना कैसी है क्या कर रही है और एसे ही तंग करना ..उसके लगभग सभी दोस्त कई कई बार असे मजाक कर चुके थे .निशा ने मैसेज किया " इट्स ओके " और सोचा कोई दोस्त होगा तो ठीक है नहीं तो भी  सॉरी बोल रहा है जवाब देना तो बनता है .
वैसे भी अनजाने लोगो से बात करना उनके मेसेजेस का जवाब देना उसके लिए बड़ी बात नहीं थी ,"कम्युनिकेशन मेनेजर"थी वो मल्टीनेशनल कंपनी में और दिन भर ऐसे  मेसेज का जवाब देना उसके प्रोफेशनल एथिक्स का हिस्सा था और इस आदत ने अब निजी जिंदगी में भी जगह  बना ली थी ...उसने इंतज़ार किया पर किसी दोस्त का फोन नहीं आया तब उसे सच में लगा की किसी अंशुल ने उससे माफ़ी मांगी  है .
इस बात पर ज्यादा  न देते हुए वो काम में लग गई और जल्दी ही इस बात को भूल  भी गई और फिर से काम और अकेलेपन ने उसे घेर  लिया कभी कभी वो अकेले में सोचती काश ! उसे भी किसी से प्यार हो जाता  पर ये बात जैसे उसके दिमाग आती वैसे ही थोड़ी देर में चली भी जाती क्यूंकि जैसे प्रेम की इच्छा वो रखती थी वैसा प्रेम होना बड़ा कठिन  है . आधुनिक दुनिया में होने के बाद भी वो प्यार का   रूप पसंद करती थी अपने आस पास की लड़कियों की तरह वो  ऐसा लड़का नहीं चाहती थी  जो उसे घुमाए फिराए शोपिंग कराए या फिल्म दिखाए वो तो सच्चा प्यार चाहती थी ज़िन्दगी में . वैसे प्रेम को लेकर उसकी धारणाएं अलग सी थी उसे लगता की जरुरी नहीं प्रेम एक ही बार हो ,वो मानती की  तब तक बार बार होता है जब तक आपके हिस्से का प्यार आपको मिल न जाए ,पर दूसरी तरफ वो ये भी मानती थी की  सच्चा प्यार नहीं मिलता . उसे लगता था प्रेम का मतलब सिर्फ पाना नहीं कभी कभी खोना  भी प्रेम है वही दूसरी तरह वो मानती की प्यार को ऐसे ही नहीं  जाने देना चाहिए पूरी कोशिश करनी ही चाहिए ....ऐसी जाने  विरोधाभासी  परिभाषाएं उसने प्रेम के लिए गढ़ रखी थी ...
कभी वो मानती  उसे प्यार हो ही नहीं सकता और कभी इंतज़ार करती प्यार के आ जाने का ...ऐसा लगता मानो उसे प्रेमी से ज्यादा प्रेम का इंतज़ार था और उससे भी ज्यादा  का इंतज़ार कर रही थी ,महसूस करना चाहती थी प्यार के हर पहलु को ....अजीब सी थी वो गुलाब के फूलों से ज्यादा काँटों की चुभन  महसूस करना चाहती थी शायद ........

अगली किश्त जल्दी ही ..........(जिसमे अंशुल से मिलेंगे ,और जानेगे कैसे होगा ये शर्तों वाला प्यार  और क्या होगी वो शर्त )

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Wednesday, December 5, 2012

बदलते बच्चे बिखरता बचपन

मुझे चाँद खिलौना ला दो माँ ,मुझे तारों तक पहुंचा दो माँ
पापा प्यारी गुडिया ला दो, छोटा बेलन चकला ला दो
एक प्यारी सी चुनरी ला दो,मैं पहन उसे नाचूंगी माँ
मुझे चाँद खिलौना ला दो माँ ......


हमारा बचपन कुछ इसी तरह का था और शायद आज से २० से २५ साल पहले लगभग सभी बच्चो का बचपन कुछ एसा ही मासूमियत भरा था.बच्चे बिलकुल ओंस की बूंदों जेसे हुआ करते थे निश्चल , भोले और मासूम.पर अब बचपन वेसा नहीं बचा आजकल के बच्चे बाली उम्र में ही जाने कब जवान लोगो की तरह व्यवहार करने लगते है पता भी नहीं चलता .जिन विषयों पर हम और हमारी और हमसे पहले की पीढ़ी वाले लोग जवानी के दौर में भी बातें करने तक से शरमाते रहे वो सब आजकल के बच्चे मासूम उम्र में ही करने लगे है .उनका बचपन खो रहा है अहसास ख़तम हो रहे है और वो उम्र से पहले वयस्कों की तरह व्यवहार लगे है....
कई बार जब तक माता पिता को इस बात का अहसास होता है की उनका बच्चा अपनी उम्र से पहले बड़ा हो रहा है उसके पहले ही वो दहलीज लाँघ जाता है.३० वर्षीया विनीता के साथ कुछ एसा ही हुआ वो अपनी ४ साल की बेटी रितिका के साथ एक खिलोनो की दूकान पर गई वहा एक गुडिया को देखकर बेटी मचल गई की मम्मी मुझे यही गुडिया चाहिए विनीता ने जब उसे मना किया और कहा नहीं ये अच्छी गुडिया नहीं है तो बच्ची ने तपाक से जवाब दिया "मम्मा देखो ना कितनी हॉट है इसकी ड्रेस इसका मेकअप सब कितना सेक्सी है प्लीज़ ले दो ना ".अपनी चार साल की बेटी के मुह से एसे शब्द सुनकर उसे अजीब लगा .पर ये नई बात नहीं है आजकल बच्चे अपनी बोलचाल में एसे शब्दों का प्रयोग करते है.इतना ही नहीं सेक्स की आधी अधूरी जानकारी लेकर एक्सपेरिमेंट करने से भी नहीं कतराते.
देल्ही के एक स्कूल में २ बच्चों ने आपतिजनक स्थति में अपना एक ऍम ऍम एस बनाया और उसे अपने दोस्तों को भेज दिया.इंदौर की कुछ लड़कियां स्कूल में शराब पीती पकड़ी गई .एक किशोर छोटी बच्ची के साथ बलात्कार का दोषी पाया गया.मुंबई में एक १६ वर्षीय लड़की ने फुटपाथ पर चलते हुए ४ लोगो को अपनी कार से टक्कर मार दी. ये सारे उदाहरन है जहाँ बच्चो को जरुरत से ज्यादा छूट दी गई उन्होंने इसका गलत इस्तेमाल किया या सही जानकारी नहीं दी गई और वो रस्ते से भटक गए. आए दिन एसी कई घटनाएं देखने सुनने मिलती है जहा बच्चे अपनी मासूमियत का दायरा लांघते और उम्र से पहले बड़े होते दिखाई देते है.
आजकल की छोटी छोटी सी बच्चियां ४,५ साल की ही उम्र में हॉट दिखना चाहती है ,सेक्सी कपडे पहनना चाहती हैं शीला और मुन्नी की तरह उत्तेजक डांस करना चाहती हैं. .किशोर वय की लड़कियां एसे कपडे पहनती है जो उन्हें सेक्सी दिखने में मदद करें.इसमें हम थोडा सा हाथ बाजारवाद का भी मान सकते है. चाइल्ड सायकोलोजी की टीचर वंदना उपाध्याय कहती है "बच्चियां ये सब कर रही हैं क्यूंकि उन्हें अपने आस पास यही सब होता दिखाई दे रहा है .बाजार उन्हें सिखा रहा है की उनकी कला,पर्सनालिटी ,अच्छे गुणों का कोई मोल नहीं है वो अगर सुन्दर और सेक्सी दिखेंगी तो ये सब बातें कोई मायने नहीं रखती .और यही गलत सोच उन्हें बिगड़ने में बड़ी भूमिका अदा कर रही है .
कुछ दिनों पहले अखबारों में खबर पढ़ी होगी आपने जिसमे ३,४ दस वर्षीय स्कूली बच्चे अपनी क्लास में असामान्य अवस्था में पाए गए और जब उनसे इसके बारे में पूछताछ की गई तो तो उन्होंने कहा हम रेप गेम खेल रहे थे.क्या आप सोच भी सकते है की रेप गेम भी कुछ हो सकता है पर ये सच है की बच्चे ये सब कर रहे हैं.बच्चे कितनी तेजी से अपनी उम्र के पहले ही बड़े हो रहे है इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की व्यस्क फिल्म देखते हुए कई बच्चो को देखा जा सकता है जो अपनी उम्र के लिए नकली आई- डी प्रूफ दिखाकर फिल्म देखते है. मुंबई के १ सिनेमा हॉल पर टिकिट की बुकिंग करने वाले महेश बताते है " कई बार बच्चो ए सर्टिफिकेट वाली फिल्मों को देखने बच्चे आते है हमे उनकी उम्र पर शक भी होता है पर वो आई डी प्रूफ दिखाते है और हमे टिकिट देना पड़ता है".

आपको याद होगा कुछ समय पहले एक प्रसिद्द टी वी कार्यक्रम में जज तब हैरान रह गए थे जब उन्होंने एक छोटी सी बच्ची को कमर हिलाकर लगभग अश्लील भाव भंगिमा में डांस करते देखा था .उनके मुह खुले के खुले और आँखे फटी की फटी रह गई थी , एक मासूम बच्ची को इस तरह का डांस करते देखकर. भड़कीला मेकअप ,अश्लील भंगिमा के साथ लोगो को आकर्षित करना ये आजकल छोटे छोटे मासूम बच्चो को करते देखा जा सकता है.जब उस बच्ची से इस बारे में जज ने सवाल किया तो वो उतनी ही मासूमियत से बोली ये मुझे मम्मा ने सिखाया.आजकल छोटी बच्चियां मल्लिका शेरवत और राखी सावंत की तरह दिखना चाहती है.और ५ से ६ साल के छोटे छोटे बच्चे मुन्नी और शीला से शादी करना चाहते है.इन सारे दिखावों में हमारे बच्चो का बचपन कही खो गया है.जब उनकी खेलने की उम्र होती है उस समय वो सेक्सी दिखने की इच्छा रखने लगते है , और जब उन्हें अपने लिए क्यूट शब्द सुनकर खुश होना चाहिए वो हॉट और डेशिंग शब्द सुनना चाहते है.

कुछ समय पहले मुंबई के कर्जत में एक रेव पार्टी हुई थी आपको जानकार आश्चर्य होगा की वहा से पकडे गए लोगो में किशोरवय के बच्चे भी थे. जिनमे लड़के और लड़कियां सभी शामिल थे .ये सभी शराब पीते ,और दृग्स लेते हुए मिले .इस तरह की पार्टियों में कई बार वीडिओ और ऍम ऍम एस बनाये जाते है और बाजार में बेचे जाते है.बच्चे कच्ची उम्र में जब एक बार इस सब में उलझ जाते है तो बाहर आना बहुत मुश्किल होता है.पर कम उम्र में बच्चे इस सब के दुष्परिणाम नहीं समझ पाते और बचपन के साथ कई बार अपने जीवन को भी अँधेरे में धकेल देते है.

एक सर्वे के अनुसार इन्टरनेट से पोर्न साईट देखने वाले और पोर्न वीडिओ डाउनलोड करने वालों में बड़ी संख्या किशोरों और बच्चो की होती है. ये बच्चे और किशोर इन्टरनेट के माध्यम से अधकचरा ज्ञान लेते है और अपने दोस्तों के साथ एक्सपेरिमेंट करते है.बच्चे अपनी उम्र से ज्यादा जानकारी रखते है उत्तेजक म्युझिक वीडिओ देखते है और अपनी उम्र से ज्यादा वयस्कों की तरह व्यवहार करने लगते हैं. " हमारे बच्चो के दिमाग पहले ही इन्टरनेट पर और दोस्तों से मिलने वाली अधूरी जानकारी से भरा हुआ है साथ ही साथ एक और बड़ी समस्या है की भारत के घरों में अभी भी बच्चो से सेक्स और योन शिक्षा पर बात नहीं की जाती है जिसके कारन बच्चे अपने आस पास के बच्चा,टीवी,सिनेमा और इन्टरनेट से गलत जानकारी इकट्ठी कर लेते है और धीरे धीरे ये सोचने लगते है की सेक्स करना और उत्तेजक कपडे पहनना या आसामान्य सेक्स हरकतें करना नोर्मल है. "ये कहना है सेक्सोलोजीस्ट अरुणेश कुमार का.

इन्टरनेट पर आजकल एसे कई वीडिओ और फोटो उपलब्ध हैं जो बच्चो को अधकचरी जानकारी देते है.फसबूक ,यू -ट्यूब और ऑरकुट जेसी साइट्स पर भी आपको इस तरह के वीडिओ देखने मिल जाएगे .और इनमे से कई वीडिओ बिना किसी एज वेरीफीकेशन के देखे जा सकते है.इस सब मायाजाल में उलझकर बच्चे अपनी मासूमियत को खोते जा रहे हैं. लेखिका मोहिनी पुराणिक कहती हैं की "बच्चे इन साइट्स पर अपनी उम्र ज्यादा बताकर अपने अकाउंट खोल लेते है और फिर यहाँ अपलोड किए जाने वाले वीडिओ और फोटोग्राफ्स देखते है ये बहुत जरूरी हो गया है की परेंट्स बच्चो की गतिविधयों पर नजर रखे और उन्हें बिगड़ने से और उम्र से पहले बड़ा होने से रोके.."

महानगरीय संस्कृति ने भी इस सब को बढ़ावा दिया है बच्चे बाहर जाकर मस्ती ना करे इसलिए माता पिता उनके हाथ में रिमोट थमा देते हैं एक कंप्यूटर ला देते है और इन्टरनेट कनेक्शन करवा देते है ताकि वो घर पर रहकर ही खुश रह सके. कई माता पिता ऑफिस जाते है और अपना ज्यादा समय बच्चो को नहीं दे पाते और इसकी पूर्ती वो बच्चो को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं देकर करना चाहते हैं.एसे में बच्चे घर में अकेले रहकर टी वी ,इन्टरनेट का सही उपयोग करने की जगह गलत इस्तेमाल करने लगते है.कई बार उनकी संगती भी बिगड़ जाती है जिसके कारण वो गलत बातें सीख जाते हैं और कई बार तो जिद करके अपनी गलत मांगे भी पूरी करवाने लगते है.उन्हें एक अलग कमरा दे दिया जाता है जिसमे प्रैवेच्य के नाम पर अकेले में बैठकर वो अपनी मनमर्जी करते है.

ये सच है की बच्चो को जोर जबरजस्ती से नहीं रोका जाना चाहिए पर आप ये कहकर भी अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते की "उसे जो करना है वो करेगा ही हमारी बात तो मानता या मानती ही नहीं".माता पिता के लिए ये जरूरी है की वो बच्चो को सही संस्कार दें और उन्हें अच्छे बुरे की पहचान बचपन से ही करवाए. उनके साथ दोस्तों की तरह व्यवहार करें और उनकी बातें सुने उन्हें थोडा समय दे.
इस बात में कोई दोमत नहीं की वो आगे जाकर सेक्स करेंगे पर इसका मतलब ये नहीं की बचपन से ही उन्हें ये सब करने की छूट दे दी जाए और जब उनके हाथों में खिलोने होने चाहिए तब उनके हाथों में कंडोम और गर्भनिरोधक थमा दिए जाए.

आज के समय में बच्चे बड़े और रंगीन सपने देखते है ब्लैक एंड व्हाइट का जमाना नहीं बचा इसलिए उनपर जबरजस्ती करके या अति अनुशासन में रखकर कोई फायदा नहीं.पर उनकी गलत बातों के लिए सही ढंग से मना करना और उन्हें समझाना परेंट्स की ही जिम्मेदारी है.बच्चो को अपना दोस्त बनाइये उनके रंगीन सपनो को में सुन्दर रंग भरिये , उन्हें बचपन से ही रिश्तों की अहमियत समझाइए,उन्हें बताइए की हर चीज की एक उम्र है और सेक्स की भी एक उम्र है, उन्हें अपनापन दीजिए सिर्फ पैसे नहीं , ताकि उनकी मासूमियत बनी रहे और वो भी अपने बचपन में सच्चा बचपन महसूस कर सके.......

बच्चो के इस तरह के व्यवहार और उम्र से पहले बड़े होने के पीछे कई कारण हो सकते है आइये इनमे से कुछ कारणों पर एक नजर डालते है.

१ . बच्चो की जिज्ञासु प्रवत्ति :
बच्चे छोटी उम्र में हर बात के लिए जिज्ञासा रखते है ,क्यों और किस तरह ये दो सवाल उनके दिमाग में हमेशा घुमते रहते है.हर नई चीज को खुद करके देखना चाहते है. ये ऐसी उम्र होती है जब वो हर बात खुद करके देखना चाहते है और यही" मैं करके तो देखू" वाली प्रवत्ति उन्हें दृग्स,शराब और कम उम्र में सेक्स की तरफ धकेल देती है .आपके लिए ये चाहे उसकी बुराइयाँ हो सकती है पर उसके लिए ये एक साइंस के प्रयोग की तरह होता है . वो बस ये देखना चाहते है की परिणाम क्या होगा.

२. खुलकर बात न होना:
भारत में आज भी सेक्स जेसे विषय पर बच्चो से खुल कर बात नहीं की जाती.बच्चा अगर सवाल करता है तो उसे डांटकर चुप करा दिया जाता है .उसकी बालसुलभ जिज्ञासा को गन्दी बात कहकर दबा दिया जाता है .कई बार जब बच्चे अपने दोस्तों की दृग्स और शराब की आदत या असे ही किसी विसह्य पर बात करना चाहते है उन्हें गुस्सा दिखाया जाता है या सबके बीच में उनसे नाराजगी दिखाई जाती है .इस सबके कारण धीरे धीरे बच्चे हर बात छुपाने लगते है कभी डांट और मार के डर से और कभी सबके बीच में बेइज्जती किए जाने के डर से. और एक बार अगर गलत आदत के पंजे में आ गए तो फिर उसमे धसते ही चले जाते है.

३. पीयर प्रेशर :
आजकल बच्चे अपने आस पास के बच्चो और दोस्तों से जल्दी प्रभावित हो जाते है. कई बार उनके दोस्त उन्हें किसी काम को करने के लिए उकसाते हैं और न किए जाने पर चिढाते या परेशां करते है, ये भी एक बहुत बड़ा कारण है बच्चो के बिगड़ने का. जेसे कुछ बच्चे आपके बच्चे को क्लास बंक करने, सिगरते पीने या दृग्स लेने के लिए उकसाते हैं एसा न किया जाने पर उन्हें छोटा बच्चा कहकर चिढाते है और बच्चे उनकी बातों में आकर क्लास बंक करने लगते है या सिगरेटे या ड्रग्स लेने लगते है.उनके दोस्त कम उम्र में सेक्स करते है और एसा न करने पर उनका मजाल उड़ाते है इसलिए कई बच्चे कम उम्र में सेक्स करने लगते हैं. कई बार बच्चे दुसरे बच्चो की तरह दिखना चाहते है लड़कियां मेकअप करना चाहती है क्यूंकि उनकी फ्रेंड्स कर रही है ,लड़के डेशिंग दिखना चाहते है क्यूंकि उनके फ्रेंड्स वही सब कर रहे है . ये सब एक सीमा तक तो ठीक है पर जब बच्चे सीमा लाँघ जाए तो मुसीबत खड़ी हो जाती है. उनका पूरा ध्यान इन सब बातों में लग जाता है और वो पढाई लिखाई से दूर हो जाते हैं.

बच्चो में किए गए एक सर्वे में जब उनसे पुछा गया की वो शराब या ड्रग्स क्यों लेते है तो तीन कारण सामने आए
क्यूंकि उन्हें लगता है की अल्कोहल लेने से वो कूल दिखाई देंगे
वो देखना चाहते थे की इसे लेने से क्या होगा
उनके दोस्त लेते है इसलिए वो भी लेना चाहते हैं

४. माता पिता का अजीब व्यवहार:
८ वर्षीया परी की यही समस्या है उसकी माँ कभी कहती है "तुम बड़ी हो गई है तुम्हे अपने छोटे भाई का ध्यान रखना चाहिए , पर जब वो माँ या पापा से बात करती है उसे डांट पड़ती है की "तुम बच्ची हो चुप रहो".जब वो माँ से पूछती है की कभी उसे बड़ा और कभी छोटा क्यों कहा जाता है तब उसे कोई ठीक ठाक जवाब नहीं मिल पाता .ये कमोबेश हर बच्चे की समस्या रहती है वो पूरे बचपन यही सोचता है की वो बड़ा है या छोटा है ? पर उसे अपने सवालों के जवाब सही ढंग से नहीं मिल पाते. इसी सब से तंग आकर वो खुद को बड़ा साबित करना चाहता है , ,ये जताना चाहता है की वो बच्चा नहीं है समझदार है और खुद को साबित करने के चक्कर में वो गलत हरकतें करने लगता है या शराब और ड्रग्स लेने लगता है .

५. स्वतंत्रता की चाहत : I want my own room ,I want privacy ,Please don't interfere in my matter ". ये एसे जुमले हैं जो न्यू जनरेशन के बच्चो के मुह से कई बार सुनने को मिल जाएँगे.प्राईवेसी ने एक तरफ बच्चो को थोडा आत्मनिर्भर बनाया है वही दूसरी तरफ उन्हें बिगाड़ने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है .१४ वर्षीया राहुल दिन भर अपने कमरे में रहता है अन्दर खेलता है वही उसके दोस्त आते जाते है,जब एक दिन उसकी मम्मी रिया रूम में अचानक आ गई तो बोला "मम्मा प्लीज नॉक करके आया करो".रिया उसी दिन से घबरा गई की आखिर ये अकेले में असा क्या करता है ?जब छानबीन की तो तो उसके रूम से सिगरेट के टुकड़े ,और अश्लील अंग्रेजी मग्जींस मिली .स्वतंत्रता की चाह अच्छी बात है पर जब बच्चा बार बार इस तरह की बात करे ,आपसे कटा कटा रहने लगे तो समझ लीजिए कुछ गड़बड़ है. कई बार बच्चे जरुरत से ज्यादा छूट और प्राईवेसी का नाजायज फायदा उठाते है और जब तक आपको इसकी खबर लगती है वो गलत राहों पर चल पड़ते है.

६. बच्चो को समय न दे पाना : कुछ लोगो का मानना है की कामकाजी माता पिता बच्चो को समय नहीं दे पाते इसलिए बच्चे बिगड़ जाते है ,पर बात ये नहीं है बात ये है की माता पिता बच्चो को क्वालिटी टाइम नहीं दे पाते इसलिए बच्चे बिगड़ जाते है.कई बार माता पिता बच्चो के मन की बात नहीं समझ पाते बस उनकी जरूरते पूरी करके ,उनके हाथ में पैसे थमाकर ये समझ लेते है की वो बच्चे को पूरा प्यार दे रहे है उसकी हर जरूरत पूरी कर रहे हैं.और यही बात धीरे धीरे बच्चो को उनसे दूर कर देती है.बच्चे अपने दोस्तों में ही खो जाते है. एक मल्टीनेशनल में काम करने वाली सरला बताती हैं की "शुरू शुरू में जब मैं अपनी बेटी को घर पर छोड़कर जाती थी तो बड़ा दुःख होता था इसलिए छुट्टी के दिन अपना पूरा टाइम उसे देना चाहती हु पर अब धीरे धीरे लगने लगा की उसने जेसे मेरे बिना जीना सीख लिया अब में अगर उसके ज्यादा करीब जाने की कोशिश करती हु तो उसे पसंद नहीं आता वो अपनी दुनिया में मस्त है,वो मुझसे बातें छुपाने लगी है ,अब लगता है थोडा क्वालिटी टाइम दिया जाता तो ये नोबत नहीं आती ".बच्चो को अच्छा टाइम ,और पूरा ध्यान न दे पाना भी बच्चो को बिगाड़ सकता है.

७. शक्की माता पिता : 15 वर्षीया रोहित अपने मम्मी पापा के शक्की स्वाभाव से परेशान है जेसे ही मीडिया में बच्चो के बिगड़ने की कोई न्यूज़ आती है उसके कही आने जाने ,दोस्तों सब पर शक किया जाने लगता है वो कहता है " मम्मी पापा एसे बीहेव करते हैं जेसे मैं चोर हु मेरे कपडे चेक करते है हर बात पर शक करते हैं मैं परेशान हो गया हु ,वो मुझे समझना ही नहीं चाहते न ही ये समझना चाहते है की सब बच्चे एक जेसे नहीं होते अब तो असा लगता है जब तो किया ही जा रहा है तो बिगाड़ ही जाऊ".ये कई परिवारों का सच है किसी की बेटी भागी की अपनी बेटी पर पहरे बिठा देंगे,किसी का बेटा शराब पीता पकड़ा गया अपने बेटे को शक की निगाह से देखेंगे.बच्चो पर निगाह रखना अच्छी बात है पर बात बात पर शक करना ,उन्हें ताने देना उन्हें अकेलेपन का अहसास करता है और बिगड़ने में देर नहीं लगती.


परेंट्स क्या करें?
  1. बच्चो को रिश्तों की अहमियत समझाइए: बचपन से ही बच्चो   में अच्छे संस्कार डालिए.उन्हें रिश्तों का महत्व,शादी का महत्व हार बात समझाइए.और ये बात आप भी उनके सामने  फोलो करी अपने और अपने पार्टनर के रिश्ते को उनके सामने आदर्श दिष्ट बनाइये तभी उन्हें लगेगा की रिश्ते कितने महत्वपूर्ण है और वो कम उम्र में सेक्स जेसी हरकतों से दूर रहेंगे.
  2. अलग कमरा दीजिए अलग जिंदगी नहीं : अगर आपने अपने बच्चे को अलग कमरा दिया है तो शुरुआत से ही उसके कमरे में आते जाते रहिये वह बैठकर उससे बातें करिए ,पूरी कोशिश करिए की उस कमरे में उसकी जिंदगी सिमटकर न रह जाए.घर के सारे लोग कम से कम एक बार का खाना एकसाथ बैठकर खाइए इससे बच्चो में परिवार के लिए अपनापन पनपता है.घर के सारे लोग साथ बैठकर टीवी देखिए उसे अच्छे कार्यक्रम देखने के लिए प्रेरित करिए. धीरे धीरे वो आप लोगो  से अपनेपन की डोर से जुड़ जाएगा और ये डोर उसे आपसे अलग नहीं होने देगी.इन्टरनेट की सुविधा देने में कोई गलत बात नहीं पर ध्यान रखी की वो इन्टरनेट से कुछ गलत बातें तो नहीं सीख रहा.
  3. अच्छी बुक्स पढने की आदत डालिए: बच्चो में अच्छी बुक्स पढने की आदत डालिए क्यूंकि अच्छे बुक्स पढने पर उन्हें सही और गलत का अंतर समझ आएगा और वो गलत आदतों और चमक दमक से दूर रहेंगे.. अच्छा रोल मोडल चुनने में उनकी मदद करिए जरूरी नहीं की ये रोल मॉडल कोई बहुत सफल या पैसे वाला आदमी हो जरूरी ये है की वो अच्छा इंसान हो.उनका रोल मोडल अच्छा होगा तो वो बुरी आदतों से बचे रहेंगे... 
  4. पैसे से प्यार की पूर्ती:बच्चो की हर सही गलत मांग पूरी करना ठीक नहीं.आप उन्हें समय नहीं दे प् रहे इस हीन भावना मैं उन्हें पैसे देकर प्यार की पूर्ती मत करिए .जब भी बच्चा कोई मांग रखता है बिना सोचे समझे उसकी मांग पूरी मत करिए पहले समझिए की उसे उस चीज की कितनी जरूरत है अगर जरूत न हो तो उसे द्रढ़ता के साथ मन करिए और उसका सही कारन भी उसे बताइए . बचपने से ही उसे पैसे की अहमियत समझाइए ,उसे बताइए की पैसा मेहनत से आता है .जब आप उसे बचपन से ही उसकी गलत मांग को पूरा नहीं करेंगे तो वो खुद ही समझने लगेगा की क्या जरूरी है क्या नहीं.पर इसका मतलब ये नहीं की आप उसकी सही मांग भी पूरी न करे.
  5. बच्चो के दोस्त बनिए: बच्चा के दोस्त बनने की कोशिश करिए उन्हें हर बात शेयर करने की छूट दीजिए ,जब आपके बच्चे आपको दोस्त मानने लगेंगे तो वो अपनी हर बात हर परेशानी आपसे शेयर करेंगे . उनके सवालों के जवाब दीजिए .समय  आने पर उन्हें सेक्स  की जानकारी दीजिए.  बच्चो को समझाने के आपके अपने तरीके हो सकते है  पर उनकी जिज्ञासा को शांत करिए.हो सके तो काउंसलर की सलाह लीजिए की आप केसे अपने बच्चे से बात कर सकते है..बच्चे के दोस्तों और संगती पर नजर रखिये हमेशा ये मत कहिये की "बाहर जाकर खेलो" कोशिश करिए की उसके  दोस्त बीच बीच में आपके घर पर आए इससे आप भी उन्हें जान लेंगे और आपके बच्चे की संगती पर नजर रहेगी साथ ही साथ आप ये भी जान लेंगे की उनपर किसी तरह का गलत पीअर प्रेशर  तो नहीं.
              ६. बच्चो को  क्वालिटी टाइम दें : ये बिलकुल जरूरी नहीं है की आप पूरे समय अपने बच्चे के आस पास रहे पर अपना जितना भी समय आप उसे दे रहे है उसे क्वालिटी टाइम बनाने की कोशिश करिए ,उससे बातें करिए ,उसकी भावनाओं को उम्र के परिवर्तनों को समझने की कोशिश करिए.अगर वो कोई बात आपसे शेयर करना चाहता है तो उसकी बात सुनिए . अपने ब्बच्चे को इस बात का अहसास करवाइए की वो अकेला नहीं है आप हर समय उसके साथ है.



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Wednesday, October 31, 2012

द्वार से उकता गया है देहरी का मन

आसमान के इस कोने से लेकर उस छोर तक  वो हर रोज उसके आने की उम्मीद लगाती है ...हर सुबह उठकर उम्मीद  की डोर बांधती है दोनों छोर के बीच ....और सुखा देती है कुम्हलाए सपने ,बिसुरती यादें , अलसाए प्रेम गीत ,बस ये सोचकर की समय की सीलन कही इनकी चमक ना कम दे ...  नहीं मानती वो की धरती गोल है क्यूंकि धरती जो गोल ही होती तो वो लौटकर उसके पास जरुर आता ...जरूर ....

कुछ छोटी छोटी कविताएँ  या पंक्तिया  फेसबुक पेज से 

1 . 
एक  प्रारंभ से
एक प्रारब्ध तक...
गहन इंतज़ार से 
सुगम उपलब्ध तक ...
मोहि बन्धनों से 
निर्मोही मन तक ...
मेरी प्रार्थना से
तेरे वंदन तक...
प्रेम ही तो है 
जो हमें पिरोए हुए हैं....
2.
तुम्हारी खैर मांगना मेरा हक है जाना
खुदा से तुमको मांगना मेरा हक कैसे हो ?
मैं तुम्हे चाहता हू इस पर शक हो सकता है 
तुम्हारी चाहतों पर भला शक कैसे हो ? 

3.
मेरे साथ राहों पर चलना होगा मुहाल
अपने लिए कोई और रहगुज़र देखें 
बड़ा मुश्किल है साया हमारी पलकों का 
उनसे कह दो कही और अपना घर देखें 

4.
मंडी है व्यापार की ,भूख के सोदे का शहर है 
यहाँ सब बिकता  है बस दर्द नहीं बिकता 
 तुम रसूखदार मेरा वक़्त खरीद ही लोगे 
अहसास की कीमत लगाए ऐसा कोई नहीं दिखता 

5. 
बेकरारी करती है घायल उसे 
कर दिया है प्रेम ने पागल उसे 
भाता नहीं है अब किसी भी सत्य का दर्पण 
द्वार से उकता गया है देहरी का  मन 

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Tuesday, September 25, 2012

शेक्सपीयर का जुलियस सीज़र बनाम अन्ना और उनका पी आर

शेक्सपीयर का लिखा जुलियस सीज़र पढ़ रही थी कल रात ...पूरा नाटक नहीं कहानी रूपांतरण पढ़ा मैंने और पढने के बाद अलग अलग कई विचार मन में आए  सबसे पहले तो जिन लोगो ने इस नाटक को नहीं पढ़ा (मेरे जेसे कई लोग होंगे क्यूंकि मेने कल पहली बार ही पढ़ा ) वो जान ले की पूरी कहानी सीज़र की रोम विजय और उसके विरुद्ध षड़यंत्र रचने वाले विद्रोहियों के आस पास घूमता है ,उसके अपने खास लोग उसे खून से नहला देने  में कसर नहीं छोड़ते और उसका खास विश्वासपात्र ब्रूटस ही उसके खून से अपने हाथ रंगकर उसके मृत शरीर को सभा में ले जाता है और जनता के सामने ये सिद्ध करने की कोशिश करता है की  सीज़र अतिमहत्वाकांशी था इसलिए उसे मौत के घात उतारा गया ....

जब आप इस नाटक को पढ़ते हैं तो सीज़र की मौत का इक बहुत बड़ा कारण कैसियस  नाम का उसका वो बचपन का मित्र है जिसकी महत्वाकांशाएं काफी बढ़ जाती है और सीज़र के प्रति अपनी जलन के चलते वो उसके कई वफादारों को उसके खिलाफ भड़काता है  और विद्रोह की नीव रखता है और अंत में उसके ही वफादार मित्र ब्रूटस को लोगो के आगे खड़ा कर देता है ये समझा देने के लिए की सीज़र के साथ  जो हुआ वो सही है और उसी की गलतियों का नतीजा है ...अब चूँकि ब्रूटस की जनता के बीच अच्छी साख है और लोग उसे मानते हैं वो उसके शब्दों से प्रभावित हो जाते हैं  और सीज़र की मौत को सही मानने लगते हैं ...

ठीक उसी समय उसका इक सच्चा वफादार "ऐल्बिनस" 
सीज़र की लाश को हाथ में उठाए वहा आता है और लोगो को बताता था की सीज़र ने उनके लिए क्या क्या अच्छा किया है किस तरह उसने अपनी वसीयत में अपने निजी धन का बड़ा हिस्सा अपनी प्रजा के नाम कर दिया है और अपने निजी मनोरंजन  स्थल  जनता के आनंद  के लिए सार्वजनिक कर दिए हैं..किस तरह वो राजमुकुट धारण करने से मना करता है ...और ये सब बताकर वो मरे हुए सीज़र को विलेन से हीरो बना देता है ...
"ऐल्बिनस"  यहाँ कुछ अलग नहीं करता पर वो वही लोगो को सब बताता है जिसमे से कई बातें वो पहले से जानते है और जो नई बातें वो बताता है वो सीज़र के लिए लोगो के मन में सहानुभूति पैदा कर देती है और जनचेतना उमड़ पड़ती है ...
और अंत वही सारे विद्रोही जनता के हाथो  मारे जाते है और ब्रूटस अपनी करनी पर पछताता हुआ स्वयं आत्महत्या कर लेता है ....

पूरे नाटक के अपने अलग  अलग सार निकाले जा सकते है, भले आदमी या बुरे आदमी से जोड़ा जा सकता है ,विद्रोह के पीछे की सोच से जोड़ा जा सकता है पर में पब्लिक रिलेशन की विद्यार्थी रही हू और इस नाटक को पढ़कर मैंने इसे पी आर से जोड़कर देखा...इक मरा हुआ (विद्रोहियों द्वारा मार दिया गया ) व्यक्ति जो नाटक की पृष्ठभूमि से भला व्यक्ति दिखता  है (वो है या नहीं ये कहना अभी मेरे लिए मुश्किल है ) अपने मरने के बाद विद्रोहियों द्वारा अति महत्वकांशी सिद्ध कर दिया जाता है जनता उसका विरोध करती है उसे बुरा समझती है पर तभी उसका वफादार उसकी अच्छाइयाँ गिनकर उसे हीरो साबित कर देता है ...सारा खेल पी आर का है अंतर बस इतना है की ये पी आर  (इमेज बिल्डिंग ) सीज़र की मौत के बाद किया गया...अच्छी और सोची समझी रणनीति ने सीज़र को लोगो के मन में अमर बना दिया ...

अब इस पूरी घटना को वर्तमान परिद्रश्य में अन्ना के आन्दोलन के साथ जोड़कर देखा जाए तो हम पाएँगे की अन्ना भले और देशभक्त व्यक्ति  है उनका आन्दोलन भी सही दिशा में जा रहा था लोग टीम अन्ना के साथ थे , देशभक्ति की बयार चल रही थी  भ्रष्टाचार के खिलाफ लाम बंदी हो रही थी सब ठीक था अचानक आन्दोलन की हवा निकल गई , टीम में फूट जेसे आसार दिखने लगे अलग अलग रस्ते दिखने लगे लोगो का विश्वास डगमगाता दिखने लगा...
यहाँ में टीम अन्ना की कमियों खामियों की बात नहीं करुँगी पर इक बड़ी गलती जो रही वो थी सही ढंग से किए गए पी आर की कमी ....
ना ढंग से इमेज  बनाई  गई जो बना ली गई उसे ठीक से संभाला नहीं गया ...अलग अलग लोग अलग अलग बयान और अलग अलग निकले गए अर्थो ने कई अर्थों का अनर्थ कर दिया ...इक महान बनता जा रहा कार्य ,आम सा रह गया इक आन्दोलन अंधड़ जेसा आया और  चला गया वो भी लोगो को कई गुटों में बांटकर .....

जबकि होना ये था की आन्दोलन के दौरान और उसके बाद भी सही ढंग से इसका पी आर किया जाता ..अलग अलग लोगो को बयान देने से रोका जाता , प्रचार प्रसार के लिए सही रणनीति बनाई  जाती , विरोधियों के बयानों का सही सही योजना के तहत जवाब दिया जाता तो इक बेहतरीन आन्दोलन एसे बुलबुले की  तरह फूटता नहीं  बल्कि लम्बे समय तक चलता और अपना उद्देश्य भी पूरा करता ....
अन्ना का आन्दोलन जब दम तोड़ता दिख रहा था उस समय भी अगर सही ढंग से इमेज बिल्डिंग की जाती ,मीडिया का सही प्रयोग किया जाता ( ना की उसके विरोध में बयानबाजी की जाती ) अपनी ढपली अपने राग की तरह आन्दोलन को बार बार ना मोड़ा जाता तो सफलता के चांस कई गुना बढ़ जाते ...

खैर  ! आगे की कहानी तो वक़्त ही बताएगा पर जिस तरह सीज़र को  "ऐल्बिनस" ने महान साबित कर दिया ठीक वैसे ही अन्ना को भी एसे आदमी की जरुरत है जो आन्दोलन को फिर से सही रुख में मोड़ दे क्यूंकि ये सच है आन्दोलन करना अलग बात है और छवि निर्माण करना अलग और उस छवि को सकारात्मक बनाए रखना अलग ....आपका एक कमेन्ट मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा और भूल सुधार का अवसर भी

Monday, September 24, 2012

है बड़ा प्यारा हमारा प्रेम

गाहे बगाहे याद आ जाता है यूँ 
दर्द का ढाला बिचारा प्रेम...
है यहाँ सारे  सिपहसालार और 
विरह का मारा हमारा  प्रेम

वो कभी जो इश्क के उस्ताद थे 
लगता उन्हें अपना आवारा प्रेम 
छोड़ दे कैसे बीच मझधार में 
नाज़ से पाला संवारा प्रेम 

हो भले  सबकी आँखों की किरकिरी 
अपनी आँख का तारा ,हमारा प्रेम 
उथला नहीं बहता भरे बाज़ार में
गहराई में हमने उतारा प्रेम 

चाँद की ख्वाहिश ना खुशियों की तलब 
दरवेश बंजारा हमारा प्रेम 
हम मिले या ना मिले बना रहे 
ये यादों का हरकारा दीवाना प्रेम ....

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Friday, September 21, 2012

उन बेवफाओं के किए क्या दिल लगाना छोड़ दे ?

जो छोड़कर जाते हैं अपने इश्क को मझधार में 
उन बेवफाओं के किए क्या दिल लगाना छोड़  दे ?
जिन रास्तों ने ज़ख्म देकर पैरों को घायल किया 
जब वो ना फितरत छोड़े अपनी तो 
हम क्यों उन रास्तों पर जाना छोड़ दे ?


हे इश्क वो दाता जिसने 
भटकती रूह सा जीवन दिया 
और वो कहते हैं की हम 
इश्क से खौफ खाना छोड़ दे 

वो कहते हैं हमसे सरेराह 
यूँ नशे में चलना बंद करो 
हमें डर हैं मोहब्बत की 
खुमारी के उतर जाने का 
गर साथ वो अपने हैं तो 
फिर हमारी नज़रों का काम क्या
कैसे  दुनियादारी की ख़ातिर 
उनका सहारा छोड़ दे ?

जाने वाले ऐसे गए 
ज्यो शाख से पत्ते गए 
वो ना आएं लौटकर तो 
आस भी लगाना छोड़ दे ?
किस घडी वो लौट आएं 
,इश्क का अहसान हो 
राह में कैसे भला 
दिया जलाना छोड़ दे ? 

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